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आईटी से लेकर दूरसंचार दिग्गज तक लगा रहे 5जी पर जोर

सुरजीत दास गुप्ता /  July 17, 2021

दुनिया भर में 5जी उपकरणों एवं समाधानों का तेजी से बढ़ता बाजार एक बड़ा अवसर लेकर आया है जिसका लाभ उठाने के लिए घरेलू सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) फर्मों एवं दूरसंचार दिग्गजों के साथ छोटे उपकरण विनिर्माता भी बड़े हिस्से पर कब्जा जमाने के लिए आक्रामक ढंग से आगे बढ़ रहे हैं।  भारती एयरटेल ने कुछ समय पहले टीसीएस के साथ एक रणनीतिक गठजोड़ करने की घोषणा की जिसके तहत ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क (ओ-रान) तकनीक पर आधारित 5जी नेटवर्क तैयार किए जाएंगे। इस भागीदारी के तहत बने उत्पाद एवं समाधान शुरुआत में भारतीय बाजार में ही उतारे जाएंगे लेकिन आगे चलकर उन्हें बाहरी बाजारों में भी पेश किया जाएगा। इससे भारती एयरटेल को रिलायंस जियो का मुकाबला करने में आसानी होगी जो कई शहरों में 5जी ओ-रान समाधानों का परीक्षण करने में जुटा हुआ है। 

टेक महिंद्रा, सांख्य लैब्स, सिएंट, एचसीएल टेक्नोलॉजिज और घरेलू उपकरण-निर्माता स्टरलाइट एवं एचएफसीएल भी इस होड़ में शामिल होने के लिए कमर कस चुके हैं।

सवाल है कि 5जी नेटवर्क पर उपलब्ध ओ-रान तकनीक भारत में किस तरह के बदलाव लेकर आएगी? आज से 15 साल पहले दूरसंचार नेटवर्क की इमारत की बुनियादी ईंटें मालिकाना हक वाली उस तकनीक पर आधारित थीं जिन पर एरिक्सन, नोकिया, अल्काटेल, लूसेंट एवं मोटोरोला जैसी चंद कंपनियों का कब्जा था। दूरसंचार कंपनियों को किसी एक कंपनी से ही समूचा ढांचा खरीदना होता था जिसमें हार्डवेयर एवं साफ्टवेयर दोनों ही शामिल होते थे। 

4जी तकनीक आते ही दूरसंचार ऑपरेटर पहले से ज्यादा विकल्प एवं अधिक तेज प्रोसेसिंग वाले सर्वर की ख्वाहिश रखने लगे। लेकिन इस तरह की सुविधा दूसरे वेंडर के साथ जुडऩे पर ही संभव हो सकती थी। उपकरण निर्माताओं ने प्रमुख उपकरणों पर अपने नियंत्रण को शिथिल किया और वेंडर मालिकाना हक के बजाय मुक्त सॉफ्टवेयर की पेशकश करने लगे। इस तरह ऑपरेटरों को साफ्टवेयर एवं हार्डवेयर अलग-अलग वेंडरों से खरीदने की छूट मिल गई। उनके पास अब एचपी, डेल एवं सिस्को से हार्डवेयर खरीदने और रेड हैट एवं आईबीएम से सॉफ्टवेयर खरीदने का भी विकल्प उपलब्ध हो गया। इनके अलावा घरेलू स्तर पर सक्रिय उपकरण निर्माताओं का विकल्प भी था। 

लेकिन ओ-रान बाजार फिर भी बड़ी कंपनियों के ही कब्जे में बना रहा। विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा होने की वजह यह है कि दूरसंचार कंपनियों के लिए नेटवर्क की पूंजी लागत का 70-80 फीसदी रैपिड एक्सेस नेटवर्क का ही होता है। ऐसी स्थिति में दूरसंचार उपकरण बनाने वाली बड़ी कंपनियों ने अभी तक अपना नियंत्रण बनाए रखा है। 

लेकिन 5जी तकनीक आने के साथ ही दो चीजें बदल गईं। कंपनियों के विलय एवं अधिग्रहण के बाद दुनिया भर में बड़े आकार की सिर्फ चार उपकरण कंपनियां ही रह गईं- एरिक्सन, नोकिया, सैमसंग एवं हुआवे। अमेरिका एवं चीन के बीच पैदा हुए कारोबारी तनाव और भारत समेत कई देशों में चीनी 5जी उपकरणों के प्रवेश पर लगी पाबंदी ने एक तरह से एरिक्सन एवं नोकिया को दोहरे प्रभुत्व की स्थिति पैदा कर दी। जहां तक सैमसंग का सवाल है तो उसकी वैश्विक पहुंच अभी सीमित है और वह इस बाजार की एक नई खिलाड़ी है।  दूसरी, भारत जैसे देश में दूरसंचार फर्मों के 5जी नेटवर्क खड़ा करने पर भारी निवेश की जरूरत को देखते हुए पूंजी लागत घटाने का दबाव बढ़ गया है। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब बाजार में ज्यादा वेंडर हों और प्रतिस्पद्र्धी माहौल हो।

आखिर, रिलायंस जियो के बाजार में उतरने के बाद से शुल्क दरें नाटकीय रूप से कम हुई हैं और पिछले दो साल से दरों में कोई इजाफा नहीं हुआ है। इसके अलावा 5जी स्पेक्ट्रम लेने के लिए तगड़ा आधार मूल्य भी देना है। यह कीमत दुनिया भर में 5जी स्पेक्ट्रम के उच्च मूल्य स्तर में शुमार है। भारत में स्पेक्ट्रम शुल्क 5जी नेटवर्क की आधी लागत से ज्यादा है।

इसका समाधान ओ-रान है। इसके नए मानक एवं विशेष लक्षणों को वैश्विक ओ-रान अलायंस ने तैयार किया है जिससे दुनिया की 150 से ज्यादा कंपनियां जुड़ी हुई हैं। नया मानक मुक्त सॉफ्टवेयर पर आधारित है जहां नेटवर्क में विभिन्न ब्लॉक इतने अलग तरह के हैं कि दूरसंचार कंपनियां उन्हें अलग-अलग वेंडरों से खरीद सकती हैं। वे सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर अलग-अलग वेंडरों से खरीद सकती हैं लेकिन विभिन्न ब्लॉक को एक साथ जोडऩे के लिए एक सिस्टम की जरूरत होती है। ऑपरेटरों के लिए इसके बड़े फायदे हैं। वैश्विक उद्योग अनुमानों के मुताबिक प्रतिस्पद्र्धा की वजह से पूंजी लागत में 40 फीसदी से ज्यादा की बचत हो सकती है। इसके अलावा दूरसंचार कंपनियों के लिए नई सेवाएं जोडऩा, क्षमता बढ़ाना और तकनीक को तेजी से अपडेट करना अधिक आसान होगा। 

इसके नकारात्मक पहलू भी हैं। मौजूदा ऑपरेटरों का कहना है कि पूंजी लागत में आई कमी की भरपाई ऊंची परिचालन लागत कर देगी क्योंकि उन्हें अब सिस्टम एकीकरण पर खर्च करना होगा। इसके अलावा ओ-रान अभी तक 5जी पर साबित नहीं हुआ है। अभी तक जापानी कंपनी राकुतेन द्वारा स्थापित ओ-रान नेटवर्क ही इकलौता उदाहरण है। मुक्तस्रोत होने से सुरक्षा से जुड़े जोखिम भी बढऩे का खतरा है।

ओ-रान में तीन ब्लॉक होते हैं। रेडियो इकाई फ्रीक्वेंंसी सिग्नल को रिसीव करने के बाद उसे ट्रांसमिट भी करती है। यह इकाई सिग्नल को परिवद्र्धित एवं डिजिटाइज भी करती है। इसके अलावा दो आधार बैंड इकाइयां भी होती हैं- केंद्रीय इकाई एवं वितरित इकाई। डेटा यहीं पर प्रोसेस होता है और फिर उसे नेटवर्क में भेजा जाता है। रेडियो इकाई के पास स्थित केंद्रीय इकाई को क्लाउड पर भी होस्ट किया जा सकता है- या तो तीसरे पक्ष की साइट पर या फिर अपना खुद का निजी क्लाउड बनाकर। रिलायंस जियो भी क्लाउड पर 5जी नेटवर्क बनाने के लिए गूगल के साथ मिलकर काम कर रहा है। 

कई भारतीय फर्में अब ओ-रान रेडियो का डिजाइन बनाने एवं विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं और 5जी तकनीक में मौजूदा समय से करीब तीन गुना अधिक टावरों की जरूरत पड़ेगी। स्टरलाइट एक ऐसा रेडियो बनाने में जुटी है जिसका विनिर्माण वीवीडीएन करेगी, एचएफसीएल दोनों ही काम करेगी, रिलायंस जियो विनिर्माण का काम आउटसोर्स करेगी और टीसीएस ने अत्याधुनिक ओ-रान के साथ 5जी कोर भी तैयार किया है। एक रेडियो एक्सेस नेटवर्क की लागत में रेडियो की खासी हिस्सेदारी होती है। रिलायंस जियो ने पहले ही 5जी कोर बना लिया है और सरकारी संस्था सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमेटिक्स के साथ भागीदारी की संभावना जताई जा रही है। मुंबई की फर्म पर्टसोल भी इस दिशा में प्रयासरत है। सिस्टम एकीकरण में एक अहम भूमिका निभाने की भी गुंजाइश है। टीसीएस ने सिस्टम एकीकरण की दिशा में भारती एयरटेल के साथ मिलकर काम करने की घोषणा की है जबकि टेक महिंद्रा राकुतेन का प्रमुख सिस्टम इंटीग्रेटर है। टेक महिंद्रा के अध्यक्ष (संचार, नेटवर्क, मीडिया एवं मनोरंजन) मनीष व्यास कहते हैं कि उनकी कंपनी वैश्विक बाजार में 5जी समाधान पेश करने के लिए जियो के साथ भागीदारी को तैयार है क्योंकि चीन को छोड़कर हर जगह के दूरसंचार ऑपरेटर के साथ उसका संपर्क है। एक अग्रणी दूरसंचार ऑपरेटर के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'ये सभी उत्पाद हमारे नेटवर्क पर परीक्षण के लिए मौजूद रहेंगे। दुनिया भर की दूरसंचार कंपनियों के बीच सहमति है कि अगर उत्पाद एवं समाधान भारत जैसे जटिल नेटवर्क वाले देश में काम करते हैं तो वे कहीं भी कारगर होंगे। इसके साथ आईटी सॉफ्टवेयर एवं कीमत प्रतिस्पद्र्धा में अपनी फायदेमंद स्थिति को देखते हुए हमें दूसरों पर बढ़त हासिल है।'
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