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स्टेडियम में प्रशंसकों की मौजूदगी खेल के लिए कितनी अहम?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  July 27, 2021

कोविड-19 महामारी फैलने के बाद से जब कभी भी कोई बड़ा खेल टूर्नामेंट होता है तो खेल जगत के भीतर यह सवाल जोरशोर से उठने लगता है कि प्रशंसकों को स्टेडियमों के भीतर जाने की अनुमति देनी चाहिए या नहींं। टोक्यो ओलिंपिक ने सूझबूझ दिखाते हुए प्रशंसकों को आयोजन स्थलों से दूर ही रखने का फैसला किया है। महामारी खत्म होने तक हमें इसी अंदाज में चलना भी चाहिए। हालांकि इसे लेकर टिप्पणीकारों, खेल उद्योग के अधिकारियों एवं कुछ खिलाडिय़ों की तरफ से भी असंतोष के स्वर सुनने को मिलेंगे।

यह ठीक है कि स्टेडियमों के भीतर प्रशंसकों की मौजूदगी से प्रतिस्पद्र्धाओं में एक अलग तरह का रोमांच आता है और खिलाड़ी उससे बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित होते हैं। इसके अलावा आयोजकों को प्रवेश शुल्क एवं खानपान के सामान की बिक्री से अच्छा-खासा राजस्व भी मिलता है। लेकिन क्या ये चीजें वास्तव में इतनी महत्त्वपूर्ण हैं कि ब्रिटेन कोविड-19 संक्रमण के मामलों में अचानक विस्फोट का जोखिम भी मोल लेने को तैयार था ताकि कोविड-रोधी टीका ले चुके लोगों को बगैर मास्क पहने ही वेम्बली फुटबॉल स्टेडियम एवं विम्बल्डन टूर्नामेंट देखने के लिए जाने की मंजूरी दे दे? लेकिन इन दिखावटी मसलों से इतर सवाल यह है कि क्या स्टेडियमों में प्रशंसकों का प्रवेश किसी भी बड़ी खेल स्पद्र्धा के वित्तीय पहलुओं के लिहाज से इतना अहम है?

सच यह है कि स्टेडियमों के भीतर मौजूद प्रशंसकों की तादाद उस व्यापक दर्शक वर्ग का महज छोटा हिस्सा ही होता है जिसके लिए खिलाड़ी अपना जी-जान लगा देते हैं। दुनिया भर में मौजूद टीवी दर्शक (और तेजी से बढ़ते ऑनलाइन स्ट्रीमिंग दर्शक) ही वह बड़ा आधार होता है जहां से खेल आयोजकों को मोटा राजस्व मिलता है। यह बात एथलेटिक्स, फुटबॉल, टेनिस, हॉॅकी, क्रिकेट, गोल्फ या फॉर्मूला 1 रेस जैसे हरेक खेल पर लागू होती है। आज इन सभी खेलों को दुनिया भर में लोग देखते और पसंद करते हैं और ऐसा टीवी की व्यापक पहुंच के कारण ही संभव हो पाया है। इसका इंगलिश प्रीमियर लीग (ईपीएल) से बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता है जो कि आज दुनिया में सर्वाधिक देखा जाने वाला लीग टूर्नामेंट है। विश्वव्यापी दर्शकों तक पहुंच ने ही बुनियादी तौर पर एक प्रांतीय क्लब टूर्नामेंट को सबसे संपन्न खेल स्पद्र्धाओं में से एक बना दिया है। इसी का नतीजा है कि लिवरपूल के लिए खेलने वाले मिस्र के एक स्ट्राइकर के भी आज भारत में तमाम प्रशंसक हैं। महामारी के पहले हुए 2018-19 के सत्र में ईपीएल मुकाबलों को दुनिया भर में कुल 3.2 अरब दर्शकों ने देखा था जो कि किसी भी स्टेडियम के भीतर मौजूद प्रशंसकों की संख्या से लाख गुना ज्यादा है।

असल में, एक भारतीय टीवी चैनल के अधिकारी ने एक बार कहा था कि किसी भी खेल को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे टीवी पर दिखाना होता है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) और प्रो-कबड्डी लीग काफी हद तक टीवी के लिए ही बने हैं। फॉर्मूला 1 रेस टीवी की ही वजह से आज भारत के मध्यवर्गीय दर्शकों तक भी पहुंच बना चुका है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि स्टेडियमों में प्रशंसकों के न होने से टीवी दर्शकों की संख्या में भी कमी आती है लेकिन इसका गहराई से अध्ययन करने पर कुछ अलग नतीजे भी आ सकते हैं।

खिलाडिय़ों की इस बारे में क्या राय है? क्या उनके प्रदर्शन के लिए प्रशंसकों की मौजूदगी अपरिहार्य है? इस बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। एक साल से खाली पड़े स्टेडियमों में खेली जा रही खेल स्पद्र्धाओं को देखने का अनुभव बताता है कि खिलाडिय़ों के स्तर में कोई गिरावट नहीं आई है। वर्ष 2020-21 सत्र के दौरान बुंडेसलीग मैचों में दिए गए रेफरी के फैसलों पर किए गए एक अध्ययन ने इन निर्णयों में सुधार की ओर इशारा जरूर किया है। शोर मचाते प्रशंसक न होने से रेफरी ने मेजबान टीम को कम फ्री किक एवं पेनल्टी शॉट दिए।

खेल जगत से जुड़े सारे लोग स्टेडियमों के भीतर प्रशंसकों की कमी महसूस होनेे का जिक्र करते हैं। लेकिन काफी कुछ खेल की प्रकृति पर निर्भर करता है। एथलेटिक्स, जिम्नास्टिक्स, निशानेबाजी और तैराकी के अलावा फॉर्मूला 1 रेस में भी प्रशंसकों को ऐक्शन वाली जगह से थोड़ा दूर ही रखा जाता है। केवल विजेता खिलाड़ी के ट्रॉफी उठाने या मेडल पहनने के समय ही प्रशंसकों की खुली मौजूदगी होती है। फॉर्मूला 1 रेस में ड्राइवर प्रशंसकों को सिर्फ रेस की शुरुआत या आखिर में ही देखते हैं, रेस के दौरान वे अपनी टीम के सदस्यों के साथ रेडियो पर संपर्क में रहते हैं।

टेनिस में तो इस सवाल का जवाब मिल चुका है। एक टूर्नामेंट में खाली स्टेडियमों को देखते हुए पहले से रिकॉर्ड तालियों की गूंज सुनाने का अजीब चलन देखने को मिला। लेकिन दूसरे टूर्नामेंटों में इसे अपनाने की जरूरत नहीं समझी गई। विजेता बनने वाले खिलाडिय़ों का अपने संबोधन में दर्शकों का आभार जताना भी एक फैशन हो चुका है। लेकिन परस्पर क्रिया किसी भी तरह से स्पष्ट नहीं है। पिछले दशक में अपनी बढ़ती लोकप्रियता के बारे में पूछे जाने पर युवा राफेल नडाल ने कहा था कि वह मुकाबले के दौरान प्रशंसकों की आवाज पर ध्यान ही नहीं  देते हैं। नडाल के कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे रोजर फेडरर भी टेनिस कोर्ट पर ध्यान भटकाने वाली घटनाओं से एकदम बेफिक्र दिखते हैं। हालांकि फेडरर एवं नडाल की तरह प्रशंसकों के अथाह समर्थन की चाह रखने वाले नोवाक जोकोविच की कोशिश प्रशंसकों को खुश करने की रहती है।

यूरोप एवं दक्षिण अमेरिकी देशों में घरेलू मैदान पर खेलने वाली फुटबॉल टीमों को अपने प्रशंसकों का भारी समर्थन मिलता है और दूसरी टीम घाटे में रहती है। लेकिन फुटबॉल स्टेडियमों में प्रशंसकों का होना हमेशा वरदान ही नहींं होता है। दर्शकों के हंगामा करने का खतरा भी रहता है और सोशल मीडिया ने इसे और बढ़ाया है। ब्रिटिश प्रशंसक इस मामले में खासे बदनाम हो चुके हैं और यूरोपीय स्पद्र्धाएं इसके सबूत भी पेश करती हैं। उस तरह के दर्शकों की किसी भी स्टेडियम में जगह नहीं है।

Keyword: स्टेडियम, प्रशंसक, खेल, टूर्नामेंट, टोक्यो ओलिंपिक, राजस्व, स्टेडियम,
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