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बदलाव के मुहाने पर खड़ा प्रतिभूति बाजार

के पी कृष्णन /  07 07, 2021

 

तीस साल पहले जुलाई 1991 में आर्थिक सुधारों की एक बड़ी प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी। उसका एक अहम अवयव वित्तीय बाजार सुधार था। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) अधिनियम 1992 से शुरू होकर अब तक प्रतिभूति बाजारों से संबंधित कानूनों में 14 वैधानिक सुधार और एक संवैधानिक संशोधन किए जा चुके हैं। प्रतिभूति बाजार का मौजूदा स्वरूप इन बदलावों का ही नतीजा है। 

 

इन सुधारों से इक्विटी बाजार का कामकाज एक नए मुकाम पर पहुंचा। इनमें वित्त मंत्रालय, सेबी, एनएसई, बीएसई एवं अनुषंगी वित्तीय बाजारों के ढांचागत संस्थानों के बीच साझा काम हैं। ये सुधार ही वह बुनियाद थी जिसके जरिये आज हम देखते हैं कि इक्विटी बाजार का कुल बाजार पूंजीकरण 230 लाख करोड़ रुपये हो चुका है और विदेशी निवेशकों ने सूचीबद्ध कंपनियों में 43 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया हुआ है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की इक्विटी अंशधारिता का कुल बाजार मूल्य कुल बाजार पूंजीकरण का करीब 19 फीसदी है। व्यावहारिक सोच वाले लोगों को आज डॉलर का मूल्य देखकर खुशी होती है। हालांकि कुछ लोगों को लगता है कि 30 साल के सफर में ऊंची सोच, संस्थानों एवं लोगों के बीच सहयोग और कारगर क्रियान्वयन ने इसकी बुनियाद रखी। 

हालांकि एक समर्थ वित्तीय बाजार प्रणाली के लिए नीतिगत परिवेश तैयार करने का काम अभी पूरा होने से काफी दूर है। वर्ष 2015 में वायदा बाजार आयोग का सेबी में विलय होने के बाद यह काम काफी हद तक अटक चुका है। 

नियामकों के कामकाज में कई समस्याएं हैं। भारत के  नियामकों में केंद्रीकृत ताकत की प्रवृत्ति रही है और वे विधायी, न्यायिक एवं शासकीय काम भी एक साथ करते रहते हैं। अधिकारियों के हाथों में निहित इतनी अधिक ताकत एक उदार लोकतंत्र के संवैधानिक मानकों के लिहाज से असहज होती है और एक परिष्कृत बाजार अर्थव्यवस्था का अनुमान लगा पाने का समस्याजनक स्तर पैदा करती है।

बॉन्ड बाजार और इससे जुड़े अवयवों (बॉन्ड-मुद्रा-डेरिवेटिव गठजोड़) में एक बड़ा फासला रहा है। इन कमजोरियों ने हमें पीछे रोक रखा है। सरकार को महामारी की चुनौतियों से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर उधारी जुटाने की जरूरत पड़ी लेकिन सरकारी बॉन्ड बाजार के मौजूदा ढांचे में उसे पैसे जुटाने में खासी समस्याओं का सामना करना पड़ा। कई भारतीय फर्में भारत में प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने, परिपक्वता तक के परंपरागत सफर से बचने की कोशिश कर रही हैं और उसके बजाय वे विदेशी स्वामित्व या सूचीबद्धता संरचना को अपना रही हैं ताकि वित्तीय बाजारों के नियमन जैसी भारतीय संस्थानों की कमजोरियों से बचा जा सके। निजी फर्मों के वित्त पोषण के लिए तात्कालिक तौर पर बैंकों के बजाय बॉन्ड बाजार का रुख करने की जरूरत है और नीतिगत सीमाओं के चलते यह रूपांतरण बाधित होता रहा है। 

तीसरी समस्या कानून की ठोस बुनियाद बनाने में निहित है जो नियामकीय संगठनों को वित्तीय बाजार नियमन की दिशा में सक्रिय कर सके। मौजूदा कानून इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि उनका उद्देश्य उपभोक्ता संरक्षण, सक्षम नियमन, विवाद समाधान, व्यवस्थागत जोखिम प्रबंधन एवं बाजार दुरुपयोग जैसे प्रतिभूति कानून के कुछ खास बिंदुओं में से क्या है? मौजूदा कानून के उद्देश्यों की अस्पष्टता वित्तीय नियमन के काम में लगे अधिकारियों को भ्रमित करती है और उद्योग जगत में भी अनिश्चितता फैलती है। मसलन, बाजार दुरुपयोग संबंधी मौजूदा कानून 'सेबी धोखाधड़ी निवारक एवं अनुचित व्यापार नियम' सेबी के हाथों में अनियंत्रित विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करता है जिससे निजी व्यक्तियों के लिए नियामकीय जोखिम बढ़ जाते हैं।

दूरदर्शिता के लाभ से जब हम 1991-2011 के दौर की विधायी सक्रियता पर नजर डालते हैं तो उस समय की बौद्धिक क्षमता में बड़ी सीमाएं थीं। कानून में तमाम संशोधन किए गए थे लेकिन पर्याप्त जानकारी न होने से यह काम नहीं कर पाया और इसकी वजह से ये तीन तरह की समस्याओं को न तो उठाया गया और न ही उनका हल निकाला गया। यह जानकारी धीरे-धीरे अर्जित की गई है जिसमें अनुभव, एक शोध साहित्य के विकास और वित्तीय क्षेत्र कानूनी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी, 2011-2015) की अनुशंसाएं भी शामिल रही हैं। 

इसके अलावा बदलाव की एक बड़ी ताकत न्यायपालिका भी रही है। मसलन, 1998 में अरुण जेटली ने हिंदुस्तान लीवर का उस समय प्रतिनिधित्व किया था जब सेबी ने भेदिया कारोबार के आरोप लगाने के साथ ही तत्कालीन प्रावधानों की संवैधानिकता पर सवाल खड़े किए थे। जब इन मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय में बहस हुई तो वित्त मंत्रालय को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे और वह इस कानून को असंवैधानिक मानने और प्रतिभूति अपील अधिकरण (सैट) के गठन के लिए भी राजी हो गया था। 

जब हम शक्तियों के पृथक्करण एवं विधि के शासन की बुनियादी चिंताओं और नियामकों में निहित बेशुमार शक्तियों के बारे में सोचते हैं तो पहले अदालतें इनसे बेफिक्र नजर आती थीं। वर्ष 2004 के क्लैरियंट इंटरनैशनल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ संवैधानिक चिंताओं को स्वीकार किया था लेकिन फौरी तौर पर यथास्थिति बनाए रखने का भी समर्थन किया था। हाल के वर्षों में एक नया न्याय-क्षेत्र का उभार होना शुरू हुआ है। सर्वोच्च अदालत ने नियमन गतिविधि (ट्राई मामला, 2016) और राज्य के हस्तक्षेप में अनुरूपता (आरबीआई मामला, 2020) पर दिए अपने दो ऐतिहासिक फैसलों में लोकतांत्रिक वैधता की मांग रखी है। राष्ट्रीय अधिकरण आयोग के बारे में आए हाल के निर्णय संभवत: नियामकीय अधिकारियों द्वारा संचालित न्यायिक सुनवाई की वैधता को लेकर चिंता जताता है। ये नए निर्देश नियामकों के बारे में एकदम नए न्याय-क्षेत्र की राह खोल देते हैं। यह नया न्याय-क्षेत्र भारत में नियमन पर आधुनिक सोच से मेल खाता है। 

इस पृष्ठभूमि में फरवरी 2021 के बजट भाषण में कुछ अहम प्रगति देखने को मिली जिसमें वित्तीय बाजार कानून को एक नए मुकाम पर ले जाने की बात कही गई थी। बजट भाषण के 68वें पैराग्राफ में वित्त मंत्री ने सेबी अधिनियम 1992, डिपॉजिटरीज अधिनियम 1996, प्रतिभूति अनुबंध नियमन अधिनियम 1956 एवं सरकारी प्रतिभूति अधिनियम 2007 के प्रावधानों को समाहित कर एक तर्कसंगत एकल प्रतिभूति बाजार संहिता बनाने का प्रस्ताव रखा था। 

भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतें पूरी करने के लिए यह काम पूरा करना बेहद जरूरी है। इससे वह नींव भी रखी जाएगी जिसके जरिये वित्त मंत्रालय आने वाले दिनों में पैदा होने वाली मुश्किलों से निपट सकता है। हमारा दायित्व आगे बढऩे एवं एफएसएलआरसी संबंधी खामियों को दूर करने का है। (1) एफएसएलआरसी का नियामकों का सुधरा हुआ कामकाज, बोर्ड की भूमिका एवं संयोजन संबंधी दस्तावेज जमीनी स्तर पर 2015-21 के अनुभवों को दर्शाता है। (2) वित्तीय बाजार नियमन के उद्देश्यों की स्पष्टता जहां आयोग का काम काफी हद तक पूरा है। (3) बॉन्ड एवं मुद्रा डेरिवेटिव गठजोड़ और सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी के आसपास वित्तीय एजेंसी संरचना बनाना जिसमें 2015 के वित्त विधेयक में घोषित पर बाद में वापस ले लिए गए सुधारों के प्रावधान भी शामिल हों। उम्मीद है कि बजट भाषण के 68वें पैरा में की गई संक्षिप्त घोषणा उस बड़े कार्य का अग्रदूत होगी।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व सचिव और एनसीएईआर में प्रोफेसर हैं)

Keyword: बदलाव, प्रतिभूति बाजार, कानून, आर्थिक सुधार, सेबी, अधिनियम,
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