बिजनेस स्टैंडर्ड - एनपीए से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, August 01, 2021 06:59 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

एनपीए से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं

अजय शाह /  07 09, 2021

देश में फंसे हुए कर्ज (एनपीए) को लेकर भय का माहौल है। कर्जदाताओं को हुए नुकसान को लेकर भी ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। कारोबारी विफलता और ऋण में नुकसान, कर्ज देने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। यदि हम हर प्रकार के एनपीए से दूर भागेंगे या देनदारी में चूक को गलत नजर से देखेंगे तो आर्थिक वृद्धि प्रभावित होगी। लोकरुचि की खबरों पर ध्यान देने और गलत साबित होने वाले लेनदेन पर नजर गड़ाने से बड़े पैमाने पर सफल होने वाली कर्ज देने की प्रक्रिया की अनदेखी होती है। हमें एनपीए को लेकर थोड़ा सहज होने की आवश्यकता है। इसके बजाय हमें भारतीय ऋण बाजार से जुड़ी तीन अन्य खामियों को लेकर चिंतित होना चाहिए: पहला बैंकिंग नियमन, दूसरा सक्षम बॉन्ड बाजार की अनुपस्थिति और तीसरा ऋणशोधन सुधार।

क्या आप चाहते हैं कि आप ऋण दें तो उसके चुकाने की संभावना शून्य हो? ऐसा हो सकता है: आपको अमेरिका या जर्मनी के 90 दिन के सरकारी बॉन्ड खरीदने होंगे जिनकी रेटिंग एएए हो। इनका प्रतिफल तकरीबन शून्य फीसदी होता है। यदि आप भारत का सरकारी बॉन्ड खरीदते हैं तो आप कुछ जोखिम सहने की क्षमता दिखाते हैं। इसे मूडीज द्वारा बीएए 3 रेटिंग दी गई है। परंतु तब आपको लगता है कि उच्च ब्याज दर के कारण उच्च जोखिम उठाया जा सकता है।

अधिकांश कर्ज पर वापस नहीं होने का खतरा मंडराता रहता है। इसे समाप्त करने का एकमात्र तरीका यही है कि जर्मन या अमेरिकी सरकारों को उधारी दी जाए। अहम प्रश्न यह है कि पोर्टफोलियो के एक हिस्से में नुकसान होने के बाद क्या प्रतिफल की समग्र दर उचित रहेगी? उदाहरण के लिए मान लेते हैं एनपीए 10 प्रतिशत है और इनमें 50 प्रतिशत नुकसान है। शेष 90 प्रतिशत पर 20 प्रतिशत की दर से प्रतिफल मिलता है। कुल पोर्टफोलियो प्रतिफल13 फीसदी निकलता है। इस मामले में 10 फीसदी एनपीए उचित प्रतीत होता है। ऐसे में अलहदा मामले में 10 फीसदी एनपीए को बुरा करार देना उचित नहीं।

यदि नीति निर्माता या बोर्ड सदस्य अत्यंत कम एनपीए दर की मांग करते हैं तो इसका असर तार्किक वित्तीय नीतियों और ऋण तक पहुंच पर भी पड़ता है। यह वैसा ही है जैसे जीवन बीमा बेचा जाए और उपभोक्ता से मांग की जाए कि वह मरे नहीं।

कारोबारी विफलता जीवन का अंग है इसलिए ऋण अदायगी में चूक तो हमेशा होगी। फिलहाल वित्तीय नियामक और एजेंसियां भविष्य के चूक से बचाव में लगी हैं और अतीत में चूक करने वालों के पीछे हैं। कारोबारी जगत के लोग एनपीए के डर से ऋण से हाथ खींच रहे हैं। वे ज्यादा मात्रा में इक्विटी पूंजी का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसलिए निवेश कम कर रहे हैं। यह सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि को प्रभावित कर रहा है।

महामारी के दौर में जीवन बीमा कंपनियों के समक्ष मौत के मामलों में इजाफा हुआ। इसी प्रकार वृद्धि कमजोर पडऩे पर कारोबारी विफलताएं बढ़ती हैं। बीते दशक में जब भारत की वृद्धि दर में कमी आई तो ऋण अदायगी में चूक के मामले बढ़े। बाजार अर्थव्यवस्था में यह सामान्य बात है।

आधुनिक मीडिया लोक रुचि की खबरों पर अधिक ध्यान देता है। विमान दुर्घटना की खबर को अत्यधिक तवज्जो मिलती है जबकि हजारों उड़ानें बिना किसी के ध्यान दिए अपना काम करती हैं। इसी तरह हर समय बड़ी तादाद में ऋण का लेनदेन सफलतापूर्वक चलता रहता है। जैसा कि वित्तीय अर्थशास्त्री हर्षवर्धन ने हाल ही में कहा भी कि करीब 12 लाख करोड़ रुपये का नया ऋण हर वर्ष दिया जा रहा है। परंतु आधुनिक मीडिया का ध्यान केवल भारी भरकम चूक पर रहता है जो एनपीए को लेकर भय बढ़ाते हैं। 1,000 करोड़ रुपये तक के छोटे चूक को वह चर्चा नहीं मिलती जो किसी रंगीन व्यक्तित्व के मालिक द्वारा इतनी ही राशि के चूक पर मिल जाती है। अमीरों को निशाना बनाना इन दिनों चलन हो गया है। कहने का अर्थ यह नहीं है कि देश के ऋण बाजार में सब ठीक है। बैंकिंग नियमन, बॉन्ड बाजार और ऋणशोधन प्रक्रिया की दिक्कतों को दूर करना जरूरी है।

बैंकिंग नियमन की बात करें तो ऋण देने वाले बैंकों को डिफॉल्ट का सामना करना पड़ा है और वे दिवालिया भी हुए हैं। लेकिन इसे लेकर एनपीए की आशंका नहीं बढऩी चाहिए। बल्कि बैंकिंग नियमन में सुधार करके समस्या हल की जा सकती है।

बैंकिंग नियमन का काम है बाजार आधारित अंकेक्षण को कर्जदाताओं पर डालना। अतीत में ऐसा नहीं किया गया। बैंकों ने व्यवस्थित तरीके से अपने पोर्टफोलियो का अधिमूल्यन किया और नियामकों ने इसका समर्थन किया। नियामकों को बैंकों पर दबाव बनाना चाहिए कि वे कर्ज के बाजार मूल्य का आकलन करके हर तिमाही अपने पोर्टफोलियो की जानकारी दें। नियामकों को भी चाहिए कि वे बैंकों के मूल्यांकन दावों को हर वर्ष परखें।

दूसरी समस्या बॉन्ड बाजार है। बैंकों के पास अल्पावधि के जमा होते हैं और वे ढांचागत रूप से दीर्घकालिक ऋण देने की स्थिति में नहीं रहते। देश की अधिकांश बुनियादी ढांचा परियोजनाएं उच्च जोखिम वाली हैं। लंबी अवधि के कारोबारी ऋण की राह बॉन्ड बाजार में निहित है। वित्तीय नियमन में ढांचागत नाकामियां हैं जिनके चलते बॉन्ड बाजार में उभार नहीं आ पा रहा है। दीर्घावधि के बुनियादी और कॉर्पोरेट ऋण के कारण देश में एनपीए का डर नहीं बढऩा चाहिए। इसके लिए बॉन्ड बाजार सुधार की जरूरत है। 2015 के वित्त विधेयक में इसकी शुरुआत की गई थी लेकिन फिर इसे स्थगित कर दिया गया।

तीसरी समस्या ऋणशोधन संहिता की है। इससे तात्पर्य चूक होने पर कर्जदाताओं को होने वाले नुकसान को कम करने से है। किसी कंपनी के चूक करने पर ऋणशोधन प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करनी चाहिए, उसका नियंत्रण कर्जदाताओं की समिति के हाथ में जाना चाहिए और ऐसा सौदा होना चाहिए ताकि कर्जदाताओं का मूल्यवर्धन हो। इसके हिस्से के रूप में ऋणशोधन संहिता में प्रवर्तकों की चोरी का पता लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि उन्हें दंडित किया जा सके।

नियामकों और एजेंसियों को चाहिए कर्जदाताओं में कम से कम भय पैदा करें ताकि वे संकट काल में सक्रियता से ऋण पुनर्गठन कर सकें। पुनर्गठन में होने वाला मामूली नुकसान हर स्थिति में दिवालिया होने पर होने वाले भारी भरकम नुकसान से बेहतर होगा।

देश में ऋणशोधन सुधार 2016 से चल रहे हैं लेकिन यहां जिस विषय पर बात हो रही है वह नियामकों, अदालतों, विभागों और एजेंसियों के माध्यम से प्रवर्तित नहीं हो सका है। इस प्रक्रिया की समस्याओं के कारण एनपीए की आशंका नहीं बढऩी चाहिए। बल्कि उन्हें वह ऊर्जा मिलनी चाहिए कि वे नए जोश और बौद्धिक क्षमता के साथ ऋणशोधन सुधार में लौटें।
(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं)

Keyword: एनपीए, ऋण पुनर्गठन, फंसे कर्ज, बैंकिंग नियमन, बॉन्ड बाजार,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सरकार का खर्च घटने से जीडीपी पर पड़ेगा असर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.