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सूक्ष्म और अपारदर्शी मुद्रास्फीति कर

गुरबचन सिंह /  June 25, 2021

मई में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भारत सरकार को 99,122 करोड़ रुपये का भारी भरकम लाभांश सौंपा और यह इकलौता ऐसा मामला नहीं है। कैसे?

बुनियादी और सरलीकृत कहानी यह है कि आरबीआई नियमित रूप से नई मुद्रा जारी करता है। मुद्रा जारी करने की उसे कोई खास लागत नहीं पड़ती। परंतु बाजार में इस मुद्रा की अपनी क्रयशक्ति होती है क्योंकि यह वैधानिक होती है। ऐसे में आरबीआई बीते वर्षों के दौरान काफी आय जुटाने में कामयाब रहा। हाल के वर्षों में उसने भारत सरकार को 'लाभांश आय' के रूप में जो भुगतान किया है उसमें तेजी से इजाफा हुआ है।

आरबीआई नियमित अंतराल पर जो नई नकदी जारी करता है वह काफी हद तक बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतें पूरी करने के लिए आवश्यक मुद्रा के अतिरिक्त होती है। यह अतिरिक्त जारी की गई नकदी किसी न किसी प्रकार मुद्रास्फीति की वजह बनती है। या फिर मुद्रास्फीति को समायोजित करती है और उसे बरकरार रखती है जो कहीं न कहीं नजर आती है।

यह बात भी सही है कि ये विश्लेषण बीते एक दशक में अमेरिका पर लागू नहीं होता लेकिन वहां के हालात भी हमसे अलग हैं।

आरबीआई भारत सरकार को जो तथाकथित लाभांश भुगतान करती है उससे सरकार को बाजार में अधिक खरीदारी करने का अवसर मिलता है। परंतु यह आय उत्पादन पर आधारित नहीं है। ऐसे में जनता को खरीद बढ़ाने का अवसर नहीं मिलता। सरकार को लाभ होता है और जनता को नुकसान। हम पर एक प्रभावी कर लगता है जो बहुत सूक्ष्म और अपारदर्शी तरीके से लगाया जाता है क्योंकि यह सीधे आरबीआई के जरिये एकत्रित होता है। आर्थिक लिखा पढ़ी की भाषा में इसे मुद्रास्फीति कर के रूप में कहा जाता है, हालांकि शासकीय अधिकारी इसे हमेशा ही लाभांश आय कहते हैं।

मुद्रास्फीति कर, आय कर की तरह प्रगतिशील नहीं है। आय कर की दर आय के साथ बढ़ती है और कम आय वालों को पूरी छूट प्रदान की जाती है। मुद्रास्फीति कर की कहानी एकदम अलग है। यह कर प्राथमिक तौर पर ऐसे लोगों पर केंद्रित होता है जिनकी आय या परिसंपत्तियां मुद्रास्फीति के साथ कदमताल नहीं कर पातीं। इसमें बड़ी तादाद में ऐसे लोग शामिल होते हैं जो बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं या जो कम जानकार अथवा मोलतोल में कमजोर हैं। ऐसे में मुद्रास्फीति कर प्रतिगामी प्रतीत होता है।

हमने ऊपर जिस प्रकार की आय की चर्चा की उससे जुड़े दो अलग-अलग प्रश्न हैं। पहला, क्या आरबीआई को उसे सरकार के साथ इस प्रकार साझा किया जाना चाहिए, खासतौर पर तब जब देश कोविड-19 महामारी के भीषण संकट से जूझ रहा है? दूसरा, क्या आरबीआई को इस प्रकार की उच्च आय 'अर्जित' करनी चाहिए? पहले प्रश्न का उत्तर हां है। जबकि दूसरे सवाल के लिए हमेंं थोड़ा पुरानी बातों को जानना होगा।

अतीत में मुद्रास्फीति की दर लंबे समय तक 7 फीसदी से ऊपर रही। उसके बाद 2013-16 के बीच हुए विचार विमर्श के बाद आरबीआई को आधिकारिक रूप से यह निर्देश दिया गया कि वह 4 फीसदी की मुद्रास्फीति की दर को लक्षित करे। इसके लिए लक्ष्य से दो फीसदी विचलन की गुंजाइश छोड़ी गई। हालांकि इस गुंजाइश का इस्तेमाल अस्थायी परिस्थितियों में ही होना था। ऐसे में सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो बीते दशक में मुद्रास्फीति कर में सुधार हुआ है। प्रश्न यह है कि आरबीआई व्यवहार में 4 फीसदी मुद्रास्फीति के लक्ष्य को तवज्जो दे रहा है अथवा नहीं?

मुद्रास्फीति को लक्षित करने का काम 2013 से 2016 के बीच अनौपचारिक रूप से किया गया और उसके बाद इसे औपचारिक रूप दिया गया। मुद्रास्फीति में कमी भी आई और यह 4 प्रतिशत के लक्षित दायरे की ओर खिसकी। बहरहाल, सन 2020 में मुद्रास्फीति की दर दोबारा तेजी से बढ़ी और यह पूरे वर्ष के दौरान 6.6 फीसदी रही। यह 4 फीसदी के लक्ष्य से 65 प्रतिशत अधिक है। इस वर्ष मुद्रास्फीति की दर कम हुई लेकिन आरबीआई के वक्तव्यों और कदमों से यही लग रहा है कि अर्थव्यवस्था एक बार फिर उच्च मुद्रास्फीति दर और उच्च मुद्रास्फीति कर की ओर बढ़ रही है। मौजूदा दौर में आरबीआई का झुकाव उच्च मुद्रास्फीति की ओर हो सकता है क्योंकि इससे उसे उत्पादन और रोजगार बढ़ाने में मदद मिलेगी। बहरहाल, अतीत में इस राह पर हम चल चुके हैं और अनुभव अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सुधार किया जाए। वास्तविक अर्थव्यवस्था की मदद के लिए और भी नीतियां हैं लेकिन वह एक अलग किस्सा है।

अमेरिका में मुद्रास्फीति का स्तर करीब एक दशक से दो फीसदी के तय लक्ष्य से कम बना हुआ है। ऐसे में केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व अब दो फीसदी से अधिक मुद्रास्फीति को प्रोत्साहन दे रहा है ताकि अमेरिका में मुद्रास्फीति की औसत दर दो फीसदी के आसपास पहुंच सके। उस दलील से देखें तो भारत में सन 2020 की उच्च मुद्रास्फीति के बाद आरबीआई को भारत में मुद्रास्फीति को 4 फीसदी से कम रखने की दिशा में पहल करनी चाहिए। इसे किसी भी प्रकार 4 फीसदी से अधिक के स्तर पर नहीं जाने देना चाहिए। यानी उसे मुद्रास्फीति कर बढ़ाने से भी परहेज करना चाहिए। भारत सरकार अन्य करों के माध्यम से भी फंड जुटा सकती है।
(लेखक भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली केंद्र के अतिथि प्राध्यापक हैं)

Keyword: मुद्रास्फीति कर, आरबीआई, नई मुद्रा, लाभांश भुगतान, परिसंपत्ति, फेडरल रिजर्व,
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