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पंजाब में सिद्धू के बढ़ते कद में अमरिंदर सिंह के लिए संकेत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 23, 2021

नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने के साथ ही राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का कद निस्संदेह कम हुआ है लेकिन यह देखना होगा कि क्या यह उनकी रवानगी का भी संकेत है।

अभी कुछ महीने पहले तक कैप्टन अमरिंदर सिंह के समर्थकों को लग रहा था कि सबकुछ उनके मुताबिक हो रहा है। प्रमुख प्रतिद्वंद्वी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने किसान कानूनों के मुद्दे पर भाजपा के साथ मतभेद के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) छोड़ दिया था। किसानों द्वारा इस कानून के खिलाफ किए जा रहे विरोध में आनंदित अमरिंदर सिंह ने कृषि कानूनों का एक वैकल्पिक स्वरूप पेश किया जिसे विधानसभा में मजबूरन अकाली दल ने भी समर्थन दिया। कुल मिलाकर अमरिंदर सिंह बहुत बेहतरीन स्थिति में नजर आ रहे थे।

वह आत्मविश्वास से इस कदर भरे हुए थे कि गत वर्ष नवंबर में उन्होंने सिद्धू को दोपहर के खाने पर बुलाया ताकि उनके साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा कर सकें। सिद्धू ने गत वर्ष जुलाई में उस समय विरोध स्वरूप इस्तीफा दे दिया था जब मुख्यमंत्री ने उन्हें स्थानीय निकाय विभाग के प्रभारी पद से हटा दिया था। उनका कहना था कि सिद्धू का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। उन्होंने सिद्धू को विद्युत विभाग देने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने इस प्रत्याशा में नया विभाग संभालने से इनकार कर दिया था कि नई दिल्ली (प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी) उनके साथ हुए अन्याय को समाप्त करेंगे। तब से सिद्धू और अमरिंदर सिंह के बीच बातचीत नहीं हुई है। परंतु अगर दोपहर भोज दूरियां पाटने के लिए आयोजित किया गया था तो कहा जा सकता है कि बहुत देर हो चुकी थी। उस मुलाकात और उसके बाद की घटनाओं ने सिद्धू का रुख और अधिक कड़ा ही किया और वह इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाना चाहते थे। इसका नुकसान सुनील जाखड़ को उठाना पड़ा। उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटाकर सिद्धू को यह पद सौंप दिया गया।

तो यह मामला शून्य-शून्य की बराबरी पर माना जाए या एक-एक की बराबरी पर?

अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद सिद्धू ने एक बैठक आयोजित की जहां 62 विधायक मौजूद थे। 117 सदस्यों वाली पंजाब विधानसभा में कांग्रेस को 77 सीट पर जीत मिली थी (बाद में उपचुनावों में यह तादाद बढ़कर 83 हो गई), यानी मुख्यमंत्री को न के बराबर समर्थन प्राप्त था। जाहिर है विधायकों को यह पता होता है कि उनके लिए कौन सा पक्ष बेहतर है। यदि वे सिद्धू के पक्ष में ज्यादा तादाद में नजर आए तो इसलिए क्योंकि उन्हें यह अहसास हो गया कि सिद्धू ही यह तय करेंगे कि सन 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें दोबारा पार्टी का टिकट मिलेगा या नहीं। लेकिन इसमें भी दो राय नहीं है कि अमरिंदर सिंह के पास अब कोई विकल्प नहीं है। उन पर उत्तराधिकार योजना थोप दी गई है। वह रूठ सकते हैं या लड़ाई लड़ सकते हैं लेकिन अब खेल का मैदान बराबरी का नहीं रह गया है।

अमरिंदर सिंह के रिकॉर्ड पर नजर डालिए। सन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 13 में से नौ लोकसभा सीट पर जीत मिली थी। यदि टिकट वितरण में थोड़ी समझदारी बरती जाती तो पार्टी आसानी से 10 सीट जीत सकती थी। पार्टी को हर उपचुनाव में जीत मिली और उसने स्थानीय निकाय का भी हर चुनाव जीता।

उनके समर्थक कहते हैं कि अमरिंदर सिंह भी कोई नैतिकता की प्रतिमूर्ति नहीं हैं। उनका काम करने का अपना तरीका है 'और वह ऐसे ही हैं।' लेकिन वे यह भी मानते हैं कि दिल्ली में जो भी कवायद हुई वह इस तरह तैयार की गई थी कि उन्हें सिद्धू का आधिपत्य स्वीकार करना पड़े।

अब उनके पास कोई विकल्प नहीं है।

पंजाब के सामाजिक तानेबाने पर विचार कीजिए। प्रदेश में 38 फीसदी हिंदू हैं। आतंकवाद की शुरुआत के पहले प्रदेश में हिंदुओं की तादाद 48 फीसदी थी लेकिन गत दो दशक में यह तादाद कम हुई है। करीब 31 फीसदी दलित हैं जो हिंदुओं और सिखों में बंटे हुए हैं लेकिन सिख दलित अधिक हैं। 78 फीसदी दलित आबादी पंजाब के ग्रामीण इलाकों में रहती है। पारंपरिक तौर पर देखा जाए तो कांग्रेस को पंजाब में हिंदुओं और दलितों की बदौलत जीत मिली। यह भी सही है कि उनमें पंथ के आधार पर बंटवारा है-रामदासिया, रविदासिया, वाल्मीकि आदि। हिंदुओं में भी विभाजन है। जाट सिखों की तादाद 18 से 22 फीसदी है और सन 1977 से ही पंजाब की राजनीति पर उनका दबदबा है। पंजाब का हर मुख्यमंत्री कोई न कोई जाट सिख ही रहा है। अब तो मुख्यमंत्री और पीसीसी प्रमुख दोनों ही जाट सिख हैं।

सवाल यह है कि सिद्धू पार्टी और कार्यकर्ताओं को कितनी अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि वह भाजपा से कांग्रेस में आए हैं और आज भी उनका दावा है कि राजनीति में अरुण जेटली उनके गुरु हैं? वह महत्त्वाकांक्षी और जल्दबाजी में नजर आते हैं और इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता। परंतु मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की उग्रता का सामना करने क ेकारण वह एक ऐसी पार्टी को लेकर चुनावी तैयारी में लग जाएंगे जो उनके प्रति वफादार रही है। लेकिन ऐसी पार्टी चुनाव जीत सकती है या नहीं यह एकदम अलग मसला है।

आने वाले समय में जो चुनाव होने वाले हैं उनमें उत्तर प्रदेश के चुनाव सबसे अहम होंगे लेकिन दो ऐसे चुनाव भी होने वाले हैं जो समान रूप से महत्त्व रखते हैं।  एक है कर्नाटक और दूसरा पंजाब। इन दोनों चुनावों के बारे में अंतिम तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।

Keyword: अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू, पंजाब प्रदेश कांग्रेस,
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