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अपने आधुनिकीकरण का खुद वित्त पोषण करे सेना

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  07 11, 2021

गत वर्ष चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जवानों द्वारा पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का उल्लंघन करने के बाद भारतीय सेना चीन और पाकिस्तान के साथ दो मोर्चों पर संकट की बुरी स्थिति में आ गई। रणनीतिक अदूरदर्शिता के चलते जम्मू कश्मीर को हिस्सों में बांटने को लेकर चीन की प्रतिक्रिया को कम करके आंका गया। गृहमंत्री अमित शाह द्वारा विवादित अक्साई चिन को दोबारा हासिल करने संबंधी बयान ने चीन को और भड़काया। अच्छी बात है कि फरवरी से भारत-पाकिस्तान की नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम लागू है और पीएलए भी लद्दाख में अपने लक्ष्य हासिल करने के बाद खामोश है। अब हमारे रक्षा योजनाकारों को सैन्य आधुनिकीकरण की आवश्यकता नए सिरे से महसूस हो रही है।

लेकिन पूंजीगत खरीद के लिए धन की कमी है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने जो आठ बजट पेश किए हैं उनमें एक खास रुझान नजर आता है: हर वर्ष सेना आगामी वर्ष की पूंजीगत व्यय की जरूरत का आकलन करती है और अपनी अपनी जरूरत रक्षा मंत्रालय के समक्ष पेश करती है। मंत्रालय इसे वित्त मंत्रालय के पास भेजता है जो बिना वजह बताए इसमें कटौती करके कम पूंजीगत बजट आवंटित कर देता है।

सरकारें जब विवाद की स्थिति हल करें तब वे रक्षा व्यय कम कर सकती हैं और अपनी बचत को राजनीतिक रूप से लाभप्रद क्षेत्र मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य और मतदाताओं की सब्सिडी पर खर्च कर सकती हैं। लेकिन भारत ने संकटकाल में  भी ऐसा करने का प्रयास किया है। चीन-भारत-भूटान सीमा पर डोकलाम में भारतीय और चीनी सेना के बीच गंभीर झड़प के कुछ महीने बाद 2018-19 का बजट तैयार करते वक्त सेना ने 157,963 करोड़ रुपये की पूंजीगत जरूरत का अनुमान पेश किया। वित्त मंत्रालय ने इसमें 47 फीसदी (74,529 करोड़ रुपये) की कटौती करके 83,434 करोड़ रुपये आवंटित किए। वर्तमान रक्षा बजट जिसे सरकार ने उस समय पेश किया था जब भारतीय सैनिक लद्दाख में पीएलए के साथ आमने-सामने थे, उसमें भी वित्त मंत्रालय ने 38 फीसदी यानी (199,553 करोड़ रुपये) की कटौती करके केवल 123,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया।

सन 1991-92 से ऐसा ही हो रहा है। एक के बाद एक हर दल की सरकारें यही मानकर चलीं कि युद्ध की आशंका नहीं है इसलिए आधुनिकीकरण किए बिना काम चल जाएगा। 1999 के करगिल युद्ध और 2017 के डोकलाम जैसे सीमा विवादों और लद्दाख में मौजूदा अतिक्रमण इतने गंभीर नहीं कि आधुनिकीकरण को अनिवार्य किया जाए। यदि हालात बिगड़े मसलन जैसे करगिल में हम बोफोर्स तोपों के लिए 155 एमएम गोलों की कमी हो गई थी, तो उस स्थिति में हम बचने के लिए इजरायल जैसे देशों पर निर्भर हैं। इस बीच राजनीतिक और वोट संबंधी गणित सैन्य आधुनिकीकरण के बजाय गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति पर हजारों करोड़ रुपये के खर्च और नई दिल्ली में सेंट्रल विस्टा को नए सिरे से विकसित करने पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का समर्थन करता है।

सैन्य पूंजीगत व्यय बढ़ाने के लिए बहुत ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं है। वेतन, पेंशन और सैन्य बलों के परिचालन व्यय का ध्यान रखने के बाद ही पूंजीगत बजट आवंटित होता है। ऐसे में रक्षा बजट में कोई भी इजाफा पूंजीगत बजट में इजाफा होगा। यदि चालू वर्ष का 478,196 करोड़ रुपये के रक्षा बजट में 10 फीसदी यानी 47,000 करोड़ रुपये का इजाफा करना हो तो पूंजीगत मद में 37,711 करोड़ रुपये का इजाफा होगा। यानी आधुनिकीकरण बजट एक तिहाई बढ़ेगा।

पूंजीगत आवंटन में यह इजाफा इसलिए अहम है क्योंकि पूंजीगत खरीद के मामलों में कीमत का 10 से 15 फीसदी अग्रिम चुकाना होता है जबकि शेष राशि पांच से सात साल में चुकाना होता है। यदि इस वर्ष होने वाला 47,000 करोड़ का काल्पनिक इजाफा आने वाले वर्षों में जारी रहे तो सेना इस वर्ष 47,000 करोड़ के अग्रिम भुगतान के साथ 470,000 करोड़ रुपये के उपकरणों के सौदे कर सकती है। विदेशी मुद्रा में 63 अरब डॉलर की राशि से सेना, नौसेना और वायुसेना लड़ाकू विमान, तोप और पनडुब्बी जैसे जरूरी उपकरण खरीद सकती हैं।

सवाल यह है कि 47,000 करोड़ रुपये वार्षिक की यह राशि कहां से आएगी? या तो कुछ सैन्य संसाधनों मसलन कारखानों और भूमि को बेचा जाए और सैन्य आधुनिकीकरण उपकर लगाया जाए। मसलन वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के सभी स्लैब में एक फीसदी सैन्य आधुनिकीकरण उपकर लगाया जा सकता है। मान लें कि जीएसटी संग्रह सुधरकर 120,000 करोड़ रुपये प्रति माह पहुंचेगा तो एक फीसदी के हिसाब से सालाना 14,400 करोड़ रुपये जुटेंगे। इसके अलावा 0.01 प्रतिशत प्रतिभूति लेनदेन कर से सालाना 13,000 करोड़ रुपये आते हैं। यदि इसे दोगुना कर दिया जाए तो रक्षा आधुनिकीकरण के लिए 13,000 करोड़ रुपये और मिल सकते हैं। आय कर में शिक्षा पर तीन फीसदी और स्वास्थ्य पर एक फीसदी उपकर है जो सालाना 7,500 करोड़ रुपये होता है। शिक्षा उपकर का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाता। यदि इसमें एक फीसदी कमी कर दो फीसदी उपकर सैन्य आधुनिकीकरण के लिए कर दिया जाए तो 15,000 करोड़ रुपये जुटाए जा सकते हैं। यदि कर बढ़ाना स्वीकार्य नहीं तो रक्षा क्षेत्र की 17 लाख एकड़ जमीन की बिक्री की जा सकती है।

रक्षा मंत्रालय के पास 41 शस्त्र कारखानों के विनिेवश का विकल्प भी है। ये कारखाने सालाना 12,000 करोड़ रुपये के हथियार और उपकरण बनाती हैं। इनकी खराब गुणवत्ता और उत्पादकता को देखते हुए मंत्री समूह पहले ही इनके निगमीकरण का विचार कर रहा है। परंतु केवल ऐसा करने से बदलाव नहीं आएगा। इसकी जगह निजीकरण की जरूरत है। ब्रिटेन में चयनित निजीकरण के माध्यम से मरणासन्न सरकारी रक्षा क्षेत्र को बेहतरीन निजी उपक्रमों में बदल दिया गया। उसने अपना अनुभव और विशेषज्ञता भारत से साझा करने की बात कही है। पूंजी और उत्पादकता बढ़ाने के लिए इस पर विचार होना चाहिए।

Keyword: सीमा विवाद, सैन्य बल, नौसेना, वायुसेना लड़ाकू विमान, तोप, पनडुब्बी,
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