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देश में बरकरार है केंद्रीय नियोजन

अजय शाह /  July 27, 2021

जुलाई 1991 के बजट भाषण की 30वीं वर्षगांठ हमें यह याद दिलाती है कि हमारे देश ने लोगों की आजादी और सरकार के वैध कामकाज को लेकर राज्य क्षमता की दिशा में कितनी सीमित प्रगति की है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने हाल ही में ग्राहकों के कार्ड की जानकारी रखने पर रोक लगा दी है। यह घटना हमें केंद्रीय नियोजन की समस्याओं और नियमन में राज्य क्षमता के बारे मेंं विचार करने का अवसर देती है। जुलाई 1991 में जो शुरुआत हुई उसे अभी भारतीय राज्य के काम करने के संभावित तरीके के रूप में पूरी तरह अंजाम देना बाकी है।

भारतीय समाजवाद की इस परंपरा की शुरुआत नेहरू ने की थी और इंदिरा गांधी ने इसे और अधिक गहराई प्रदान की। इसका मूल दबदबे में निहित है। इस व्यवस्था में राज्य सबसे शक्तिशाली आर्थिक कारक है। सरकार ने कंपनियों और व्यक्तियों को निर्देशित किया कि कैसा व्यवहार करना है। दूरदराज इलाकों में रहने वाले और शांति से अपना जीवन बिताने वाले लोगों को दंड का भय दिखाकर सरकार के आदेशों का पालन कराया गया।

इसके साथ ही केंद्रीय नियोजन शब्द का जन्म हुआ। बाजार अर्थव्यवस्था में उत्पादों और प्रक्रियाओं से जुड़े निर्णय निजी लोगों द्वारा लिए जाते हैं और ये ग्राहकों की प्राथमिकता और बाजार प्रतिस्पर्धा से प्रभावित होते हैं। केंद्रीय नियोजन में सरकार ऐसे तकनीकी ब्योरे चुनती है। बाजार अर्थव्यवस्था में बाजार तय करता है कि विजेता कौन होगा। केंद्रीय नियोजन में जीतने वाली तकनीक, जीतने वाली उत्पाद श्रेणी अथवा फर्म वो होती हैं जिन्हें सरकार का आशिष प्राप्त होता है। सन 1991 से 2011 के बीच की तेजी की सराहना करने वाले हम जैसे लोग यह कहना भूल जाते हैं कि भारतीय नीति विचार की प्रक्रिया में केंद्रीय नियोजन को बस यूं ही अपनाया और स्वीकार किया जाता है। योजना आयोग को भंग करने का निर्णय भारतीय समाजवाद से पीछे हटने का अहम निर्णय था लेकिन नियंत्रण का दर्शन अभी भी व्यापक है।

ऑनलाइन वेबसाइटों से व्यक्तिगत जानकारी लीक होने की बात अक्सर खबरों में रहती है। यह चिंता का विषय है। आरबीआई की प्रतिक्रिया एक नियमन बनाने की रही है। वह पेमेंट एग्रीगेटरों, पेमेंट गेटवे और कारोबारियों द्वारा ग्राहकों के कार्ड की जानकारी एकत्रित करने को प्रभावी तरीके से रोकता है। 'क्या उपभोक्ताओं को इंटरनेट पर डेटा भंडारित करने से रोकना चाहिए?' नामक एक हालिया पर्चे में मेरे सह लेखकों और मैंने यह दलील दी है कि प्रतिबंध बहुत अधिक है और वह लागत-लाभ विश्लेषण ने नहीं उपजा है। इस दौरान जनता से मशविरे की प्रक्रिया भी सही तरीके से नहीं अंजाम दी गई।

लोग वाणिज्यिक वेबसाइटों पर अपने कार्ड की जानकारी इसलिए डालते हैं ताकि नियमित भुगतान किया जा सके और उन्हें हर बार उस वेबसाइट पर जाकर कार्ड का ब्योरा न डालना पड़े। कंपनियों ने ग्राहकों तक अपनी सेवाएं और उत्पाद आसानी से पहुंचाने के लिए प्रक्रिया तैयार की है। आरबीआई का नया नियमन ग्राहकों के लिए दिक्कतदेह है। अब उन्हें हर महीने लाखों लेनदेन की जानकारी देने में अतिरिक्त समय लगाना होगा। तकनीकी विकास का खर्च भी बढ़ेगा। नियमन उपभोक्ताओं की प्राथमिकता को चुनिंदा भुगतान तकनीक की ओर स्थानांतरित करता है। जोखिम यह है कि तकनीकी चयन आरबीआई द्वारा आकार दिया जाएगा और केंद्रीय नियोजन के कारण ठहराव आ सकता है।

यह नियमन निजी व्यक्तियों के लिए बाधा उत्पन्न करती है और इसलिए इसे तभी लागू किया जाना चाहिए जब समाज को होने वाले लाभ इसकी लागत से अधिक हों। आरबीआई ने यह भी नहीं बताया कि कार्ड डेटा भंडारण पर लगने वाली रोक किस प्रकार उपभोक्ताओं और भुगतान मध्यवर्तियों पर पडऩे वाली लागत के मुकाबले अधिक लाभदायक है। उदाहरण के लिए हमें यह नहीं पता कि कितने आंकड़ों में सेंध लगी है या भुगतान मध्यवर्तियों के पास जमा डेटा के कारण कितनी मौद्रिक हानि हुई है।

जब गैरनिर्वाचित अधिकारी कानून बनाते हैं तो लोकतांत्रिक वैधता का प्रश्न हमेशा उठता है। किसी भी क्षेत्र में लोकतांत्रिक वैधता हासिल करने का पहला कदम है सलाह-मशविरा। इस मामले में आरबीआई द्वारा सार्वजनिक मशविरे का अभाव है। आरबीआई ने सितंबर 2019 में जो सार्वजनिक मशविरा प्रक्रिया जारी की थी उसमें संभावित नीतिगत चयन को लेकर पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं थी। कार्ड की जानकारी भंडारित करने पर रोक कारोबारियों और ग्राहकों के लिए इस तरह सामने आई है जिसे रोका नहीं जा सकता। इस प्रतिबंध की घोषणा करने वाले दस्तावेज में इसका कोई संभावित विकल्प नहीं दर्शाया गया। उद्योग जगत और ग्राहकों ने ऐसे हस्तक्षेप को लेकर क्या प्रतिक्रिया दी? आरबीआई को मशविरा प्रक्रिया में किस प्रकार की प्रतिपुष्टि मिलीं? प्रतिपुष्टि के किस हिस्से को स्वीकार किया गया और किसे खारिज किया गया? इसके पीछे क्या दलील दी गईं? इन सवालों के जवाब तभी मिलेंगे जब आरबीआई मशविरा प्रक्रिया के नतीजे पेश करे। सर्वोच्च न्यायालय ने सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम ट्राई (2016) मामले में जोर दिया कि इन मानकों की मदद से नियामकीय प्रक्रिया पारदर्शी और सार्थक बनाई जाए।

नियामक द्वारा किए जाने वाले लागत-लाभ विश्लेषण और एक प्रभावी सार्वजनिक मशविरा प्रक्रिया उस समय खासतौर पर जरूरी हैं जब प्रतिबंध जैसा महंगा कदम उठाना हो। वैकल्पिक उपाय मसलन देनदारी ढांचा और उच्च सुरक्षा मानकों की मदद से वांछित उपभोक्ता संरक्षण हासिल किया जा सकता है वह भी समाज के प्रति कम लागत को लेकर। यदि आरबीआई इन चयनों पर विचार करता तो इसे प्रकाशित नहीं करता। नियामकों द्वारा लोकतांत्रिक वैधता हासिल करने का दूसरा महत्त्वपूर्ण स्तंभ है तकनीकी विशेषज्ञता होना और उसे प्रदर्शित करना।

भारत को वापस उच्च वृद्धि की ओर ले जाने के लिए स्वतंत्रता और राज्य क्षमता की आवश्यकता है। आज के नियामकों के पास शक्ति है, अफसरशाही है और उस तरह का नियंत्रण है जिसके बारे में सन 1991 में सोचा भी नहीं जा सकता था। भारतीय नियामकों को विधायिका, कार्यपालिका और न्याय की अद्भुत मिश्रित शक्ति हासिल होती है। इस विषय में तमाम जानकारी उपलब्ध है कि कैसे इन संस्थानों में विफलता देखने को मिली है। कमतर राज्य क्षमता के अधीन भारत में नियमन अक्सर केंद्रीय नियोजन और नियंत्रण में उलझ जाता है। ऐसे में प्रवर्तन चुनिंदा ढंग से और कमजोर होता है तथा नियामकों के कदम विधिक नियमों को लेकर चिंता उत्पन्न करते हैं। अब इन पर तथा नियामकीय एजेंसियों के अधिकारों के संतुलन को लेकर प्रश्न उठने लगे हैं।

(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं)

Keyword: केंद्रीय नियोजन, बजट भाषण, आरबीआई, ग्राहक, कार्ड, डेटा,
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