बिजनेस स्टैंडर्ड - ब्याज दरें और ऊंची परिसंपत्ति कीमतें
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ब्याज दरें और ऊंची परिसंपत्ति कीमतें

गुरबचन सिंह /  July 29, 2021

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वास्तविक ब्याज दरें काफी निचले स्तर पर रखी हैं। हम सभी जानते हैं कि कई परिसंपत्तियों जैसे बॉन्ड आदि के मूल्य ब्याज दरों की विपरीत दिशा में चलते हैं। ब्याज दरों को लेकर इनकी कीमतों में संवेदनशीलता काफी अधिक हो सकती है, खासकर, तब जब हम कम ब्याज दरों के बीच अधिक ऊंचा दांव खेलते हैं। वर्तमान समय में भारत में कई परिसंपत्तियों की कीमतें सामान्य स्तर से काफी अधिक हैं।

प्राय: ऐसा देखा जाता है कि परिसंपत्ति बाजार में अगर तेजी जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती है या कमजोर हालात के बीच कारोबारियों का उत्साह ठंडा रहता है तो आरबीआई चिंतित हो जाता है। इस रुझान के उलट फिलहाल मोटे तौर पर ऐसा लग रहा है कि अगर ब्याज दरें निचले स्तर पर रहने से बॉन्ड आदि की कीमतें ऊपर भागती हैं तो भागे, केंद्रीय बैंक इसमें तत्काल हस्तक्षेप नहीं करेगा। वास्तव में आरबीआई को भी मौजूदा स्थिति थोड़ी राहत दे रही है। अगर कमजोर आर्थिक हालात में ब्याज दरें कम रहने से बॉन्ड आदि की कीमतें बढ़ती हैं तो लोगों की संपत्ति भी बढऩे लगती है, जो उपभोक्ता आधारित मांग में इजाफे का कारण बन सकता है। इस समय प्रतिकूल हालात में आरबीआई के लिए यह राहत देने वाली बात है।

वर्तमान परिदृश्य में परिसंपत्तियों के मूल्य टटोलना उपयोगी साबित हो सकता है। यद्यपि, निवेशकों एवं कारोबारियों की अवधारणा निकट अवधि के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है और बुनियादी बातें दीर्घ अवधि में परिसंपत्तियों की कीमतों की दिशा तय कर सकती हैं, लेकिन केंद्रीय बैंक की ब्याज दर नीति भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कमजोर आर्थिक हालात में ब्याज दरें निचले स्तर पर रहने से परिसंपत्ति की कीमतें बढ़ती हैं। उसी तरह, तेजी के दौरान ऊंची ब्याज दरें परिसंपत्ति की कीमतें कम कर सकती हैं।

यह सच है कि कमजोर आर्थिक हालात में चारों तरफ निराशा का माहौल रहता है, इसलिए परिसंपत्ति की कीमतेें वैसे भी निचले स्तर पर रहती हैं। लिहाजा परिसंपत्ति की कीमतें बढ़ाने के लिए आरबीआई अगर दरें कम करता है तो ऐसा करना उपयोगी सिद्ध हो सकता है। हालांकि कमजोर हालात में ब्याज दरों में बदलाव सामान्य से अधिक हो सकता है और इससे कई परिसंपत्तियों की कीमतें अधिक तेजी से ऊपर चढ़ सकती हैं। लिहाजा, व्यावहारिक स्तर पर परिसंपत्ति की कीमतें आरबीआई की ब्याज दर नीति के कारण उछल सकती हैं।

ऐसा अक्सर होता है कि आरबीआई द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने के बाद परिसंपत्तियों की कीमतों में उतार-चढ़ाव अधिक देखने को मिलता है। ब्याज दरों से जुड़ी ये सभी बातें केवल आरबीआई पर ही बल्कि सभी केंद्रीय बैंकों पर लागू होती है। आखिर केंद्रीय बैंक ऐसा क्यों करते हैं? ब्याज दर नीति का मुख्य ध्यान पूर्ण रोजगार सुनिश्चित करने के साथ महंगाई स्थिर और इसे निचले स्तर पर टिका रहता है। यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्रीय बैंक सदैव इसमें सफल होते हैं या नहीं लेकिन उनकी नीतियों के कुछ अतिरिक्त प्रभाव और परिणाम हो सकते हैं। इन पर विचार किया जा सकता है।

चूंकि, इस समय कम ब्याज दरों के कारण कई परिसंपत्तियों की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं लेकिन पिछला अनुभव बताता है कि यह स्थिति एक बड़ा बदलाव ला सकती है। कई परिसंपत्तियों पर भविष्य में प्रतिफल की दर कम रह सकती है। ये बातें सीधी एवं सरल प्रतीत हो सकता हैं, लेकिन विषय गंभीर है।

आने वाले समय में आरबीआई की ब्याज दर नीति को लेकर इस समय अनिश्चितता है। इतना ही नहीं, यह अनिश्चितता बदलती अवधारणा एवं बुनियाद के कारण परिसंपत्ति बाजार की मौजूदा अनिश्चितताओं से उलझ कर रह गई है। एक और परेशानी की बात है। सार्वजनिक कर्ज के बढ़ते अंबार को देखते हुए केंद्रीय बैंक को सामान्य एवं अपेक्षाकृत ऊंची ब्याज दर बहाल करने में देरी करने की जरूरत महसूस हो सकती है। लिहाजा, ब्याज दरों और परिसंपत्ति कीमतों के सामान्य होने की राह लंबी, कठिन, पेचीदा, एवं उबड़-खाबड़ हो सकती है। इस ऊहापोह में परिसंपत्ति बाजार से कीमतों को लेकर मिल रहे संकेत वास्तविक निवेश और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर को प्रभावित कर सकते हैं। इतना ही नहीं, साधारण निवेशक दक्ष निवेशकों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इससे आर्थिक असमानता की खाई और चौड़ी हो सकती है।

यह सत्य है कि केंद्रीय बैंक नियमित आधार पर संवाद करता रहता है, लेकिन काफी हद तक अनिश्चितता अब भी कायम है। इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं निकालना चाहिए कि केंद्रीय बैंक सूचनाएं साझा करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं (कभी-कभी वे ऐसा जरूर करते हैं)। हां, यह जरूर है कि केंद्रीय बैंकों का आने वाले समय में अपनी नीतियों को लेकर रुख स्पष्ट नहीं हैं। आरबीआई जैसे केंद्रीय बैंक के संबंध में यह बात अधिक सही है जो अब शायद ही स्वतंत्र केंद्रीय बैंक रह गया है।

वृहद आर्थिक हालात के लिए ब्याज दर नीति की दास्तां केवल अवांछित प्रभाव तक ही समाप्त नहीं होती है। इसके असर बाद में देखे जा सकते हैं। हालात अत्यधिक बिगड़े तो परिसंपत्ति कीमतों में अस्थिरता बाद में आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। जापान इसका एक उदाहरण है जहां 1980 में परिसंपत्तियों की कीमतें अचानक बढऩे से एक दशक (1991-2001) बिना किसी उपलब्धि के हाथ से निकल गया। अमेरिका में 2007 में आवासीय परिसंपत्तियों से जुड़े संकट के बाद जो हुआ वह इसका एक और उदाहरण है।

ये सभी तथ्य एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करते हैं। क्या नीति-निर्धारक एक ऐसी अलग ब्याज नीति अपना सकते हैं जिसके कम से कम दुष्प्रभाव एवं पश्च प्रभाव हों? हां, वे ऐसा कर सकते हैं, लेकिन यह एक अलग मसला है।

(लेखक भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली में अतिथि प्राध्यापक हैं। )

Keyword: ब्याज दरें, परिसंपत्ति कीमत, निवेश, जीडीपी दर, आरबीआई, बॉन्ड,
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