बिजनेस स्टैंडर्ड - 'दिलचस्प समय' में जीना
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'दिलचस्प समय' में जीना

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 23, 2021

इन दिनों जब हम ऐसी सुर्खियों से गुजर रहे हैं जो मात्र सामान्य रुचि की नहीं हैं तो यह प्रश्न स्वत: उत्पन्न होता है: क्या हम चीनी अभिशाप की उक्ति के मुताबिक 'दिलचस्प समय' में जी रहे हैं जहां विविध और एक दूसरे को परस्पर आच्छादित करते हुए संकट धीरे-धीरे कुछ इस प्रकार हमारे सामने आ रहे हैं कि हमारी मौजूदा व्यवस्थाओं और संस्थानों के पास उनसे सार्थक ढंग से निपटने की क्षमता तक नहीं है? मिसाल के तौर पर जलवायु परिवर्तन को लेते हैं जिसके कारण साइबेरिया और पश्चिमोत्तर कनाडा में गर्म हवा के थपेड़े चले हैं और आग लगने की घटनाएं हुई हैं। इसके कारण यूरोप के आधा दर्जन समृद्ध देशों में असाधारण बाढ़ की घटनाएं घटित हुई हैं। ये वे जगह हैं जहां के रहने वाले लोग बस दूरदराज देशों में ऐसी घटनाएं घटित होते देखते-सुनते थे। इसके पश्चात हमारा सामना लगभग स्थायी हो चली चिकित्सकीय आपात स्थिति से भी हो सकता है।

ऐसी खबरें पढऩे में आ रही हैं कि एक दर्जन से अधिक प्रजातियों में फैल चुका वायरस शायद हमेशा बना रहे। इस वायरस के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध विकसित होने की संभावना भी नजर नहीं आ रही है। 'फॉरेन अफेयर्स' पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कहा गया है: 'पूरी तरह समाप्त होने के बजाय सार्स कोवि-2 वायरस शायद आने वाले वर्षों में बार-बार दुनिया भर में लौटकर आता रहेगा।' यानी कम से कम निकट भविष्य में तो सामान्य जनजीवन बहाल होता नहीं दिखता। तीसरा, अपेक्षाकृत खुले समाजों में अधिनायकवादी नेता, लोगों पर निगरानी रखने के लिए नई तकनीक हासिल करने की इच्छा रखते हैं। इसके चलते लोकतंत्र और उदारवाद को खतरा उत्पन्न हो गया है। इन समाजों की बढ़ती शक्ति, अस्पष्टता और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकरणों की गैरजवाबदेही ने यह स्थिति उत्पन्न की है। बड़े कारोबारी घरानों का मजबूत होता शिकंजा भी निरंतर बढ़ती चिंता का विषय है लेकिन यह अभी बड़ा खतरा नहीं बन सका है। यदि उचित कदम नहीं उठाए गए तो यह जासूसी और निगरानी तंत्र मजबूत होता जाएगा।

चौथी बात, वैश्विक स्तर पर शक्ति संतुलन में बदलाव आ रहा है। अमेरिका चीन के चौतरफा उभार को नियंत्रित कर पाने में नाकाम है। चीन क्षेत्रीय वर्चस्व कायम करना चाहता है और अमेरिकी साम्राज्यवाद को चुनौती देना चाहता है। शक्ति संतुलन में ऐसा परिवर्तन अपने साथ सैन्य संघर्ष भी लाता है। पहले विश्व युद्ध के अनेक संभावित कारणों में एक कारक जर्मनी का उभार भी था। इससे एक दशक पहले रूस और जापान के बीच हुई जंग ने जापान के उभार का संकेत दिया था।

मौजूदा समस्या को बल देने वाला आखिरी कारक है बढ़ती असमानता। यह असमानता अमीर, गरीब और मध्यम आय वाले सभी प्रकार के देशों के समाजों में भविष्य की स्थिरता के लिए खतरा है। निम्न वर्ग की बढ़ती चेतना सांस्कृतिक पहचान और जातीय संघर्ष के जरिये कड़वी हकीकत से निजात पाना चाहती है। वह इन्हें एक समय देखे गए बेहतर आर्थिक स्वप्न का विकल्प मान बैठती है। इस बीच नीति निर्माताओं के समक्ष मुद्रास्फीति और अस्थिरता दोनों का जोखिम है क्योंकि राजकोषीय और मौद्रिक प्रयोगों की अपनी सीमा है।

ये घटनाएं ऐसी ताकतों से संचालित हैं जिनकी जटिल जड़ें आर्थिक तंत्र, आपस में संबद्ध समाजों की संवेदनशीलता, ऐतिहासिक स्मृतियों, अधिक शक्तिऔर संपत्ति की आदिम लालसा आदि में निहित हैं। तकनीक लगातार एक ऐसी सभ्यता के विकास की ओर बढ़ रही है जो क्रमिक विकास के अगले चरण में पृथ्वी से परे कृत्रिम प्रजातियां निर्मित करेगी। इन रुझानों का सामना कैसे किया जाए? जलवायु परिवर्तन का खतरा पूरे विश्व के सामने आ चुका है लेकिन संतुलन बिगडऩे की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी है और कीमत चुकानी होगी। समाजों में असमानता और इसके राजनीतिक खतरों को एक नए सामाजिक यथार्थ की आवश्यकता है जहां अमीरों को अपने स्वास्थ्य से परे देखना होगा। यहां उन कामों की याद करनी उचित होगी जिन्हें बीती सदी में एक ऐसे व्यक्तिने युवा ब्रिटिश मंत्री के रूप में अंजाम दिया था जिसे उसके नस्ली साम्राज्यवाद के लिए उचित ही धिक्कारा जाता है।

विंस्टन चर्चिल ने सुधारक की अपनी अविश्वसनीय भूमिका में खदान कर्मियों के लिए दिन में 8 घंटे के काम की शुरुआत की, उन्होंने न्यूनतम वेतन और भोजनावकाश का अधिकार दिलाया, रोजगार केंद्र शुरू किए, राज्य द्वारा सब्सिडी प्राप्त बेरोजगारी बीमा योजना शुरू की और खासतौर पर एक ऐसी व्यवस्था शुरू की जहां शोषण करने वाले नियोक्ताओं को दंडित किया जा सकता था। उन्होंने अमीरों पर कर लगाने का अभियान चलाया। इसलिए नहीं कि वे वामपंथी थे बल्कि इसलिए ताकि मौजूदा व्यवस्था को एक बेहतर पेशकश के जरिये बचाए रखा जा सके। आज पुन: एक बेहतर पेशकश की जरूरत है और वह खतरे से गुजर रहे लोकतंत्रों और संस्थानों के लिए मजबूत ढांचे का काम करेगी। बिना उनके गहरी होती समस्याओं का निदान नहीं हो सकेगा।

Keyword: जलवायु परिवर्तन, आपात स्थिति, सार्स कोवि-2 वायरस, जासूसी,
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