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देश में सूक्ष्म वित्त उद्योग के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  July 01, 2021

भारत का सूक्ष्म वित्त उद्योग मार्च तिमाही में बढ़कर 2.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। दिसंबर तिमाही के मुकाबले इसमें करीब 10 प्रतिशत तेजी दर्ज हुई। इस उद्योग की सालाना वृद्धि दर 8.4 प्रतिशत रही है। यह एक अच्छा संकेत है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सूक्ष्म वित्त उद्योग के नियमन में व्यापक बदलाव लाने का प्रस्ताव दिया है।

वर्ष 2010 में आंध्र प्रदेश सरकार ने सूक्ष्म वित्त उद्योग में कर्जदारों पर ज्यादती रुकवाने के लिए एक कानून बनाया था। इसके बाद आरबीआई ने सूक्ष्म वित्त कारोबार में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के प्रवेश की इजाजत दे दी। इस कारोबार में उतरने वाली ऐसी कंपनियों को एनबीएफसी-एमएफआई नाम दिया गया।

हालांकि अब सूक्ष्म वित्त कारोबार में एनबीएफसी-एमएफआई का दबदबा नहीं रह गया है। यद्यपि 197 सूक्ष्म वित्त ऋणदाताओं में 86 एनबीएफसी-एमएफआई हैं, लेकिन इस कारोबार में मौजूदा ऋण पोर्टफोलियो में उनकी हिस्सेदारी 31 प्रतिशत से कम है। दूसरी तरफ व्यावसायिक बैंकों का हिस्सा 41 प्रतिशत है। हालांकि ऋण में इन दोनों की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत के साथ लगभग बराबर स्तर पर है। बैंकों के लिए सूक्ष्म वित्त उद्योग एक खुला बाजार है, जबकि एनबीएफसी-एमएफआई कुछ नियम-कायदों से बंधी हैं।  

इस समय एक ही ग्राहक को दो से अधिक एनबीएफसी-एमएफआई उधार नहीं दे सकती हैं। एक शर्त यह भी है कि उनके ऋण खाते में ऐसे ऋण का अनुपात 85 प्रतिशत होना चाहिए जिनके एवज में ग्राहकों की कोई वस्तु गिरवी नहीं रखी गई है। एनबीएफसी-एमएफआई ग्रामीण क्षेत्रों में उन्हीं ग्राहकों को ऋण दे सकती है जिनकी पारिवारिक आय 1.25 लाख रुपये तक है। शहरी क्षेत्रों के ग्राहकों के लिए यह सीमा 2 लाख रुपये रखी गई है। पहले चरण में एनबीएफसी-एमएफआई केवल 75,000 रुपये बतौर ऋण दे सकती हैं जिसे बाद में बढ़ाकर 1.25 लाख रुपये किया जा सकता है। हालांकि ये नियम-कायदे केवल एनबीएफसी-एमएफआई के लिए हैं और बैंक इनसे मुक्त रखे गए हैं। एनबीएफसी-एमएफआई को ऋण पर ब्याज दर एवं ऋण मंजूरी प्रक्रिया पर प्रोसेसिंग फीस तय करने की स्वतंत्रता नहीं है और इनके लिए भी उन्हें नियमन के दायरे में रहकर काम करना होता है। बैंक पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है और वे ब्याज दरें तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।

कुल मिलाकर सूक्ष्म वित्त कारोबार में एनबीएफसी-एमएफआई के मुकाबले बैंकों का पलड़ा अधिक भारी है क्योंकि उन्हें अधिक आजादी है। आरबीआई नए दिशानिर्देशों के जरिये यह असमानता दूर करना चाहता है। आखिर, आरबीआई ने नियमन में बदलाव के लिए क्या प्रस्ताव दिए हैं?

किसी एक ग्राहक को अधिकतम दो एनबीएफसी-एमएफआई द्वारा ऋण देने की शर्त हटाई जा रही है। कर्जदाताओं की संख्या के बजाय ऋण की राशि पर विचार किया जाएगा। अब कर्जधारकों की ऋण चुकाने की क्षमता का आकलन किया जाएगा।

ऋण एवं आय अनुपात देखकर उधारी दी जाएगी। कर्ज पर ब्याज एवं मूलधन का भुगतान किसी भी समय कर्जदाता की पारिवारिक आय का 50 प्रतिशत तक सीमित रखा गया है।ठ्ठ इससे ऋण की सीमा और ऋण की न्यूनतम अवधि समाप्त हो जाएगी। अगर कोई परिवार अधिक कर्ज चुकाने में सक्षम है तो एनबीएफसी-एमएफआई उसे ऋण दे सकती हैं।

सूक्ष्म ऋणों के लिए गिरवी मुक्त प्रावधान जारी रहेगा लेकिन बैंकों पर भी यह बात लागू होगी। बैंक अब सूक्ष्म ऋणों के एवज में कर्जदाताओं से कोई वस्तु गिरवी के तौर पर जमा करने के लिए नहीं कह सकते हैं। सभी वित्तीय संस्थान कर्जदाताओं को बिना किसी जुर्माने के ऋण का भुगतान तय अवधि से पहले करने की अनुमति देंगे।  

तथाकथित गैर-लाभकारी कंपनियों, जो सूक्ष्म वित्त कारोबार से जुड़ी हैं और जिनके ऋण खाते अपेक्षाकृत अधिक (100 करोड़ रुपये या इससे अधिक) हैं, पर एनबीएफसी-एमएफआई की तरह ही सभी प्रावधान लागू होंगे।

आय सृजन के मकसद से 50 प्रतिशत ऋण आवंटन की अनिवार्यता आरबीआई समाप्त करने के पक्ष में है। आय सृजन और उपभोग ऋण के बीच अंतर खत्म किया जा रहा है।

अंत में, आरबीआई ऋण दर पर लगी सीमा भी समाप्त करना चाहता है। यह बाजार पर छोड़ दिया जाएगा। एनबीएफसी-एमएफआई भी अपने ऋणों पर ब्याज दर तय कर सकेंगे।

इन नियमन के व्यापक परिणाम होंगे। ग्राहकों की जमा रकम के रूप में सस्ती पूंजी उपलब्ध होने के बावजूद बैंक अधिक ब्याज लेते हैं। इसकी वजह यह है कि बैंक ऋण आवंटित करते समय एनबीएफसी-एमएफआई की ब्याज दर पर नजर रखते हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई एनबीएफसी-एमएफआई ग्राहक से 21 प्रतिशत ब्याज ले रही हैं तो बैंक उसे 19 प्रतिशत की पेशकश कर अपने पाले में कर लेते हैं। बैंक सस्ती दरों की पेशकश जरूर करते हैं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एनबीएफसी-एमएफआई के मुकाबले उन्हें ऋण पूंजी जुटाने पर कम खर्च करना पड़ता है। बाजार पर सारा दारोमदार होने से ऋण दरें प्रतिस्पद्र्धा से तय हो पाएंगी। देनदारियां बेहतर ढंग से प्रबंधित करने वाली एनबीएफसी-एमएफआई ऋण दरें कम कर सकती हैं। इससे बैंकों को भी ब्याज दरें कम करनी होंगी। एनबीएफसी-एमएफआई को सभी कर्जधारकों को एक ही ब्याज दर पर ऋण नहीं देने होंगे। बैंकों की तरह वे भी ग्राहकों की के्रडिट रेटिंग देखकर उन्हें अलग-अलग दरों पर ऋण दे पाएंगी।  

पिछले कुछ वर्षों से कुछ बैंक नियामकीय त्रुटियों का बेजा फायदा उठा रहे हैं। यह एक सुस्त बैंकिंग का उदाहरण है। ग्राहकों को उनकी क्षमता से अधिक ऋण देने का चलन भी नए नियमन आने के बाद थम जाएगा। सभी कर्जदाताओं को कारोबार आगे बढ़ाने के लिए नए तरीके अपनाने होंगे। संक्षेप में, नए दिशानिर्देश प्रभाव में आने के बाद सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में एक युग की शुरुआत होगी।

Keyword: सूक्ष्म वित्त उद्योग, सालाना वृद्धि दर, आरबीआई, नियमन, एनबीएफसी,
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