बिजनेस स्टैंडर्ड - बच्चों के टीके पर तेजी से हो रहा काम
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बच्चों के टीके पर तेजी से हो रहा काम

सोहिनी दास /  August 01, 2021

यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो भारत में बच्चों के लिए कोविड-19 के कम से कम दो टीकों के विकल्प जल्दी ही उपलब्ध होंगे। बच्चों के टीकों की प्रमुख दावेदारों में से एक है जाइडस कैडिला का डीएनए-प्लाज्मिड टीका जिसका परीक्षण 12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों पर किया गया। दूसरा टीका फाइजर-बायोनटेक अथवा मॉडर्ना का एमआरएनए तकनीक से बना विदेशी टीका हो सकता है। परंतु इसके लिए जरूरी है कि इससे जुड़े कानूनी मसलों को हल किया जाए। स्वदेशी टीका निर्माता कंपनी भारत बायोटेक की निष्क्रिय वायरस पर आधारित टीके का दो वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों पर परीक्षण चल रहा है। हालांकि इसको मंजूरी मिलने और बाजार में उतारने में थोड़ा वक्त लगेगा। माना जा रहा है कि यह टीका 2021 के आखिर तक बाजार में उपलब्ध होगा।


क्यों जरूरी है बच्चों का टीका?

कोविड-19 महामारी के आरंभ के समय से ही माताओं और पिताओं को इस तथ्य से राहत मिलती रही है कि अगर बच्चे वायरस से संक्रमित होते भी हैं तो आमतौर पर उनमें गंभीर लक्षण नहीं दिखते और वे बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं।

हालांकि यह बात सभी बच्चों पर लागू नहीं है और कुछ बच्चों में मल्टीसिस्टम इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम इन चिल्ड्रन (एमआईएस-सी) की समस्या देखने को मिली। यह एक गंभीर परिस्थिति है जिसे कोरोनावायरस से जोड़कर देखा जा रहा है।

मायो क्लिनिक के मुताबिक, 'कोविड-19 से संक्रमित अधिकांश बच्चों में मामूली लक्षण दिखे। लेकिन कुछ बच्चों में एमआईएस-सी के लक्षण भी नजर आए। इन बच्चों में हृदय, फेफड़े, रक्त वाहिकाओं, गुर्दों, पाचन तंत्र, मस्तिष्क, त्वचा और आंखों में काफी सूजन देखने को मिली। बीमारी के चिह्न और लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि शरीर का कौन सा हिस्सा प्रभावित है।' बच्चों के लिए टीकों की जरूरत कई वजहों से बढ़ती जा रही है। इसमें बच्चों का बचाव, संक्रमण रोकना और स्कूलों को खोलने की जरूरत आदि शामिल हैं। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि उपरोक्त वजहों के  चलते ही देश में जल्दी बच्चों के टीके की जरूरत महसूस की जा रही है। उन्होंने कहा, 'हालांकि बच्चों के लिए किसी टीके को मंजूरी देने के पहले उनकी सुरक्षा और टीकों के असर का आकलन और विश्लेषण किया जाएगा।'

विश्व स्तर पर बच्चों अथवा किशोरों के लिए कोविड-19 टीकों के कुछ विकल्प अब उपलब्ध हैं। फाइजर-बायोनटेक और मॉडर्ना का एमआरएनए टीका, जाइडस कैडिला का डीएनए प्लाज्मिड और भारत बायोटेक का निष्क्रिय वायरस पर आधारित टीका तथा चीन के साइनोवैक तथा साइनोफार्म ऐसे ही टीके हैं।

इनमें से फाइजर और मॉडर्ना के टीकों का किशोरों पर सीमित इस्तेमाल किया गया है और भारत में भी ये टीके जल्दी उपलब्ध हो सकते हैं। अमेरिकी नियामक ने अब दोनों कंपनियों से कहा है कि वे 5 से 11 वर्ष के बच्चों पर इनका परीक्षण शुरू करें।

इससे पहले नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) वी के पॉल ने कहा था, 'हम मॉडर्ना और फाइजर के साथ संपर्क में हैं। हम चर्चा कर रहे हैं। यह बातचीत और संवाद की प्रक्रिया है। हम अनुबंध और प्रतिबद्धता से जुड़े मसलों को हल करना चाहते हैं। यह प्रक्रिया चल रही है।'


बच्चोंं के टीके का विकास किस चरण में है?

भारत बायोटेक 12 वर्ष और उससे अधिक आयु के बच्चों पर परीक्षण कर चुका है और अब वह दो वर्ष या उससे अधिक आयु के बच्चों पर परीक्षण कर रहा है। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान तथा कुछ अन्य स्थानों पर परीक्षण चल रहे हैं। कंपनी ने परीक्षण समाप्त होने को लेकर कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की है। हालांकि एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि कंपनी ने सुरक्षित दांव खेला है क्योंकि टीके को वयस्कों के लिए पहले ही मंजूरी मिल चुकी है और यह जांचा परखा है।

अधिकारी ने कहा, 'बच्चों में कोवैक्सीन का परीक्षण यह परखने के लिए है कि यह कितना सुरक्षित है और कैसी प्रतिरोधक क्षमता देता है। यह हमारी गत वर्ष नवंबर में आरंभ हुई तीन चरणों वाली प्रक्रिया की तुलना में तीव्र है। हमें तीसरे चरण में टीके की क्षमता का विश्लेषण इसी महीने मिल जाएगा। बच्चों पर अध्ययन में इतना अधिक समय नहीं लगेगा। कुछ जगहों पर बच्चों का नामांकन शुरू भी हो चुका है।'

अधिकारी ने कहा कि वह कोई समय सीमा तय नहीं कर सकते लेकिन बच्चों की कोवैक्सीन जल्दी ही सामने होगी। चूंकि इसे वयस्कों के लिए पहले ही मंजूर किया जा चुका है और इसका तकनीकी प्लेटफॉर्म जांचा परखा है इसलिए इसे सुरक्षित माना जा सकता है।

भारत बायोटेक बच्चों के लिए नाक से दिए जाने वाले टीके बीबी-154 पर भी दांव लगा रही है। कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि यह टीका सुई से नहीं दिया जाता है और इसे लगाना आसान है क्योंकि इसके लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत नहीं है। यह बच्चों के लिए आदर्श है। इस संभावित टीके का भी परीक्षण चल रहा है। भारत बायोटेक के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक कृष्णा एल्ला ने गत वर्ष कहा था, 'हमारा टीका सुरक्षित है और उसे जांची परखी तकनीक पर तैयार किया गया है। इसे छह महीने के शिशु से लेकर 60 वर्ष के बुजुर्ग तक को दिया जा सकता है।'

वरिष्ठ विषाणुविज्ञानी और वेलूर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के क्लिनिकल वायरॉलजी एवं माइक्रोबॉयलजी विभाग के पूर्वप्रमुख टी जैकब जॉन ने कहा, 'कोवैक्सीन एक निष्क्रिय वायरस पर आधारित टीका है। यह इंजेक्शन के जरिये लगने वाले पोलियो टीके और हेपटाइटिस ए टीके के समान है। ये टीके बच्चों को दिए जाते हैं और उनमें प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित करते हैं। ऐसे में कोवैक्सीन भी दो वर्ष से अधिक आयु के बच्चों पर कारगर होनी चाहिए। हालांकि इसके लिए जरूरी परीक्षण किए जाने चाहिए।' जॉन ने कहा कि अगर दुनिया को कोरोनावायरस से निजात दिलानी है तो बच्चों का टीकाकरण महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उनकी वायरस के प्रसार में अहम भूमिका है।

जहां तक जाइडस की बात है, अहमदाबाद की इस कंपनी को अपनेे टीके जायकोवी-डी के लिए भारतीय औषधि महानियंत्रक की मंजूरी की जरूरत है। उसने 12 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों में इस्तेमाल की मंजूरी मांगी है और वह पहले ही दूसरे चरण के परीक्षण के आंकड़े जारी कर दिए हैं। कंपनी ने तीसरे चरण के लिए 1,000 किशोरों के आंकड़े जुटा लिए हैं जिन्हें जल्दी ही नियामक के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इस बीच कंपनी जल्दी ही डीएनए-प्लाज्मिड तकनीक पर आधारित कोविड-19 टीके का परीक्षण पांच वर्ष और उससे अधिक उम्र के बच्चों पर करने जा रही है। जाइडस कैडिला के एमडी शर्विल पटेल ने एक सप्ताह पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था कि कंपनी ऐसे परीक्षणों के लिए नियामकीय मंजूरी की प्रतीक्षा में है।


बच्चों के टीकों का बड़ा बाजार

बच्चों के टीकों का बाजार भी बहुत बड़ा है। मुंबई के एक विश्लेषक के मुताबिक देश में अनुमानत: 35 से 40 करोड़ लोगों की उम्र 18 वर्ष से कम है। कोविड टीकों की दो खुराक मानकर चलें तो करीब 70-80 करोड़ खुराक का बाजार आसानी से उपलब्ध है।

यूनेस्को के अनुमान के मुताबिक करीब 32.1 करोड़ भारतीय बच्चों को गत वर्ष मार्च में लगे लॉकडाउन में घर पर रहने को कहा गया था।

Keyword: बच्चे, टीके, जाइडस कैडिला, फाइजर-बायोनटेक, मॉडर्ना,
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