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विविधता और राजनीति को लेकर अहम संदेश

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  July 04, 2021

भारतीयों की धार्मिकता के बारे में प्यू ने जो ताजा शोध सर्वेक्षण किया है वह सुर्खियों मेंं है और बहस का विषय बना हुआ है। क्या यह हमें राजनीति के बारे में कुछ सिखा सकता है?

अब तक इससे जुड़ी बहस ज्यादातर समाज विज्ञान के मानकों तक सीमित रही है: विभिन्न आस्थाओं को मानने वाले भारतीय कितने धार्मिक हैं? वे दूसरों को कितना आदर देते हैं, पड़ोसियों, राष्ट्रवाद और खान-पान को लेकर उनका नजरिया क्या है आदि। परंतु क्या यह शोध ऐसे सवालों के जवाब देता है कि भारत में चुनाव कैसे जीते जाते हैं? खासकर मतदाताओं से क्या कहा जाता है और किस भाषा में कहा जाता है कि वे आपके संदेश और प्रस्ताव को मान लेते हैं?

नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा को जवाब मालूम है। इसलिए सवाल उनके लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए है जो अपना दिमाग खपा रहे हैं और मोदी के चुनावी वादों की मजबूत दीवार को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। वे यह भी जानते हैं कि अगर मोदी मैदान में न हों तो भाजपा को हराया जा सकता है। पश्चिम बंगाल इसका ताजा उदाहरण है।

बड़ा इनाम है केंद्र की सत्ता। वे मोदी के सामने समुचित चुनौती तक पेश क्यों नहीं कर पाए? यदि आप विपक्ष के आकांक्षी नेता हैं तो आप यह सवाल जरूर पूछेंगे कि उनका मत प्रतिशत बढ़ता क्यों जा रहा है? लोग मेरी बात क्यों नहीं सुन रहे हैं?

क्या उनके लिए धर्मनिरपेक्षता के कोई मायने नहीं? क्या बीते सात वर्ष में हमारा देश इतना बदल गया? क्या जाति को लेकर लगाव भी बेअसर हो गया है? 2019 के लोकसभा चुनावों में सपा-बसपा गठजोड़ की नाकामी इसकी बानगी है। यदि लोगों का दिलोदिमाग इस कदर बदल गया है कि उन्हें और कुछ समझाना तक असंभव है तो क्या किया जा सकता है?

हम जानते हैं कि देश के लोग व्यस्त हैं। उनके पास सबकी बात सुनने, उनके अर्थ या इरादों को समझने, उनके दिमाग को पढऩे की फुरसत नहीं है। आपको उन्हें वह संदेश देना होता है जो वे सुनना चाहते हैं। आपको उनमें अपना संदेश सुनने की चाह पैदा करनी होती है। परंतु आप ऐसा तभी कर सकते हैं जब आप उस भाषा में बात करें जो वे समझते हैं। आपको उनको तवज्जो देनी होगी। अब तक आप जान चुके होंगे मोदी की कमियां गिनाकर मतदाताओं को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

वह कौन सी भाषा होनी चाहिए? प्यू के इस सर्वेक्षण के आंकड़ों को बारीकी से देखने पर हमें कई जवाब मिलते हैं। इनमें से कई जवाब उन विरोधाभासों से निकलते हैं जो इन आंकड़ों में निहित हैं। कृपया यह दलील न दें कि यह सर्वेक्षण केवल 30,000 लोगों पर किया गया। यदि प्रविधि मजबूत है तो सर्वेक्षण में शामिल लोगों की तादाद मायने नहीं रखती। चुनाव विश्लेषक संजय कुमार ने कई ट्वीट के माध्यम से बताया कि उनके लोकनीति-सीएसडीएस के 2015 के सर्वे में भी इतने ही लोग शामिल थे। इस सोच का भी कोई अर्थ नहीं है कि मोदी के उभार ने भारत को इतना हिंदूवादी कर दिया है कि अन्य लोगों का कोई भविष्य ही नहीं।

आइए सबसे महत्त्वपूर्ण और जानकारीपरक विरोधाभासों की बात करें।  

पहला, लगभग सभी भारतीय अत्यधिक धार्मिक हैं इसके बावजूद उनमें अन्य धर्मों को लेकर पर्याप्त सहिष्णुता है।

दूसरा, वे धर्म को अपनी पहचान का केंद्र मानते हैं लेकिन वे यह आशा नहीं करते कि यह दूसरों के लिए भी राष्ट्रवाद को परिभाषित करे।

तीसरा, वे मानते हैं कि उनकी आस्था का मूल और उनके राष्ट्रवाद की जवाबदेही यही है कि वे अन्य पंथों के अनुयायियों की इज्जत करें। इसकेबावजूद एक तिहाई भारतीय यह नहीं चाहते कि उनका पड़ोसी किसी अन्य धर्म का हो।

चौथा, वाम दलों को वोट देने वालों में से भी 97 फीसदी आस्तिक हैं।

और पांचवां, वे अन्य धर्मों को मानने वाले नागरिकों से प्रेम करते हैं, भारत की विविधता को सराहते हैं और देशभक्ति की भावना साझा करते हैं लेकिन वे यह नहीं चाहते कि कोई अपने धर्म से बाहर शादी करे। यही बात जाति से बाहर शादी करने पर भी लागू होती है।

इन आंकड़ों से पांच राजनीतिक संदेश निकलते हैं। पहला, भारत के लोग अपने धर्म के बावजूद नहीं बल्कि धर्म के कारण गहरे तक धर्मनिरपेक्ष हैं। दूसरा, वे इस झूठ पर यकीन नहीं करते कि किसी खास धर्म या अन्य धर्मों के लोग देश के प्रति निष्ठावान नहीं हैं। क्योंकि यदि ऐसा होता तो वे उनकी इज्जत नहीं करते। तीसरा, हम अपने धर्म का पड़ोसी चाहते हैं क्योंकि संस्कृति, परंपराओं, त्योहारों और खानपान तक यह हमें सामुदायिकता का अहसास कराता है। यह बात जानकारीपरक है कि जिन समुदाय के लोगों को अन्य धर्म के पड़ोसी से सबसे अधिक दिक्कत है वे जैन (61 फीसदी) हैं। खानपान में उनकी विशिष्ट शाकाहारी पसंद होती है। चौथा, मैं वाम दलों को वोट देता हूं लेकिन मेरे पास ईश्वर रहित विचारधारा के लिए समय नहीं है। इससे भी समझा जा सकता है कि गहन असमानता के बावजूद वाम दलों का प्रभाव सिमट क्यों रहा है। आखिरी बात, मैं किसी भी धर्म के भारतीय को प्यार करता हूं लेकिन दूसरे धर्म में विवाह कुछ ज्यादा बड़ी बात है।

इन सारी बातों को समेटते हुए: मैं अपने देश की विविधता पसंद करता हूं लेकिन मैं अपनी विविध पहचान को भी पसंद करता हूं। मुझे दूसरों के साथ मत मिलाइए। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है। जो भी ऐसा करने का प्रयास करेगा वह हमारे प्रतिरोध को भड़काएगा।

मोदी की भाजपा ने ऐसा कैसे किया। वह बिना हिचक और पूरी ताकत से हिंदू-भारतीय पहचान पर जोर देती है। उन्होंने पहले ही अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों को तवज्जो देनी बंद कर दी है। उनका कहना है कि चूंकि मुस्लिम उन्हें वोट नहीं देंगे इसलिए हिंदुओं क्या आप हमें ज्यादा तादाद में वोट देंगे? या क्या आप किसी अल्पसंख्यक को यह तय करने का अधिकार देंगे कि भारत पर कौन शासन करेगा? मतदाता यह बात समझते हैं। अधिकांश राज्यों में यदि वे आधे हिंदू मत भी हासिल कर लेते हैं तो जीत जाएंगे। पश्चिम बंगाल में जरूरत बड़ी थी यानी 60-65 फीसदी हिंदू मत जरूरी थे इसलिए वे हार गए।

ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिम आमतौर पर भाजपा के खिलाफ मतदान करते हैं और इस बात को हिंदुओं के खिलाफ मतदान के रूप में चित्रित किया गया। ऐसे में तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर जहां अन्य कारक प्रभावी हैं, यह 81 बनाम 15 का फॉर्मूला काम करता है।

लोग मोदी विरोधियों को इसलिए नहीं सुन रहे क्योंकि वे ऐसी भाषा बोलते हैं जो न उन्हें पसंद आती है और न समझ में आती है। आप उन्हें धर्मनिरपेक्षता पर भाषण दीजिए लोग चकित होंगे कहीं आप उन्हें कट्टर तो नहीं मान रहे हैं। आप समाजवाद का वादा करेंगे तो वह तो हर कोई करता है। भारतीय राजनीति ने समाजवाद के सबसे अधिक स्वरूप पेश किए हैं। आप मोदी के आर्थिक प्रदर्शन पर हमला कीजिए और आपसे कहा जाएगा कि मतदाता केवल रोटी-दाल पर नहीं जीता।

दशकों से वाम, कांग्रेस और अन्य दलों के बुद्धिजीवी खासकर हिंदी प्रदेश में नास्तिकता, तार्किकता, नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते आए हैं। इससे धर्म, भाजपा के पाले में चला गया। भारत कभी इसलिए धर्मनिरपेक्ष नहीं होगा क्योंकि लोग अपनी धार्मिक पहचान को अलग रखते हैं बल्कि इसलिए होगा क्योंकि यह अत्यंत धार्मिक देश है जहां लोगों ने शायर इकबाल के संदेश को आत्मसात किया है जो कहता है: मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना। जब आप उपदेश देते हैं तो मुझे चिढ़ होती है।

मोदी के प्रतिद्वंद्वी चुनौती इसलिए नहीं दे पाए क्योंकि उन्हें इस बात में भ्रम है कि कौन हिंदू मतदाता है और कौन धर्म निरपेक्ष। यदि भाजपा हिंदू वोट एकजुट करके जीत रही है तो विपक्षी मुस्लिमों और कुछ अन्य जातीय समूहों की सहायता से उसे नहीं हरा सकेंगे। एक विश्वसनीय नेता चाहिए जो हिंदुओं और मुस्लिमों को उनकी अलहदा पहचान के साथ एकजुट कर सके। प्यू सर्वेक्षण के नतीजे इसी राजनीतिक मुहावरे और भाषा की बात करते हैं।

Keyword: विविधता, राजनीति, प्यू, सर्वेक्षण, लोकसभा चुनाव, लोकनीति, सीएसडीएस,
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