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भागवत के बयान के बहाने मुस्लिम समुदाय के मायने

कनिका दत्ता /  July 17, 2021

यह गौर करने लायक है कि 21वीं सदी के तीसरे दशक में एक सशक्त सामाजिक-धार्मिक समूह के मुखिया को देश के प्रमुख अल्पसंख्यक समूह को सुरक्षा एवं समानता के बारे में आश्वस्त करना जरूरी लगा जबकि देश के संविधान में नागरिकों को ये अधिकार पहले से ही मिले हुए हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणियों ने अनजाने में ही तथाकथित सभ्य समाज में एक प्रच्छन्न उग्र-राष्ट्रीयता (नवीनतम प्यू सर्वे देखें) का कहीं ज्यादा खराब मुद्दा उठा दिया जिसमें भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र भी शामिल है।  आज मुस्लिम समुदाय के बीच उत्पीडऩ की तेजी से बढ़ती धारणा पिछले सात वर्षों में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर की गई हत्याओं, गाय को लेकर बढ़ी सतर्कता, अचानक होने वाली गिरफ्तारियों और निशाना बनाकर लागू किए गए कानूनों की शक्ल में सामने आती है। लेकिन सुर्खियां बटोरने वाली ये घटनाएं राजनीतिक हिंदुत्व को बढ़ावा देने से पैदा हुए स्पष्ट खतरों को दर्शाती हैं। इनकी अहमियत इस बात में निहित है कि वे भारत के बहुसंख्यक तबके में व्याप्त अघोषित पूर्वग्रहों को मुखर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं।

इस अंतर्जात धर्मांधता में थोड़ी शारीरिक हिंसा भी निहित होती है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसका असर कम घातक होता है। वर्ष 2006 में संसद में पेश सच्चर समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों से भी यह साफ होता है। हालांकि रिपोर्ट पर पैदा हुए विवाद के बाद उसे सियासी उठापटक में काफी पहले ही भुलाया जा चुका है। सच्चर समिति का यह आकलन था कि मुस्लिम समुदाय शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे तमाम मानकों पर दूसरे सामाजिक-धार्मिक समूहों की तुलना में काफी खराब हालत में है। 

अन्य समुदायों से मुस्लिमों की स्थिति में अंतर सरकारी, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में मौजूद रोजगारों में भी नजर आया था। मुस्लिम समुदाय की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी 23.7 फीसदी है जो अनुसूचित जातियों- जनजातियों (एससी-एसटी) एवं अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) से कम है। यह असंतुलन सरकार के स्तर पर चलाए गए सकारात्मक कार्रवाई कार्यक्रमों का नतीजा हो सकता है। इसके अलावा शहरी इलाकों में मुस्लिम महिलाओं की श्रमशक्ति में कम भागीदारी भी देखने को मिलती है। लेकिन अघोषित भेदभाव सरकारी सेवा के विभिन्न स्तरों पर मुस्लिमों की हिस्सेदारी से भी साफ हो जाता है। मसलन, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में सिर्फ 3 फीसदी, विदेश सेवा में 1.8 फीसदी और पुलिस एवं सुरक्षा बलों में महज 4 फीसदी मुस्लिम हैं। 

सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में तो हालत और भी खराब है जहां पर सकारात्मक कार्रवाई की गुंजाइश सीमित होती है और पूंजी का प्रभावी स्वामित्व बहुसंख्यक समुदाय के पास है। इन नौकरियों में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी सिर्फ 6.5 फीसदी है जबकि एससी-एसटी को 9.5 फीसदी और ओबीसी को 12.8 फीसदी नौकरियां मिली हुई हैं। यहां पर इस तर्क में ज्यादा दम नहीं है कि मुस्लिम तबका दूसरे समूहों से कम पढ़ा-लिखा है क्योंकि उनकी शिक्षा का स्तर एससी-एसटी एवं ओबीसी तबकों के या तो बराबर है या फिर थोड़ा बेहतर ही है। लेकिन सच्चर समिति ने भी कहा था कि कारोबारी प्रतिष्ठान मुस्लिमों को काम पर रखने में हिचकते हैं, लिहाजा मुस्लिम कामगारों का खासा बड़ा हिस्सा स्वरोजगार और अनौपचारिक क्षेत्र में लगा हुआ है।

इन निष्कर्षों को शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम युवाओं के प्रवेश के आंकड़ों के साथ जोड़कर देखें तो चुनिंदा पक्षपात की तस्वीर उभरकर सामने आती है। सच्चर समिति की रिपोर्ट वर्ष 2004-05 के आंकड़ों पर आधारित थी लेकिन यह नहीं माना जा सकता है कि आंकड़ों में कोई बड़ा बदलाव हुआ है। असल में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ प्रवक्ताओं ने टेलीविजन पर होने वाली बहसों में मुस्लिम समुदाय के तुलनात्मक पिछड़ेपन का जिक्र भी किया है। (शायद वे भूल जाते हैं कि भाजपा ने समिति की रिपोर्ट को पहले नकार दिया था।) इसी को आधार बनाते हुए भाजपा की अगुआई वाली सरकार ने मदरसों की शिक्षा को आधुनिक बनाने के लिए फंड आवंटित किए और इसे एक बड़े प्रगतिशील कदम के तौर पर पेश किया। लेकिन इन नेताओं ने अगर सच्चर समिति की रिपोर्ट पढऩे की जहमत उठाई होती तो करदाताओं के पैसे को बचाया जा सकता था। आम धारणा के उलट इन मदरसों में मुस्लिम समुदाय के महज तीन फीसदी बच्चे ही पढऩे जाते हैं। 

सच्चर समिति की रिपोर्ट आने के नौ साल बाद 2015 में भी मुस्लिम समुदाय भारत की अर्थव्यवस्था में हाशिये पर ही पड़ा हुआ था। उस साल ईटी इंटेलिजेंस ग्रुपके एक अध्ययन में पाया गया कि बीएसई-500 कंपनियों के निदेशकों और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर सिर्फ 2.67 फीसदी मुस्लिम ही हैं। हालांकि शीर्ष 100 कंपनियों की सूची बनाने पर यह आंकड़ा थोड़ा सुधरकर 4.6 फीसदी रहा। इन आंकड़ों के बगैर भी भारतीय कॉर्पोरेट जगत में धर्म के अलावा जाति एवं लिंग के मामले में गहराई तक फैले रूढि़वादी स्वभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि अगर भारत सरकार ही भेदभावपूर्ण नियोक्ता है तो फिर निजी क्षेत्र के इससे अलग रुख अपनाने की संभावना कम ही है।  एक बार फिर से मोहन भागवत के बयान पर लौटते हैं जिसके बारे में उनका कहना है कि यह छवि बनाने की कोशिश नहीं है। उनके बयान को दो तरह से पढ़ा जा सकता है। पहला तरीका, जो दिख रहा है उसे मान लेना। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के भय के उस चक्र में नहीं फंसना चाहिए कि भारत में इस्लाम को कोई खतरा है। इसके अलावा उन्होंने मुस्लिमों को देश का समान नागरिक बताते हुए कहा था कि उन पर हिंसा नहीं होनी चाहिए। दूसरा तरीका बयान में छिपा वह गहरा संदेश है कि अब मुस्लिमों को उनकी स्थिति बता दी गई है तो अगर वे भारत के बहुसंख्यकवाद के रास्ते पर चलने की संकल्पना स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है। मुस्लिम समुदाय ने इस बयान पर सतर्क आशावादिता से लेकर सिरे से नकारने की जो प्रतिक्रिया दी है वह खुद ही बहुत कुछ बयां कर देता है। 

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