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ग्रामीण इलाकों की स्थिति सुधरने पर टिकी उम्मीदें

श्रम-रोजगार
महेश व्यास /  July 22, 2021

जुलाई में उपभोक्ता धारणा में सुधार होता दिख रहा है। गत 18 जुलाई को समाप्त सप्ताह लगातार तीसरा हफ्ता है जब उपभोक्ता धारणा सूचकांक में वृद्धि दर्ज की गई है। गत 27 जून के बाद के तीन हफ्तों में यह सूचकांक 12.2 फीसदी तक उछल चुका है। कोविड-19 की दूसरी लहर में बुरी तरह प्रभावित उपभोक्ता धारणा अप्रैल की शुरुआत से ही गिरावट पर रही। गत 28 मार्च को समाप्त सप्ताह में यह सूचकांक 58.5 के हालिया शीर्ष स्तर पर रहा था लेकिन 27 जून आने तक यह 46.5 के स्तर तक लुढ़क चुका था। 

हालांकि उपभोक्ता धारणा में आया हालिया सुधार मुख्य रूप से ग्रामीण भारत की मेहरबानी ही है। ग्रामीण भारत में बीते तीन हफ्तों के दौरान समग्र उपभोक्ता धारणा में 17 फीसदी की जोरदार तेजी दर्ज की गई है। इनमें से हरेक हफ्ते में ग्रामीण भारत की उपभोक्ता धारणा में क्रमिक सुधार ही देखा गया। ग्रामीण इलाकों के लिए उपभोक्ता धारणा सूचकांक 4 जुलाई को समाप्त सप्ताह में 4.3 फीसदी बढ़ी थी और फिर 11 जुलाई के हफ्ते में इसमें 6.5 फीसदी की और उछाल आई। यह सिलसिला 18 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भी जारी रहा और सूचकांक 5.4 फीसदी सुधर गया। 

शहरी भारत में उपभोक्ता धारणा एक हद तक स्थिर ही रही। शहरी भारत का सूचकांक 4 जुलाई को खत्म हफ्ते में 4.2 फीसदी गिरा था लेकिन 11 जुलाई को समाप्त सप्ताह में इसमें 6.1 फीसदी की तेजी देखी गई। वहीं 18 जुलाई को समाप्त सप्ताह में यह स्थिर बना रहा। बीते तीन हफ्तों में शहरी भारत का उपभोक्ता धारणा सूचकांक सिर्फ 1.7 फीसदी ही बढ़ा है। 

संभवत: उपभोक्ता धारणा में ग्रामीण एवं शहरी भारत का यह अंतर इन दोनों क्षेत्रों में रोजगार परिदृश्य को भी बयां करता है। जहां ग्रामीण भारत में जुलाई के पहले तीन हफ्तों में रोजगार दर 6.7 फीसदी सुधरी है, वहीं शहरी भारत में इस दौरान सिर्फ 1.5 फीसदी की ही वृद्धि दर्ज की गई है।

ग्रामीण भारत में उपभोक्ता धारणा सुधरने की बुनियादी वजह यह है कि पिछले एक साल में अपनी आर्थिक स्थिति खराब होने की सोच रखने वाले लोग हैं। इसके अलावा भविष्य को लेकर निराशावादी रवैया रखने वाले लोग भी ग्रामीण इलाकों में कम हैं। लेकिन अपनी आर्थिक स्थिति सुधरने का दावा करने वाले लोग नहीं बढ़े हैं। ग्रामीण परिवारों में आर्थिक खुशहाली को लेकर मायूसी कम है लेकिन वृद्धि के प्रसार में कोई प्रगति नहीं हुई है। आर्थिक हालत बेहतर होने का दावा करने वाले परिवारों की गिनती बहुत ही कम है।

गत 18 जुलाई को समाप्त सप्ताह में ग्रामीण भारत के सिर्फ 4.6 फीसदी परिवारों ने कहा कि एक साल पहले की तुलना में उनकी आमदनी बढ़ी है। यह स्थिति 27 जून को खत्म हफ्ते से भी खराब है जब 5.4 फीसदी परिवारों ने अपनी आमदनी बढऩे की बात कही थी। इसी तरह टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद के लिए मौजूदा समय को बेहतर बताने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात भी गिरकर 1.9 फीसदी पर आ गया जबकि 27 जून को समाप्त सप्ताह में यह आंकड़ा 2.3 फीसदी था। 

भले ही ग्रामीण परिवार अपनी मौजूदा आर्थिक स्थिति को लेकर बहुत आशावाद नहीं दिखा रहे हैं लेकिन वे भविष्य को लेकर कहीं ज्यादा आशान्वित हैं। आने वाले एक साल में अपनी आय बढऩे की उम्मीद करने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात 27 जून के हफ्ते के 2.5 फीसदी से बढ़कर पिछले हफ्ते में 3.2 फीसदी हो गया। भले ही यह बहुत कम वृद्धि को दर्शाता है लेकिन संतोष की बात यह है कि यह सही दिशा में जा रहा है। आने वाले 12 महीनों में वित्तीय एवं आर्थिक हालात सुधरने की उम्मीद करने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात भी 2.8 फीसदी से बढ़कर 4.7 फीसदी हो गया। अगले पांच वर्षों में वित्तीय एवं आर्थिक परिदृश्य बेहतर होने की आस लगाने वाले परिवारों का अनुपात 2.8 फीसदी से बढ़कर 4.5 फीसदी हो गया।

ग्रामीण उपभोक्ताओं की धारणा में सुधार मॉनसून के फिर से सक्रिय होने का नतीजा भी हो सकता है। 30 जून और 7 जुलाई को समाप्त सप्ताह में मॉनसूनी बारिश क्रमश: सामान्य से 30 फीसदी और 46 फीसदी कम थी। लेकिन 14 जुलाई को समाप्त सप्ताह में मॉनसूनी बारिश सामान्य से सिर्फ 7 फीसदी ही कम थी। 

ऐसा लगता है कि इस साल मॉनसून थोड़ा कमजोर रहेगा। शुरुआती संकेतों से पता चलता है कि 21 जुलाई को समाप्त सप्ताह भी कुछ खास अच्छा नहीं रहेगा। मॉनसून में गड़बड़ी का असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ता रहा है। गत 16 जुलाई तक खरीफ फसलों की बुआई एक साल पहले की तुलना में 11.6 फीसदी कम हुई है। गन्ना, अरहर, सूर्यमुखी एवं जूट को छोड़कर सभी अहम फसलों की बुआई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। कीमतों में जारी तेजी के बीच मौसम विज्ञान विभाग अब भी मॉनसून के सक्रिय होने और सामान्य बारिश की ही बात कर रहा है। ऐसे में उम्मीद यही है कि ठीक-ठाक बारिश हो जाएगी। 

भारतीय कॉर्पोरेट जगत के बड़े हिस्से ने अपनी वृद्धि के लिए ग्रामीण भारत से उम्मीदें लगाई हुई हैं। कोविड-19 महामारी में लगे दो झटकों के बाद गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां कर्ज फंसने के मामले बढऩे की शिकायत कर रही हैं। आमदनी में गिरावट थमने की बात करने वाले परिवारों की तादाद बढऩे से ऐसी कंपनियों को थोड़ी राहत मिलेगी। निश्चित रूप से, यह महज शुरुआत है। रोजमर्रा के उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियों का मानना है कि उनके लिए शहरी बाजार लगभग संतृप्त हो चुके हैं और ग्रामीण भारत में उनके लिए वृद्धि की ज्यादा संभावनाएं हैं। लेकिन इन बाजारों के विकास के लिए यह जरूरी है कि आमदनी में बढ़त की बात करने वाले परिवारों की गिनती बढ़े। सिर्फ आमदनी कम होने वाले परिवारों की गिनती कम होना ही काफी नहीं है। उपभोक्ता उत्पाद विनिर्माता कंपनियों को खरीदारी की चाह रखने वाले परिवारों की संख्या में वृद्धि की जरूरत है। लेकिन ऐसा होना तो अभी दूर की कौड़ी ही है।

Keyword: ग्रामीण इलाके, उपभोक्ता धारणा सूचकांक, ग्रामीण परिवार,
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