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बीसवीं सदी के सबसे बड़े सैन्य जनरल

शंकर आचार्य /  07 20, 2021

सैन्य इतिहास के अनुरागियों की चर्चा का एक पसंदीदा सवाल होता है कि बीसवीं सदी का सबसे बड़ा सेनापति कौन रहा है? आम तौर पर लोगों का ध्यान दूसरे विश्व युद्ध पर ही होता है क्योंकि पहला विश्व युद्ध खंदकों में छिपकर युद्ध करने के कौशल और आत्मघाती हमले की कोशिशों से भरपूर था और उसमें सैन्य-नेतृत्व की तारीफें नहीं भरी थीं। बेहतरीन सेनापतियों के तौर पर जर्मन सेना के रॉमेल, गुदेरियन, वॉन मैंस्तीन एवं वॉन रंडस्टेड, रेड आर्मी के कोनेव एवं रोकोसोवस्की और आंग्ल-सैक्सन सहयोगियों के ब्रैडली, मॉन्टगोमरी, पैटन एवं स्लिम के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। उपलब्ध रैंकिंग में जर्मन सैन्य जनरल आम तौर पर शीर्ष पर हैं, भले ही उनके देश को आखिरकार हार झेलनी पड़ी थी। 

लेकिन बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ जनरल के तौर पर मेरी पसंद थोड़ी अलग है। वह एशिया के एक ऐसे छोटे एवं गरीब उपनिवेश देश से ताल्लुुक रखते थे जिसका वैश्विक मामलों पर शायद ही कोई असर था। निश्चित तौर पर मेरा इशारा वियतनाम के वॉ विन जैप की तरफ है। आप उनके रिकॉर्ड पर नजर डालें और मुझे बताएं कि क्या मैं गलत हूं? 

वर्ष 1911 में जन्मे जैप को अच्छी शिक्षा मिली और उसके बाद वह एक शिक्षक एवं पत्रकार के तौर पर काम करने लगे। वह 1941 में हो ची मिन के चलाए स्वतंत्रता आंदोलन 'वियत मिन' से जुड़ गए। ची मिन ने 1944 में जैप को सैन्य शाखा बनाने का दायित्व सौंपा। शुरू में इस सैन्य टुकड़ी में 34 दुबले-पतले युवक ही मौजूद थे और इस टुकड़ी के पास सिर्फ एक लाइट मशीनगन और पुरानी पड़ चुकीं करीब दो दर्जन फ्लिंटलॉक राइफलें ही थीं। लेकिन कुछ वर्षों में ही जैप ने इस सैन्य समूह को एक भरोसेमंद सेना के रूप में तब्दील कर दिया। वर्ष 1975 में जब विजेता उत्तर वियतनामी सेना (एनवीए) और छापामार समूह वियत कॉन्ग ने सैगॉन स्थित अमेरिकी दूतावास की छत से अंतिम अमेरिकी सैनिकों को उड़ान भरने को मजबूर किया तो वियतनाम की सेना का आकार 8 लाख हो चुका था और सोवियत संघ एवं चीन से मिली मदद के दम पर इस सेना के पास रसद भी भरपूर थी। इसका श्रेय तत्कालीन भू-राजनीतिक हालात में जैप की असाधारण कूटनीतिक एवं साजो-सामान जुटाने की क्षमताओं को जाता है। (शुरुआत में 1945 में जापान की आक्रांता सेना के खिलाफ मित्र सेना की मदद के लिए सीआईए के पूर्ववर्ती संगठन ओएसएस ने वियतनाम के हजारों युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया था। जैप का अगले 30 वर्षों तक इस सेना पर नियंत्रण बना रहा। इस दौरान वह कई लड़ाइयां जीते तो कुछ में हार भी मिली लेकिन वह पहले फ्रांस (1954) और फिर अमेरिकी सेना (1975) को वियतनाम एवं हिंद-चीन क्षेत्र से बाहर खदेडऩे में सफल रहे। हालांकि वह उसके बाद भी कई वर्षों तक वियतनाम के रक्षा मंत्री बने रहे लेकिन धीरे-धीरे उनका प्रभाव कम होता गया और 1991 में वह सेवानिवृत्त हो गए। उसके बाद भी वह एक लंबी जिंदगी जिए और 102 वर्ष की दीर्घायु में उन्होंने हनोई के एक सैन्य अस्पताल में 2013 में अंतिम सांस ली। 

वास्तव में जैप को पहली महान जीत उत्तर-पश्चिम वियतनाम की डिएन बिएन फू घाटी में मिली थी। फ्रांसीसी सेना के जनरल नवार ने अपने 15,000 काबिल जवानों को 1953 के पतझड़ के समय उस घाटी में तैनात कर दिया था ताकि चीन से आने वाली रसद आपूर्ति को बाधित किया जा सके। घने जंगल से भरे पहाड़ी इलाके में तैनात फ्रांसीसी सेना तक आपूर्ति हवाई मार्ग से ही पहुंचाई जा सकती थी जिसके लिए घाटी की तलहटी में एक हवाईपट्टी भी बनाई गई थी। फ्रांसीसी सेना को लग रहा था कि पहाड़ी इलाके में होने से वियत मिन लड़ाकों से उसे सुरक्षा मिली हुई है। इसकी वजह वह भरोसा था कि जैप के पास तोपें नहीं हैं  और सड़कें न होने से भारी तोपों को पहाड़ों की चोटी पर पहुंचाया भी नहीं जा सकता था। लेकिन जैप ने इन दोनों ही आकलनों को गलत साबित कर दिया। उन्होंने सेना में जबरन भर्ती किए गए हजारों किसानों का इस्तेमाल करते हुए करीब 200 हेवी गन और हॉॅवित्जर तोपों को पुर्जा-पुर्जा कर जंगली इलाके से होते हुए घाटी के ऊपरी इलाकों तक पहुंचा दिया। इसके लिए आनन-फानन में जंगल के बीच रास्ते तैयार किए गए जिनके जरिये साइकिलों पर लादकर तोपों के पुर्जे ऊपर भेजे गए। चोटी पर हेवी गन को जमीन में खोदकर छिपा दिया गया ताकि फ्रांस के हवाई हमलों से बचाया जा सके। मार्च 1954 में जैप के आदेश पर इन तोपों ने घाटी की तलहटी पर भारी गोलाबारी की और वहां मौजूद हवाईपट्टी को उड़ान के लिए नाकाम कर दिया। इस तरह नवार की सेना का संपर्क रसद के ठिकाने से कट गया। हो ची मिन ने अपने उलटे हेलमेट की तरफ इशारा करते हुए एक अमेरिकी संवाददाता से कहा था, 'देखो, फ्रांसीसी सेना इस निचली जगह पर है और हम उनके चारों तरफ मौजूद हैं। फ्रांसीसी वहां से बाहर नहीं आ सकते हैं।' आखिरकार फ्रांसीसी सैनिकों ने 7 मई को समर्पण कर दिया। उसी दिन हिंद-चीन पर जिनेवा सम्मेलन शुरू हुआ था। फ्रांस ने वियतनाम से हटने का ऐलान किया लेकिन बड़ी शक्तियों ने जिनेवा सम्मेलन में वियतनाम को दो हिस्सों में बांटने का फैसला कर दिया। उत्तर वियतनाम एवं दक्षिण वियतनाम में विभाजन का यह फैसला ही 1960-75 तक चले 'दूसरे हिंद-चीन युद्ध' का आधार बना। अपना प्रभाव-क्षेत्र कम होने और समूचे एशिया में साम्यवाद के प्रसार को लेकर भ्रम के शिकार अमेरिकियों ने पहले तो सैकड़ों की संख्या में सैन्य सलाहकार दक्षिण वियतनाम भेजे, फिर अपने नियमित सैनिकों को भेजना शुरू कर दिया और 1968 तक करीब 5 लाख अमेरिकी सैनिक वियतनाम की जमीन पर कदम रख चुके थे। इस पूरी कवायद का मकसद दक्षिण वियतनाम की सेना को वियत कॉन्ग एवं एनवीए के लड़ाकों से लडऩे में मदद करना था। इस छोटे गरीब देश पर अमेरिकियों ने अकेले उतने बम गिरा दिए जितने दूसरे विश्व युद्ध में सारी मित्र सेनाओं ने मिलकर नहीं बरसाए थे। 

80 हजार से लेकर करीब 1 लाख सैनिक दक्षिण वियतनाम के अहम सामरिक ठिकानों तक घुसपैठ करने में सफल रहे और उसके बाद जनवरी 1968 में जैप की सेना ने मशहूर तेत धावा बोल दिया जिसमें 40 प्रांतों की राजधानियों एवं सैगॉन के कुछ हिस्सों को भी निशाना बनाया गया। अमेरिकी दूतावास भी इसकी जद में आया। हालांकि यह हमला जैप के लिए एक बड़ी रणनीतिक असफलता साबित हुई जिसमें उन्हें हजारों सैनिकों एवं वियत कॉन्ग लड़ाकों की जान गईं। इसके साथ ही जैप के कब्जे में कोई इलाका भी नहीं आया और न ही व्यापक स्तर पर किसान विद्रोह ही भड़का। लेकिन आगे चलकर यह सामरिक नजरिये से एक मास्टर-स्ट्रोक साबित हुआ। इसके बाद अमेरिकी जनता और सरकार में बैठे कुछ लोगों के बीच भी इस मुद्दे पर बहस होने लगी कि चार वर्षों की घोषित जंग के बावजूद एनवीए और वियत कॉन्ग अब भी इतने मजबूत हैं कि दक्षिण वियतनाम में कहीं भी धावा बोल सकते हैं। अमेरिका में जनमत निर्णायक रूप से इस जंग के खिलाफ हो गया और राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को अगले चुनावों से अपनी दावेदारी वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनके बाद सत्ता में आए रिचर्ड निक्सन ने जल्द ही उत्तर वियतनाम के साथ पेरिस शांति वार्ता शुरू कर दी।

शायद दूसरे हिंद-चीन युद्ध में जैप का सबसे बड़ा योगदान उत्तर वियतनाम से लाओस एवं कंबोडिया होते हुए दक्षिण वियतनाम तक जाने वाले 'हो ची मिन पथ' का निर्माण था। करीब 20,000 किलोमीटर लंबे इस रास्ते को जंगली इलाकों के बावजूद गाडिय़ों के चलने लायक बनाया गया। यह अमेरिकी सेना की लगातार होने वाली हवाई बमबारी और जमीनी हमलों के बीच एक अद्भुुत प्रयास था और सीमित उपकरणों की मदद से बनाया गया था। यह मार्ग एनवीए और वियत कॉन्ग को दक्षिण वियतनाम में खाद्य एवं रसद पहुंचाने में बेहद मददगार रहा। इसके बगैर वे कभी भी जीत नहींं सकते थे। 

इस तरह जनरल वॉ विन जैप ने पहले तो सौ साल पुराने फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन का 1954 में डिएन बिएन फू में खात्मा किया और फिर स्वतंत्र वियतनाम को एकजुट करने के लिए 1975 में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी मात देने में सफल रहे। बीसवीं सदी के किस दूसरे जनरल ने इससे ज्यादा किया?

(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

Keyword: सैन्य जनरल, विश्व युद्ध, आत्मघाती हमले, वियतनाम, वॉ विन जैप,
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