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धूमिल उम्मीद

संपादकीय /  July 20, 2021

ऐसी खबरें हैं कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने गत सात वर्षों में आठ लाख करोड़ रुपये मूल्य का ऋण बट्टे खाते में डाल दिया है। यह इसी अवधि में सरकार द्वारा इन बैंकों में डाली गई 3.37 लाख करोड़ रुपये की पूंजी के दोगुने से अधिक है। वित्त वर्ष 2018-19 में सर्वाधिक 1.83 लाख करोड़ रुपये मूल्य के कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया। गत चार वर्ष सरकारी बैंकों के लिए खासतौर पर बुरे रहे क्योंकि इस अवधि में हर वर्ष एक लाख करोड़ रुपये की राशि को बट्टे खाते में डाला गया। यह अच्छी स्थिति नहीं है और सरकार बैंकिंग तंत्र में भारी भरकम धन राशि डालना जारी नहीं रख सकती। सरकार बीते कुछ वर्षों से बजट संबंधी दिक्कतों के कारण पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड जारी कर रही है, परंतु इस माध्यम की भी अपनी सीमाएं हैं।

देश के बैंकिंग तंत्र में अधिकांश परिसंपत्तियों के हिस्सेदार सरकारी बैंकों की स्थिति ठीक नहीं है और यह बात लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है। भले ही महामारी की दूसरी लहर ने बैंकों पर सीमित असर डाला लेकिन रिजर्व बैंक के मुताबिक सरकारी बैंकों की सकल गैर निष्पादित परिसंपत्ति (जीएनपीए) के मार्च 2022 तक 12.52 फीसदी हो जाने का अनुमान है। चूंकि अधिकांश सरकारी बैंकों का मूल्यांकन कम है और वे बाजार से पूंजी जुटाने की स्थिति में नहीं हैं इसलिए सरकार को जब भी महामारी से त्रस्त अर्थव्यवस्था की मदद के लिए सार्वजनिक व्यय बढ़ाने की आवश्यकता होगी तब उसे इनमें पूंजी डालनी होगी। अगर बैंकों में पूंजी नहीं डाली गई तो अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को ऋण प्रवाह प्रभावित होगा। इससे आर्थिक सुधार पर असर होगा।

फंसा हुआ कर्ज बढऩे की शुरुआत गत दशक के शुरुआती वर्षों में हुई। ऐसा इसलिए हुआ कि वैश्विक वित्तीय संकट के पहले और बाद में खूब जमकर ऋण दिया गया। परंतु बैंक संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को चिह्नित नहीं कर रहे थे। ऐसे में आरबीआई ने वर्ष 2015-16 के दौरान परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की जिससे फंसे हुए कर्ज में इजाफा हुआ। अनुमान के मुताबिक सरकारी बैंक इस फंसे कर्ज के सबसे बड़े हिस्सेदार थे और सरकार को इनका सुचारु परिचालन करने के लिए पूंजी डालनी पड़ी। सरकारी बैंकों के संकट की एक बड़ी वजह थी उनका कारोबारों का समुचित आकलन नहीं कर पाना। सरकारी क्षेत्र के बैंकर भी समय पर फंसे कर्ज को चिह्नित करने के अनिच्छुक थे क्योंकि जांच एजेंसियों का डर सता रहा था। इससे समस्या और विकराल हो गई। इनमें से अधिकांश विषयों पर काफी बहस हो चुकी है और सरकार ने सरकारी बैंकों का कामकाज सुधारने के लिए कई कदम भी उठाए हैं। परंतु लगता नहीं कि उनका कुछ खास असर हुआ है। मोटे तौर पर ऐसा इसलिए हुआ कि सरकारी बैंकों की प्रकृति और उनके ढांचे को अछूता छोड़ दिया गया। 

सरकार ने एक ऋणशोधन कानून भी बनाया जिसने कर्जदाताओं की स्थिति मजबूत की लेकिन वसूली अब तक नगण्य ही रही है। चूंकि यह स्पष्ट है कि सरकारी बैंकों के सुधार की सीमा है और उनके सरकारी वित्त पर बोझ बने रहने की संभावना है तो ऐसे में सरकार को उनके निजीकरण की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए। सरकार चालू वित्त वर्ष में दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का इरादा जता चुकी है और नीति आयोग ने अपनी अनुशंसाएं भी कर दी हैं। इस दिशा में प्रगति के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है और आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक बैंकों के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिए। इससे न केवल बैंकिंग तंत्र को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी बल्कि सरकार द्वारा इस क्षेत्र में पैसा फंसाने पर भी रोक लगेगी।

Keyword: धूमिल उम्मीद, सरकारी क्षेत्र के बैंक, ऋण, बट्टे खाते, बैंकिंग तंत्र,
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