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मुद्रास्फीति की चुनौती और केंद्रीय बैंक का व्यवहार?

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  July 02, 2021

इन दिनों मुद्रास्फीति को लेकर चल रही बहस के तीन बिंदु हैं। पहला, क्या दुनिया के विभिन्न हिस्सों में नजर आ रहे मुद्रास्फीतिक संकेत 'अस्थायी' हैं, या ढांचागत? दूसरा क्या मुद्रास्फीति को वास्तविक राजकोषीय नीति संबंधी कदमों से मदद मिल रही है? और तीसरा, क्या केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को उतनी गंभीरता से ले रहे हैं जितना वे लेते रहे हैं?

मई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक केंद्रीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सहजता के दायरे से बाहर निकल गया। उसने चार फीसदी की दर पर दो फीसदी ऊपर या नीचे का दायरा तय किया है लेकिन मई में खुदरा मुद्रास्फीति 6.3 फीसदी बढ़ी। इसके लिए कुछ हद तक खाद्य मुद्रास्फीति उत्तरदायी है जबकि आयातित तेल की मुद्रास्फीति भी एक वजह है क्योंकि इस वर्ष के अंत में कच्चे तेल के बाजारों से आपूर्ति कम होने की संभावना है। परंतु असल समस्या है मूल मुद्रास्फीति में व्यापक इजाफा जो शायद जिंस कीमतों में इजाफे से संचालित है।

अमेरिका और चीन समेत दुनिया के अन्य हिस्सों में भी मुद्रास्फीति बढ़ी है। अमेरिका में यह पांच फीसदी है जबकि मूल उपभोक्ता महंगाई चार दशक के उच्चतम स्तर पर है। चीन में थोक मूल्य मुद्रास्फीति नौ फीसदी है और यह सितंबर 2008 के वित्तीय संकट के बाद से उच्चतम स्तर पर है। निर्यात में चीन के दबदबे के कारण यह शेष विश्व पर भी असर डाल सकती है।

इसे अस्थायी मानने वाले कहते हैं कि आपूर्ति शृंखला जटिल है और वैश्विक तथा राष्ट्रीय स्तर पर मांग में उभार तथा वायरस के कारण हुई समस्याओं ने इसमें योगदान किया। किसी न किसी तरह के गतिरोध से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। व्हाइट हाउस की आर्थिक सलाहकार परिषद इस धारणा की हिमायती है। कुछ जिंस जिनकी कीमत अमेरिका में बढ़ती दिख रही थी वह कम हुई है। दूसरी ओर कई वित्तीय प्रबंधक मुद्रास्फीति के ढांचागत स्वरूप पर दांव लगा रहे हैं।

भारत में थोकमूल्य मुद्रास्फीति 13 फीसदी है। यह जून 1992 के बाद उच्चतम है। यहां भी ऐसी ही समस्याएं हैं। महामारी की दूसरी लहर के कारण स्थानीय लॉकडाउन लगाने पड़े। इससे ईंधन कीमतों में इजाफे का असर बढ़ा। यह भी स्पष्ट है कि आपूर्ति बाधित अर्थव्यवस्था मांग में सुधार से नहीं निपट पाएगी। एचएसबीसी के एक अर्थशास्त्री के मुताबिक, 'मई केे आंकड़े याद दिलाते हैं कि कैसे 2022 की दूसरी छमाही में हालात अचानक बदल सकते हैं क्योंकि तब टीकाकरण की दर के कारण उपभोक्ता मांग सुधरेगी और ग्रामीण भारतीय दूसरी लहर से उबरकर उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद के लिए आगे आएंगे।'

नीतिगत कदमों और मुद्रास्फीतिक दबाव के बीच के रिश्ते की बात करें तो क्या मामला ऐसा है कि कुछ विकसित देशों में व्यापक राजकोषीय और मौद्रिक विस्तार उनकी अर्थव्यवस्था में उच्च मुद्रास्फीति ला रहा है। वैश्विक स्तर पर ऐसा परिसंपत्ति कीमतों के जरिये हो रहा है? इसके प्रमाण मिलेजुले हैं। सैद्धांतिक रूप से ऐसा कई तरह से हो सकता है कि अमेरिका में नीतिगत विस्तार उभरते विश्व में मुद्रास्फीति की वजह बने। मजबूत डॉलर भी एक वजह है। इसकेे बाद बढ़ती नकदी का सवाल है जो परिसंपत्ति मूल्य मेंं नजर आ रही है। सन 2008 के प्रोत्साहन पैकेज के बाद भी ऐसा देखने को मिला था। उस वक्त चीन के असाधारण प्रोत्साहन ने जिंस कीमतों को दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया। इससे चीन की अर्थव्यवस्था बाहरी प्रोत्साहन का असर झेलने लायक नहीं रही। इस बार चीन के कदम सीमित रहे। अमेरिका में ऐसा नहीं हुआ। आरबीआई की गत माह की रिपोर्ट से आकलन करें तो वह इस संभावना से वाकिफ है कि परिसंपत्ति कीमतों में इजाफे के बीच आर्थिक सुधार के लिए व्यवस्था में डाली गई नकदी का अनचाहा परिणाम परिसंपत्ति कीमातें में इजाफे के रूप में दिख सकता है। सन 2008 के बाद राजकोषीय स्थिति में जरूरत से अधिक खिंचाव के कारण वृहद आर्थिक स्थितियों में तनाव बढ़ा था। सरकार ने अब तक वह गलती नहीं दोहराई है लेकिन आशा करनी चाहिए कि वह घाटे की अनदेखी करने की अपीलों का प्रतिरोध जारी रखेगी।

अगर केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति नियंत्रित रखने का अपना काम भूल जाएं तो यह बस एक समस्या है लेकिन असल चिंता है केंद्रीय बैंकों का दोबारा राजनीतिकरण। बीते कुछ वर्षों से ऐसा हो रहा है और डर है कि यह मुद्रास्फीति का जोखिम तब तक नहीं पहचानेगी जब तक बहुत देर न हो जाए। पश्चिमी दुनिया जिसने दशकों से मुद्रास्फीतिक माहौल का सामना नहीं किया वहां जोखिम यह है कि खतरे को भुला दिया जाएगा। फेड की पिछली बैठक ने उन आशंकाओं को संयमित रखा है। फेड चेयरमैन जीरोम पॉवेल ने कहा कि बैठक में धीरे-धीरे विस्तार को कम करने की चर्चा हुई। इससे मुद्रास्फीति से जुड़ी चिंता करने वाले कुछ शांत हुए। लैरी समर्स ने कहा कि बैठक में फेड ने यह स्वीकार किया कि हमारी स्थिति अनुमान से अलग है और बैठक को फेड की ओर से समस्या को चिह्नित करने वाली बैठक के रूप में देखा जाए। उभरते बाजारों समेत तमाम अन्य केंद्रीय बैंक भी अब सावधानी से अपना रुख सुधार रहे हैं। ब्राजील में मुद्रास्फीति की दर 8 फीसदी से अधिक है और वहां केंद्रीय बैंक तीन बार ब्याज दरें बढ़ा चुका है। रूसी केंद्रीय बैंक ने भी ऐसा ही किया। यूरोपीय केंद्रीय बैंक तथा पूर्वी यूरोप के अन्य देशों ने भी परिसंपत्ति मूल्य मुद्रास्फीति की प्रतिक्रिया में कड़ी नीतिगत प्रतिक्रिया के संकेत दिए हैं।

ऐसे में रिजर्व बैंक अन्य समकक्षों के बीच अलग नजर आ रहा है। आरबीआई मानता है कि हालिया मुद्रास्फीति आपूर्ति संचालित है और उसके केवल मांग की वापसी के बाद मुद्रास्फीति की चिंता करनी चाहिए। यह स्पष्ट नहीं है कि इस दावे के पीछे कोई आर्थिक विश्लेषण है भी या नहीं। गवर्नर शक्तिकांत दास के संकेतों के अनुसार यदि आरबीआई सुधार के टिकाऊ होने तक नीति को शिथिल रखना चाहता है तो शायद बहुत देर हो जाएगी। भारत पश्चिम का देश नहीं है और उपभोक्ताओं और कंपनियों के मन में मुद्रास्फीति की याद ताजा है। फेड घटना के बाद प्रतिक्रिया दे सकता है लेकिन आरबीआई नहीं।

Keyword: मुद्रास्फीति, चुनौती, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, आरबीआई, प्रोत्साहन पैकेज,
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