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दूरसंचार: थम नहींं रहीं चुनौतियां

सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली July 21, 2021

दूरसंचार ऑपरेटरों की एक बार फिर पिछली तारीख से सरकार को भुगतान करने की मजबूरी हो सकती है। दरअसल दूरसंचार विभाग ऑपरेटरों को महत्त्वपूर्ण बैकहॉल स्पेक्ट्रम का आवंटन एक निर्धारित मूल्य ढांचे के तहत कर रहा है। माइक्रोवेव लिंकेज के जरिये दूरदराज के टावरों के बीच कनेक्टिविटी स्थापित करने के लिए इस स्पेक्ट्रम की जरूरत होती है।

समझौते में एम महत्त्वपूर्ण पेंच यह है कि सरकार यदि इस स्पेक्ट्रम की नीलामी करती है तो दूरसंचार कंपनियों को नीलामी के तहत निर्धारित कीमत का भुगतान पिछली तारीख से करना होगा। इसका कारण बिल्कुल आसान है कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के कारण इस बात को समझौते में शामिल करना आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने 122 लाइसेंसों को रद्द करने का आदेश देते समय सरकार को यह भी निर्देश दिया था कि स्पेक्ट्रम एक दुर्लभ संसाधन है और उसकी केवल नीलामी की जानी चाहिए।

हालांकि सरकार ने अस्थायी आधार पर मामूली मूल्य के साथ सशर्त स्पेक्ट्रम आवंटन को जारी रखा। लेकिन आगामी 5जी सेवाओं के साथ ही यह मुद्दा उभरकर फिर सामने आ गया है। इस बात को लेकर घमासान मचा हुआ है कि क्या सरकार को एल एवं वी स्पेक्ट्रम की नीलामी करनी चाहिए जैसा कि दूरसंचार कंपनियां मांग कर रही हैं। अथवा उसे मामूली कीमत पर उपलब्ध कराना चाहिए जैसा कि प्रौद्योगिकी कंपनियां मांग कर रही हैं। यदि सरकार नीलामी करने का निर्णय लेती है तो दूरसंचार कंपनियों को आवंटित किए गए दिन से बैकहॉल एवं वीसैट स्पेक्ट्रम के लिए बाजार दरों को खोलना पड़ सकता है। ऐसे में सभी के लिए स्पेक्ट्रम केवल नीलामी के जरिये ही उपलब्ध होंगे।

दूरसंचार ऑपरेटरों में रिलायंस जियो ने सबसे पहले यह रुख अपनाया था। उसका कहना है कि ई और वी बैंड (ये स्पेक्ट्रा बहुत तेज गति प्रदान करते हैं लेकिन सीमित कवरेज के दायरे में) का उपयोग बैकहॉल के साथ-साथ 5जी सेवाओं के लिए भी किया जा सकता है। इसलिए इनकी नीलामी की जानी चाहिए।

दूसरी ओर ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम इसका विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि दुनिया के अन्य देशों की तरह उन्हें मामूली कीमत पर बिना लाइसेंस वाला बैंड उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि वाईफाई के जरिये ब्रॉडबैंड का विस्तार किया जा सके जहां भारत की स्थिति कमजोर है। गूगल और फेसबुक जैसी प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियां इस फोरम की सदस्य हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि यदि इस बैंड की नीलामी की जाती है तो दूरसंचार कंपनियों को स्पेक्ट्रम वापस करने और उसे अन्य स्पेक्ट्रम की तरह नीलाम करने का ओई औचित्य नहीं होगा। इस विचार का समर्थन करने वाले लोगों का यह भी कहना है कि दूरसंचार कंपनियां पिछली तारीख से भुगतान करने के लिए इच्छुक हैं ताकि वे खासतौर पर वाईफाई ब्रॉडबैंड के लिए दुनिया भर में दिखने वाली नई प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए तैयार हो कर सके।

Keyword: दूरसंचार, ऑपरेटर, बैकहॉल स्पेक्ट्रम, आवंटन,
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