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कमजोर धारणा से बहाली की उम्मीद पर मंडरा रहा खतरा

श्रम-रोजगार
महेश व्यास /  07 08, 2021

कोविड-19 की दूसरी लहर से आक्रांत दो महीनों के बाद जून 2021 में भारत की अर्थव्यवस्था ने अच्छी प्रगति दर्ज की है। मई 2021 की तुलना में बेरोजगारी दर गिरी जबकि रोजगार दर बढ़ी है। पिछले महीने कोविड-19 संक्रमण एवं मौतों की संख्या में बड़ी गिरावट आई, करीब 60 लाख वेतनभोगी नौकरियां वापस आ गईं, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने फिर से भारतीय इक्विटी बाजारों में 1.5 अरब डॉलर का निवेश किया और शेयर बाजारों का नए रिकॉर्ड बनाने का सिलसिला जारी रहा। कर संग्रह में सुधार आया और वित्त मंत्री ने दूसरी लहर के दुष्परिणामों से निपटने के लिए कुछ उपायों की घोषणा की। लेकिन भारत का उपभोक्ता अब भी इन सबसे अछूता नजर आ रहा है।

जून में उपभोक्ता धारणा सूचकांक 1.5 फीसदी गिर गया जो मई में यह 10.8 फीसदी और अप्रैल में 3.8 फीसदी पहले ही गिर चुका था। कोविड की दूसरी लहर ने परिवारों की सोच पर बहुत गहरा असर डाला है। कुल मिलाकर मार्च से लेकर जून के दौरान उपभोक्ता धारणा सूचकांक में 15.4 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है। रोजगार परिदृश्य में सुधार या उससे जुड़ी खबरें भी जून में भारतीय परिवारों की नकारात्मक मनोदशा बदल पाने में नाकाम रहीं।

जून में पैदा हुए 78 लाख रोजगारों में से करीब 75 लाख शहरी क्षेत्रों में थे लेकिन उपभोक्ता धारणा वहीं पर ज्यादा गिरी है। शहरी भारत में उपभोक्ता धारणा सूचकांक 4.3 फीसदी गिरा, वहीं ग्रामीण भारत में इसने 0.4 फीसदी की हल्की बढ़त दर्ज की। शायद शहरी इलाकों में मिली नौकरियों की गुणवत्ता पहले से कमतर थी। या फिर उपभोक्ता की खराब हो चुकी धारणा सुधारने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है।

वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों का सूचकांक शहरी भारत में 8.8 फीसदी गिरा। दरअसल उपभोक्ता धारणा सूचकांक में आई गिरावट के लिए शहरी भारत ही सबसे अधिक जिम्मेदार था। वर्तमान आर्थिक हालात का सूचकांक परिवारों से पूछे गए दो सवालों के जवाबों पर आधारित है। पहला, एक साल पहले की तुलना में आपके परिवार की आमदनी कैसी है? दूसरा, एक साल पहले की तुलना में टिकाऊ उपभोक्ता सामान खरीदने के लिहाज से यह वक्त कैसा है? इन दोनों ही बिंदुओं पर शहरी परिवारों की राय जून 2021 में गिरावट पर रही।

एक साल पहले अपनी आमदनी को मौजूदा समय से ज्यादा बताने वाले शहरी परिवारों का अनुपात मई के 4.9 फीसदी से घटकर जून में 4 फीसदी रह गया। वहीं साल भर पहले की तुलना में आमदनी कम होने का दावा करने वाले परिवारों का अनुपात 51.4 फीसदी से बढ़कर 52.3 फीसदी हो गया। इसी तरह टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद के लिए मौजूदा समय को बेहतर बताने वाले शहरी परिवारों का अनुपात भी घटकर 2.4 फीसदी रह गया जो मई में 3.9 फीसदी था। मौजूदा समय को टिकाऊ उत्पादों की खरीद के लिए खराब मानने वाले परिवारों का अनुपात 55 फीसदी से बढ़कर जून में 61.2 फीसदी हो गया।

दूसरी तरफ ग्रामीण परिवारों ने आय के मामले में हालात सुधरने की बात कही। इसके बावजूद वे टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद को लेकर नकारात्मक हैं। आमदनी में सुधार की बात करने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात मई के 3 फीसदी से सुधरकर जून में 4.1 फीसदी हो गया और आय कम होने की बात करने वाले परिवार 53.5 फीसदी से घटकर 50 फीसदी हो गए। हालांकि आय के मोर्चे पर यह हल्का सुधार भी टिकाऊ उत्पादों की खरीद के लिए ग्रामीण परिवारों को प्रोत्साहित कर पाने में नाकाम दिखा। टिकाऊ उत्पादों की खरीद के लिए बेहतर समय मानने वाले ग्रामीण परिवार 2.6 फीसदी से घटकर 2.5 फीसदी हो गए। खरीदारी के लिए मौजूदा वक्त को खराब मानने वाले परिवार 54.5 फीसदी से बढ़कर जून में 61 फीसदी हो गए।

शहरी भारत में अधिकांश प्रमुख आय समूहों ने आमदनी में कमी आने की बात कही। अपेक्षाकृत संपन्न परिवारों में यह गिरावट कहीं ज्यादा रही है। जून 2021 में 10 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले सिर्फ 7.2 फीसदी शहरी परिवारों ने ही आमदनी में बढ़ोतरी का दावा किया। अप्रैल एवं मई के महीनों में यह अनुपात 17.1 फीसदी था। वहीं 5 लाख से 10 लाख रुपया सालाना कमाने वाले शहरी परिवारों में से सिर्फ 9 फीसदी ने आय बढऩे की बात कही जबकि मई में यह अनुपात 12.6 फीसदी था। वहीं निम्न आय वाले परिवारों में यह गिरावट कम रही लेकिन आय में वृद्धि का दावा करने वाले परिवारों का अनुपात बहुत कम रहा।

पारिवारिक आय के संदर्भ में धारणा खराब होने का गहरा असर संभवत: टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों की खरीद की मंशा पर भी पड़ा। शहरी भारत में पारिवारिक आय के हरेक प्रमुख समूह में टिकाऊ उत्पादों की खरीद की चाहत मई की तुलना में जून में कम रही।  

वर्ष 2020-21 में निचले स्तर पर रही भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार इस पर निर्भर करता है कि आम परिवार अपनी खुशहाली को लेकर कितना आश्वस्त है और उसमें गैर-जरूरी चीजों पर खर्च करने की कितनी चाहत है? यह इस लिहाज से ज्यादा अहम है कि सरकार अपना खर्च बढ़ाने को अनिच्छुक दिख रही है और निजी कंपनियां भी क्षमता का इस्तेमाल न होने से खर्च बढ़ाने से परहेज कर रही हैं। महामारी की दूसरी लहर के दौरान जरूरी चीजों पर खर्च में पहली लहर की ही तरह कोई कटौती नहीं हुई है। लिहाजा रुकी हुई मांग निकलने से बहाली होने की संभावना कम ही है। इस तरह जून में शहरी क्षेत्र की धारणा खराब होना बड़ी चिंता की बात है। ग्रामीण भारत में उपभोक्ता धारणा जून में भले ही नहीं सुधरी लेकिन स्थिर बनी रही। उम्मीद है कि उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियां वर्ष 2021-22 में ग्रामीण मांग को लेकर अनुकूल रवैया बनाए रखेंगी। हालांकि ऐसे आशावादी नजरिये में कुछ अड़चनें भी हैं। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून जून के अंतिम हफ्ते में ठहर चुका है। साल भर पहले की तुलना में खरीफ फसलों की बुआई करीब 21 फीसदी कम हुई है। ऐसी स्थिति में बहाली होना मुमकिन तो है लेकिन उसे सिर्फ मानकर नहीं चला जा सकता है।

Keyword: कमजोर धारणा, श्रम, रोजगार, वेतन, नौकरी, निवेशक, आमदनी,
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