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क्या सत्ता परिवर्तन से बदलेगी पड़ोसी देश नेपाल की तकदीर

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 20, 2021

नेपाल में हाल का राजनीतिक घटनाक्रम खासा नाटकीय रहा है। सत्ता के लिए चल रही रस्साकशी और उसके बाद 13 जुलाई को शीर्ष न्यायालय के आदेश के बाद प्रधानमंत्री के पी ओली को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-माओइस्ट सेंटर (सीपीएन-एमसी) के पुष्पकुमार दहल उर्फ प्रचंड ने ओली पर इस्तीफा देने के लिए अत्यंत दबाव बना रखा था। ओली की पार्टी को संसद में दो तिहाई बहुमत प्राप्त था और छह प्रांतों की सरकार भी उनके नियंत्रण में थी, लेकिन यह ताकत काम नहीं आई।

प्रचंड ने ओली को पद से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी और अंत में इसका लाभ नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा (75 वर्ष) को मिल गया। देउबा ने पिछले सप्ताह नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। नेपाल की संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में 275 सदस्यों में केवल 63 सदस्य उनके साथ हैं। ओली का विरोध करने वाले प्रचंड और सासंदों का एक समूह उनकी सरकार की स्थिरता के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे। इतना तो निश्चित है कि देउबा को गद्दी पर बने रहने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना होगा। 

आखिर नेपाल में यह नौबत क्यों आई? नेपाल में 1996 से 2006 तक माओवादियों का आंदोलन चल रहा था और 2015 में नेपाल में नया संविधान बनकर तैयार हुआ। नए संविधान के तहत 2017 में पहली बार राष्ट्रीय चुनाव हुए। 

इस चुनाव में ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड माक्र्सिस्ट लेनिनिस्ट (सीपीएन-यूएमएल) और प्रचंड की सीपीएन-एमसी को भारी सफलता मिली। उन्होंने अपने गठबंधन का नाम नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) रख दिया। 

शुरू में दोनों सहयोगियों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बारी-बारी से बैठने का निर्णय लिया। इसके बाद वे 'एक व्यक्ति एक पद' की व्यवस्था पर सहमत हो गए। इस नई व्यवस्था के तहत ओली प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसन्न रहे जबकि प्रचंड पार्टी के अध्यक्ष बने रहे। हालांकि बाद में प्रचंड और उनके समर्थक ओली पर वादे पूरे नहीं करने और एकतरफा निर्णय लेने का आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने पर आमादा हो गए। दो धड़ों में यह संघर्ष साढ़े तीन वर्षों तक चला। 

ओली भी अपनी जिद पर अड़े रहे। उन्होंने अपने समर्थकों से कह दिया कि वह प्रचंड को कभी प्रधानमंत्री बनने नहीं देंगे। इसके बाद उन्होंने पिछले वर्ष दिसंबर में नेपाल की संसद के निचले सदन को भंग कर दिया। हालांकि नेपाल के शीर्ष न्यायालय ने ओली का निर्णय पलट दिया और सदन में विश्वास मत प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। ओली मई में विश्वास मत हासिल करने में विफल रहे और उन्होंने राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से संसद दोबारा भंग करने की सिफारिश कर डाली। राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दी और सरकार गठन के देउबा के दावे पर विचार नहीं किया। देउबा ने दावा किया था कि उन्हें 146 सांसदों का समर्थन प्राप्त है और अवसर मिलने पर वह सरकार गठन करने में सक्षम हैं। 

इस बीच, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के घटक विभिन्न गुटों में बंट गए। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में एक धड़े ने देउबा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। नेपाल के तराई इलाके सक्रिय जनता समाजवादी पार्टी (जेएसपी) और माधव नेपाल समूह के समर्थन के दम पर देउबा ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। 

शीर्ष न्यायालय ने इस शर्त के साथ उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का आदेश दिया कि वह सदन में अपना बहुमत साबित कर देंगे। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि जिन सांसदों ने मई में देउबा के पक्ष में हस्ताक्षर किए थे उन पर पार्टी का व्हिप लागू नहीं होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायालय ने साफ कर दिया कि माधव नेपाल समूह ओली की पार्टी में रह सकता है लेकिन उसके सदस्य देउबा के पक्ष में मतदान करने के लिए स्वतंत्र हैं। इस निर्देश के बाद देउबा के लिए सरकार गठन का रास्ता साफ हो गया। नेपाल के संविधान में कहा गया है कि दो वर्षों में केवल एक बार विश्वास मत हासिल करने की आवश्यकता होगी। अभी चुनाव होने में 18 महीने का समय है। 

49 सांसदों के साथ प्रचंड खेमा देउबा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। यह एकमात्र चुनौती नहीं है। भारत की सीमा से सटे तराई क्षेत्र के दलों की भी कुछ अपेक्षाएं हैं। इनमें एक है नागरिकता का मुद्दा जिसे ओली ने इन दलों के समर्थन के एवज में स्वीकार कर लिया था। मगर उच्चतम न्यायालय ने मधेसी समुदाय को अधिक अधिकार देने के ओली के कई निर्णयों को निरस्त कर दिया। देउबा को इनमें कुछ अधिकार बहाल करने होंगे। संसद में पहाड़ी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल एवं खेमे इसका विरोध कर सकते हैं। 

चीन के साथ संबंध पर भी सबकी नजरें होंगी। पिछले कुछ वर्षों के दौरान चीन ने नेपाल पर खासा प्रभाव बना लिया है। वर्ष 2017 में नेपाल ने चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) योजना का समर्थन किया था और अब नेपाल के कई गांवों के स्कूलों में मंदारिन भाषा नि:शुल्क सिखाई जाती है। 

दूसरी तरफ नेपाल, खासकर नेपाली कांग्रेस का भारत के साथ विशेष संबंध रहा है। दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध होने के साथ ही 'बेटी-रोटी' का भी रिश्ता है। नेपाल में लोकतंत्र के लिए चल रहे आंदोलन को भारत के समाजवादियों एवं कम्युनिस्टों का समर्थन प्राप्त था। देउबा नेपाल के प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे लेकिन चुनौतियों की कमी नहीं होगी। हालांकि वर्तमान स्थिति उनके लिए नई नहीं है। अपने पिछले चार कार्यकालों में वह एक बार भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए हैं। हालांकि अस्थिरता के बीच नई चीजें भी सामने आती हैं। सरकार चलाने का देउबा का अनुभव उनकी विश्वसनीयता में इजाफा कर सकता है, भले ही इस विश्वसनीयता का स्रोत शीर्ष न्यायालय ही क्यों नहीं हो।

Keyword: सत्ता परिवर्तन, पड़ोसी देश, नेपाल, राजनीतिक घटनाक्रम, सीपीएन-एमसी,
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