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भारत में क्रिप्टोकरेंसी का भविष्य जानने के लिए करें इंतजार

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  July 14, 2021

सन 1992 के क्रिकेट विश्व कप के एक मैच में गाबा के मैदान पर जब दक्षिण अफ्रीकी क्षेत्ररक्षक जॉन्टी रोड्स ने पाकिस्तान के इंजमाम उल हक को पैविलियन की राह दिखाई तो सबकुछ इतना पलक झपकते हुआ कि आंखों देखा हाल सुनाने वाले भी चकित रह गए। क्रिप्टोकरेंसी को लेकर भारतीय केंद्रीय बैंक की प्रतिक्रिया भी काफी हद तक वैसी ही है। इसके तेज उभार को देखते हुए रिजर्व बैंक चकित है: यह मुद्रा है? भुगतान व्यवस्था है? या संपत्ति है? ब्लॉकचेन डेटा प्लेटफॉर्म चेनालिसिस के मुताबिक देश में गत एक वर्ष में क्रिप्टो निवेश 200 गुना बढ़कर 20 करोड़ डॉलर से 40 अरब डॉलर पहुंच गया है। देश में 1.5 करोड़ से ज्यादा क्रिप्टोकरेंसी कारोबारी हैं, यह तादाद अमेरिका की दो तिहाई और ब्रिटेन से छह गुना अधिक है।

आरबीआई ने 31 मई को कहा कि अप्रैल 2018 के उसके जिस परिपत्र ने बैंकों को आभासी मुद्रा और किसी भी तरह के बिटकॉइन में कारोबार से प्रतिबंधित किया था अब वह वैध नहीं है और किसी बैंक को इसका सहारा लेकर क्रिप्टो को नकारना नहीं चाहिए। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस परिपत्र को निरस्त किया था इसलिए निवेशक भी खुश थे।

परंतु यह खुशी क्षणिक थी क्योंकि केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा कि बैंकों को ऐसे मामलों में उचित सतर्कता बरतते हुए ग्राहक को जानें (केवाईसी), मुद्रा विरोधी, आतंकवादियों को वित्तीय सहायता रोकने और धनशोधन रोकने संबंधी कानून तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों का भी ध्यान रखना चाहिए। ऐसे में बैंकों के लिए क्रिप्टोकरेंसी कारोबार लगभग असंभव हो गया।

आरबीआई ने अप्रैल 2018 समेत तीन विज्ञप्तियां जारी करके विनियमित संस्थानों और जनता को क्रिप्टोकरेंसी के जोखिम से अवगत कराया। ऐसे में कई बड़े सरकारी और निजी बैंकों ने इनसे दूरी बना ली। आरबीआई क्रिप्टोकरेंसी के खिलाफ क्यों है? दरअसल वह न तो जिंस है और न ही मुद्रा, न ही भुगतान व्यवस्था का अंग। बिटकॉइन, इथीरियम, लाइटकॉइन, कार्डानो, पोल्काडॉट, स्टेलर आदि को वर्गीकृत करना मुश्किल है।

नियामक इसे मुद्रा नहीं मानता क्योंकि इसे किसी केंद्रीय बैंक ने जारी नहीं किया और इसे कोई संप्रभु समर्थन हासिल नहीं है। इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव है, भंडारण मूल्य कमजोर है और यह व्यापक रूप से स्वीकार्य नहीं है। यह क्रेडिट-डेबिट कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग की तरह भुगतान प्रणाली का अंग भी नहीं है।

लेनदेन गुमनाम होने के कारण वे सार्वजनिक निगरानी के दायरे में नहीं होते। इसका केवाईसी मानकों पर गहरा असर होता है और धनशोधन तथा आतंकियों की मदद का जोखिम भी पैदा हो जाता है। गुमनामी की प्रकृति, पूंजी नियंत्रण व्यवस्था के अनुरूप नहीं है क्योंकि लेनदेन की पड़ताल संभव नहीं। अगस्त 1993 से ही देश में चालू खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता है लेकिन पूंजी खाते की परिवर्तनीयता अभी प्रक्रियाधीन है। यह परिवर्तनीयता हमें यह आजादी देती है कि रुपये को किसी भी अंतरराष्ट्रीय रूप से स्वीकार्य मुद्रा में बदलें। यह हर जगह निवेश का अबाध लेनदेन सुनिश्चित करती है।

आरबीआई के अनुसार क्रिप्टोकरेंसी को परिसंपत्ति नहीं माना जा सकता क्योंकि वहां भविष्य में नकदी प्रवाह की व्यवस्था नहीं, उसका मूल्य अटकलों के कारण चढ़ता गिरता है। उपभोक्ताओं को भी कोई संरक्षण नहीं है। एक बार पासवर्ड गलत हाथ में पडऩे पर कुछ भी हो सकता है। इनमें ऊर्जा खपत बहुत अधिक होती है।

फरवरी में राज्य सभा में एक प्रश्न के उत्तर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था, 'आर्थिक मामलों के सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय अंतर मंत्रालयीन समिति का गठन किया गया ताकि वह आभासी मुद्राओं का अध्ययन करके रिपोर्ट दे। समिति ने कहा कि सरकार द्वारा प्रचलित आभासी मुद्रा के अलावा ऐसी तमाम मुद्राओं पर भारत में रोक लगाई जाए।' आरबीआई के अलावा पूंजी बाजार नियामक और बीमा नियामक के अधिकारी भी समिति में थे। समिति के मन में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर कई संशय थे कि यह वित्तीय क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है। हालांकि वह ऐसी मुद्रा के पीछे की तकनीक यानी ब्लॉकचेन के खिलाफ नहीं थी।

ब्लॉकचेन प्रणाली में सूचना बहुत सुरक्षित रहती है। समिति भूमि रिकॉर्ड रखने जैसे उद्देश्यों के लिए ब्लॉकचेन तकनीक की क्षमताओं का लाभ उठाने के पक्ष में है। समिति ने केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा की अनुशंसा की है। यह डिजिटल मुद्रा आरबीआई द्वारा जारी वॉलेट या इलेक्ट्रॉनिक बटुआ होगा। फेडरल रिजर्व, बैंक ऑफ इंगलैंड और यहां तक कि यूरोपीय केंद्रीय बैंक सभी बहुत धीमी गति से इस दिशा में (केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा) बढ़ रहे हैं जबकि चीन पहले ही डिजिटल युआन को प्रायोगिक तौर पर जारी कर चुका है।

आरबीआई के गहन पूर्वग्रह के बाद भी भारतीयों का क्रिप्टोकरेंसी में निवेश बढ़ा है, हालांकि हम अन्य देशों से पीछे हैं। चेनालिसिस के मुताबिक हम बिटकॉइन के मामले में 2020 में 25 देशों में से 18वें स्थान पर रहे। अमेरिका 4.1 अरब डॉलर के साथ शीर्ष पर है, जबकि चीन 1.1 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है। जापान 90 करोड़ डॉलर के साथ तीसरे, ब्रिटेन 80 करोड़ डॉलर के साथ चौथे और रूस 60 करोड़ डॉलर के साथ पांचवें स्थान पर है। ब्लूमबर्ग ने हाल में क्रिप्टो में 10 लाख डॉलर निवेश करने वाले एक बैंकर के हवाले से कहा कि फिलहाल आय कर के कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं और उसे डर है कि अगर उसका नाम बड़े क्रिप्टो निवेशक के रूप में आया तो अतीत से प्रभावी कर लग सकता है। अगर कोई प्रतिबंध लगता है तो वह अपना कारोबार सिंगापुर के बैंक खाते में स्थानांतरित कर लेगा।

संसद के बजट सत्र में क्रिप्टोकरेंसी और आधिकारिक डिजिटल करेंसी नियमन विधेयक 2021 पेश होना था लेकिन सरकार अभी भी चर्चा ही कर रही है। अनुमान है कि सरकार सभी क्रिप्टोकरेंसी पर रोक लगाकर अपनी डिजिटल मुद्रा लाएगी। परंतु क्या सरकार क्रिप्टो पर प्रतिबंध लगाएगी? यह जानने के लिए हमें प्रतीक्षा करनी होगी।

Keyword: क्रिप्टोकरेंसी, रिजर्व बैंक, मुद्रा, ब्लॉकचेन, परिपत्र, आभासी मुद्रा, बिटकॉइन,
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