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मनोरंजन उद्योग पर नियंत्रण नहीं उसे प्रोत्साहित करने की है जरूरत

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  July 25, 2021

हम जो भी पढ़ते, देखते, सुनते या जिन बातों पर हंसते हैं, उन सभी पर सरकार का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा हाल के महीनों में उठाए गए कुछ कदमों पर नजर डालिए।

इस वर्ष जून में सन 1952 में बने सिनेमेटोग्राफ ऐक्ट को संशोधित करने का प्रस्ताव रखा गया। जिन संशोधनों का प्रस्ताव रखा गया उनमें से केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह किसी फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा प्रमाणित किए जाने के बाद भी उसकी समीक्षा कर सके। सर्वोच्च न्यायालय सन 2000 में इस अधिकार को समाप्त कर चुका था। इस वर्ष अप्रैल में फिल्म प्रमाणन अपील पंचाट अथवा एफसीएटी (तथा कुछ अन्य संस्थानों) को समाप्त कर दिया गया। यदि आप कोई ऐसे फिल्मकार हों  जो सीबीएफसी की समीक्षा संस्था के बदलावों या उसके द्वारा काटे गए दृश्यों को लेकर संतुष्ट नहीं हों तो आप समीक्षा समिति के पास जा सकते थे। यदि वहां संतुष्ट नहीं हुए तो एफसीएटी के पास जाया जा सकता था। इस पांच सदस्यीय सांविधिक संस्था का गठन 1983 में किया गया था और यह 37 वर्षों तक एक ऐसी संस्था बनी रही जहां फिल्मकार और अधिकारी मिलकर बैठते थे। बैंडिट क्वीन और उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों के रिलीज में इसकी अहम भूमिका रही। इससे पहले फरवरी में सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 जारी किए गए। ये नियम ओटीटी, समाचार वेबसाइट/एग्रीगेटर्स और सोशल मीडिया कंपनियों के लिए हैं। यहां अनुपालन पर विशेष जोर दिया गया और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को तृतीय स्तर पर सीधे शामिल किया गया। इन्हें कई अदालतों में चुनौती दी गई है।

हाल ही में बंबई उच्च न्यायालय ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के विवादित नए टैरिफ ऑर्डर 2.0 के पक्ष में निर्णय दिया। इस ऑर्डर के माध्यम से प्रसारकों द्वारा चैनलों की कीमत तय करने को लेकर पेचीदा फॉर्मूले पेश किए गए। यह भी बताया गया कि वे कौन सी रियायतें दे सकते हैं और हर चैनल के मूल्य की ऊपरी सीमा भी तय की गई। इससे भुगतान राजस्व में कमी आई और कार्यक्रमों में किसी भी तरह का निवेश हतोत्साहित हुआ। एक प्रतिस्पर्धी बाजार में जहां उपभोक्ताओं के पास ओटीटी, डीटीएच और केबल जैसे विकल्प हैं वहां इतना नियंत्रण अजीब है। प्रसारकों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

लगभग 1.38 लाख करोड़ रुपये मूल्य का मीडिया और मनोरंजन उद्योग अदालतों में मुकदमे झेलने की आशंका से ग्रस्त रहेगा और खुद को स्वयं सेंसर करने लगा है ताकि सीबीएफसी प्रमाणन न छिन जाए। आईटी नियमों की जो लागत और नियंत्रण है, खासकर नए ऑनलाइन समाचार माध्यमों पर, उसका अर्थ यह है कि पत्रकारिता में निवेश घटेगा और अनुपालन में निवेश बढ़ेगा। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रसारक बाजार होने के बावजूद भारत मुद्रीकरण के मामले में ब्राजील जैसे विकासशील देशों से पीछे है। इसमें टेलीविजन सिग्नल के मूल्य नियंत्रण की अहम भूमिका है।

दुनिया भर की सरकारें मीडिया पर नियंत्रण और उसे सुविधाएं देने को लेकर आगापीछा करती रहती हैं। ब्रिटेन में ऑफकॉम और अमेरिका में संघीय संचार आयोग जैसे संस्थान उपभोक्ताओं, कारोबार और समाज के बीच संतुलन बनाने का काम करते हैं।

भारत ने राजस्व और रोजगार बढ़ाने को लेकर कई पहल कीं। मिसाल के तौर पर सन 2000 में फिल्मों को उद्योग का दर्जा देना और बाद में कुछ राज्यों में मल्टीप्लेक्स को कर रियायत देना। इसके चलते 2002 से 2019 के बीच फिल्म उद्योग ने आठ गुना वृद्धि हासिल की।

हालांकि इस बार सुविधाओं के बजाय नियंत्रण पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। यह तीन वजहों से दुखद है।

पहली और सबसे बड़ी वजह है सॉफ्ट पावर (बिना बल प्रयोग किए दूसरों को प्रभावित करना)।  नई मीडिया अर्थव्यवस्था टीवी, प्रिंट या दूरसंचार के बारे में नहीं बल्कि गूगल, फेसबुक, नेटफ्लिक्स या ऐपल जैसी कंपनियों के बारे में है जिनके ग्राहक देश, भाषा, विषयवस्तु और उपकरणों से परे विस्तारित हैं। यहां भारत का प्रतिनिधित्व उसका शीर्ष मीडिया, तकनीक या दूरसंचार कंपनियां नहीं बल्कि कहानियां कहने वाले करते हैं। चीन के उलट हमारे यहां विदेशी फिल्मों का कोई कोटा या रोकटोक नहीं है। इसके बावजूद 90 फीसदी से अधिक सामग्री स्थानीय होती है। हॉलीवुड के प्रभाव वाली दुनिया में भारत का रचनात्मक कारोबार सैकड़ों वर्ष से चल रहा है। कोरिया के अलावा भारत उन चुनिंदा बाजारों में है जहां वास्तविक स्थानीय कहानियां कही जाती हैं। हमारा उद्योग भी उन्हें बेहतर तरीके से पेश करता है।

दुनिया के बड़े प्लेटफॉर्म इसके वाहक हैं। नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज होने वाला हर शो या फिल्म एक साथ 200 से अधिक देशों में एक ही समय पर देखे जाते हैं। बीते दो वर्षों में रीमिक्स, सैक्रेड गेम्स, लस्ट स्टोरीज जैसे भारतीय शो इंटरनैशनल एमी पुरस्कारों के लिए नामांकित हुए हैं। सन 2020 में दिल्ली क्राइम को पुरस्कार भी मिला। इंटरनैशनल एमी अवार्ड अमेरिकन अवार्ड का वैश्विक संस्करण हैं जहां भारतीय शो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शो के साथ मुकाबला करते हैं।

हमारे रचनात्मक उद्योग भारत की सॉफ्ट पावर की पहचान हैं। चीन जैसे देश भी ऐसी क्षमता विकसित नहीं कर पाए हैं। इसका लाभ उठाते हुए भारत को वैश्विक मनोरंजन जगत में और मजबूत ढंग से स्थापित करने की जरूरत है।

इसका असर रोजगार और करों पर भी पड़ता है। इसलिए भी नियंत्रण के बजाय सुविधाएं देने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। सन 2018 की डेलॉयट की एक रिपोर्ट के अनुसार ओटीटी, फिल्मों और टीवी में कुल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार 24 लाख था। इवेंट, आउटडोर शूटिंग, प्रिंट, रेडियो, संगीत आदि को शामिल करें तो यह दोगुना हो सकता है।

सवाल यह है कि इसकी मजबूतियों पर प्रहार करने के बजाय इसे आगे बढऩे में मदद क्यों नहीं की जा रही है?

Keyword: मनोरंजन उद्योग, नियंत्रण, सिनेमेटोग्राफ ऐक्ट, सीबीएफसी,
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