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तेलंगाना में एक नई पार्टी का कैसा होगा सियासी भविष्य?

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 09, 2021

आठ जुलाई को अविभाजित आंध्र प्रदेश के करिश्माई मुख्यमंत्री स्वर्गीय वाई एस राजशेखर रेड्डी की वर्षगांठ के अवसर पर उनकी बेटी शर्मिला ने एक नई पार्टी की शुरुआत की- वाईएसआर तेलंगाना पार्टी (वाईएसआरटीपी)। उनके भाई जगनमोहन रेड्डी जो पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, वह इस अवसर पर उपस्थित नहीं थे। इससे यही संकेत निकला कि वह अपनी बहिन के इस कदम के साथ नहीं हैं। उनकी मां जरूर शर्मिला के साथ नजर आईं। अपने साक्षात्कारों में शर्मिला ने यह स्पष्ट किया है कि फिलहाल उनका राजनीतिक कामकाज तेलंगाना तक सीमित रहेगा। दूसरे शब्दों में वह अपने भाई के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा नहीं करेंगी।

प्रश्न यह है कि क्या तेलंगाना में एक और राजनीतिक दल की गुंजाइश है?

शर्मिला के पास ज्यादा वक्त नहीं है। तेलंगाना की 119 सीट वाली विधानसभा के चुनाव 2023 में होने हैं। के चंद्रशेखर राव (केसीआर) के नेतृत्व वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने 2018 के चुनाव में 88 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई। उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को पराजित किया। भाजपा को एक सीट पर जीत मिली और उसे सात फीसदी वोट मिले। परंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी चार सीट जीतने में कामयाब रही। पार्टी निजामाबाद सीट भी जीतने में कामयाब रही जहां केसीआर की बेटी के कविता को पराजय का सामना करना पड़ा। पार्टी ने नवंबर 2020 में दुब्बाका उपचुनाव में भी जीत हासिल की जिससे तेलंगाना में अहम शक्ति बनने की उसकी महत्त्वाकांक्षाओं को हवा मिली। एक महीने बाद ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (जीएचएमसी) के चुनाव में भी यह बात रेखांकित हुई जब केंद्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नगर निकाय के चुनावों में प्रचार किया और पार्टी का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा रहा।

इस पूरी प्रक्रिया में वास्तविक नुकसान कांग्रेस को हुआ। सन 2018 से अब तक उसके 19 में से 12 विधायक टीआरएस में शामिल हो चुके हैं। यदि शर्मिला की पार्टी अपनी पकड़ बनाती है तो तेलंगाना में कांग्रेस का अंत हो जाएगा। यह केसीआर और भाजपा दोनों के लिए अच्छा होगा। ऐसे में हैदराबाद में चर्चा है कि इस नई पार्टी के गठन को दोनों या किसी एक दल का समर्थन हासिल है।

शर्मिला कांग्रेस द्वारा छोड़ी गई बुनियाद पर पार्टी की जड़ें मजबूत करना चाहती हैं। तेलंगाना के ताकतवर रेड्डी समुदाय ने वाईएसआर का बिना शर्त समर्थन किया था, खासकर उनकी इस घोषणा का कि वह राज्य का बंटवारा नहीं होने देंगे। लेकिन बाद में जब राज्य का बंटवारा हो गया तो समर्थकों में से कई भाजपा के पाले में चले गए। खासतौर पर महबूबनगर जिले के जी कृष्ण रेड्डी जो गृह राज्य मंत्री थे और अब जिन्हें केंद्रीय मंत्री का दर्जा दिया गया है, वह भी तेलंगाना में जातीय नेतृत्व के आकांक्षी हैं। हालांकि उनकी पकड़ हैदराबाद के कुछ हिस्सों तक सीमित है।

अपनी पार्टी को प्रदेश में प्रासंगिक बनाने के लिए शर्मिला को कड़ी मेहनत करनी होगी। खासकर एक ऐसे राज्य में जहां विभाजन के लिए मरने वालों को शहीद माना जाता है, वहां उन्हें अपने पिता के विभाजन विरोधी रुख को उचित ठहराना होगा। यह बहुत पेचीदा मामला है।

शर्मिला ने कभी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन सन 2013 में जब उनके भाई भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में थे तब उन्होंने पदयात्राएं आयोजित करके अपने भाई के पक्ष में प्रचार अभियान चलाया था। अब तक उनकी भूमिका परदे के पीछे से संगठन संभालने की रही है। शायद वह इससे ऊब गई हैं। उनके भाई की अपनी अलग योजनाएं हैं। उन्हें राज्य में भाजपा और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) दोनों से निपटना है। वह इस बात से अवगत हैं कि उन्हें विस्तार के पहले मजबूती हासिल करनी है। वह और केसीआर मित्र हैं। पड़ोसी राज्य के साथ अच्छे रिश्तों केचलते जगन इसमें कोई उथलपुथल नहीं चाहते। यही कारण है कि वह अपनी बहिन की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से दूरी बनाए हुए हैं।

इसके विपरीत शर्मिला ने केसीआर को निशाने पर ले रखा है। वह केसीआर के सबसे मजबूत पक्ष यानी लोक कल्याण की आलोचना कर रही हैं। उन्होंने सरकार पर भ्रष्टाचार का इल्जाम भी लगाया है। पार्टी की शुरुआत के बाद पहले संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि केसीआर और उनका परिवार सत्ता में रहते हुए तेलंगाना को लूटने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने बेरोजगारी का मुद्दा भी उठाया। शर्मिला एक धार्मिक ईसाई परिवार से आती हैं। उनके पति अनिल, ईसाई मत के प्रचारक हैं। बहरहाल तेलंगाना का छोटा सा ईसाई समुदाय उन्हें जानता है और उनके परिवार की इज्जत करता है।

दो में से एक ही चीज होगी। उनकी पार्टी बिना किसी का कोई नुकसान किए डूब जाएगी। परंतु अगर वह कड़ी मेहनत करती हैं और अपने पत्ते सही ढंग से खेलती हैं तो वह आगामी विधानसभा चुनाव में काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं और ऐसे में सभी दलों को उनसे संपर्क करना पड़ सकता है। फिलहाल तो वह ऐसी ही भूमिका की तलाश में होंगी।

समय उनके साथ है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों की राजनीति में एक नई और युवा दूसरी पीढ़ी का उदय हो रहा है जो नेतृत्व पर अपना दावा कर रही है। शर्मिला ऐसे ही नेताओं में से एक हैं। यदि वह नाकाम होती हैं तो इसकी वजह मेहनत की कमी नहीं होगी।

Keyword: तेलंगाना, नई पार्टी, सियासी भविष्य, वाईएसआरटीपी, टीआरएस,
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