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संकट के समय में हो सहयोगात्मक नेतृत्व

आर गोपालकृष्णन /  June 22, 2021

काश भारत में कोई ऐसा संजीदा नेता होता जो कह सकता, 'फिलहाल सभी राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर हम अपने मतदाताओं की बेहतरी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। आइए उस इंद्रधनुषी देश की तरह व्यवहार करते हैं जो कि हम हैं।' यह किसी भी दल के विश्वसनीय नेता का बयान हो सकता है।

मुझे वैज्ञानिक लेखक कार्लो रोवेली द्वारा गत वर्ष महामारी केे बारे में कही गई बात बहुत पसंद है। उन्होंने कहा था, 'कठिन समय में यह स्पष्ट हो जाता है कि सहयोग करना प्रतिस्पर्धा की तुलना मेंं बेहतर होता है। मेरी गुप्त चाह है कि मौजूदा संकट से हम सब इसी निष्कर्ष पर पहुंचें।' यह सही है कि कारोबारी समाचार पत्रों को तार्किक और विश्लेषण परक होना चाहिए लेकिन मेरा यह आलेख थोड़ा भावनात्मकहै।

मैं एक धार्मिक हिंदू हूं लेकिन धर्म मेरे लिए एकदम निजी विषय है। तमाम अन्य लोगों की तरह मैं भी गरीबों के लिए दुखी होता हूं, मेरे भी मन में उन लोगों के प्रति अतार्किक पूर्वग्रह होता है जो तेजी से काफी संपत्ति जमा कर लेते हैं। मैं भी जैक्स मार्शियन और दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के विचारों के प्रति आकर्षित हूं। मैंने देश का एक बेहतर नागरिक बनने का प्रयास किया है।

अपने जीवन के इस चरण में मुझे अपने देश को देखकर आश्चर्य होता है और लगता है कि क्या हमारी राजनीति देश के नागरिकों को नीचा दिखा रही है। कोविड महामारी भारतीय जनता पार्टी, तृणमूल कांग्रेस या कांग्रेस पार्टी को नहीं पहचानती। अत्यंत अहम समय में अनेक नेता गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे हैं। मेरी कामना है कि काश आज हमारे पास गांधी या मंडेला होते। एक गंभीर नेता जिन्होंने कहा था, 'आइए अपने राजनीतिक मतभेदों को अस्थायी रूप से भुला दें और बेहतरी की अपनी राष्ट्रीय परंपरा के अनुरूप काम करें।'

यदि आप अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो आप रिचर्ड निक्सन या डॉनल्ड ट्रंप के बजाय यकीनन अब्राहम लिंकन या एफडी रूजवेल्ट की तरह याद किया जाना पसंद करते। डॉनल्ड ट्रंप के प्रशंसकों ने लंबे समय तक उनके बारे में बढ़ाचढ़ाकर बातें कीं और स्वयं ट्रंप ने भी ऐसा ही किया। इसके बावजूद वैकल्पिक नजरिया यही कहता है कि 'महामारी के दौरान एक ओर वह लोगों को बीमारी के प्रसार को बढ़ाने वाले व्यवहार के लिए उकसाते रहे तो वहीं दूसरी ओर वह लोगों की जान बचाने के लिए जरूरी संसाधन जुटा पाने में नाकाम रहे, अनिच्छुक रहे और लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया।' (प्रोफेसर टिम नफटली, द अटलांटिक, 19 जनवरी, 2021)

जिस प्रकार सफलता का श्रेय नेता को मिलता है उसी तरह नाकामी का ठीकरा भी उसी के सर फूटता है। दोनों ही बातें गलत हैं लेकिन हकीकत यही है। जो नेता श्रेय लेते हैं लेकिन नाकामी का दोष दूसरों के सर मढ़ देते हैं उन्हें भुला दिया जाता है। बहरहाल, नेताओं को गलतियां परिभाषित नहीं करतीं बल्कि गलतियों के बाद जो होता है वह उनके बारे में बताता है। किसी गलती को नकारना बहुत गलत कदम है। यह सच है कि कई नेता अपनी गलतियां स्वीकार नहीं करते लेकिन इस बात को बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे नेता भविष्य के नेताओं के लिए भी गलत उदाहरण स्थापित करते हैं। जवाबदेही की नाकामी दरअसल नेतृत्व की नाकामी का ही एक रूप है।

सन 1979 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष सतीश धवन ने पहले एसएलवी-3 रॉकेट प्रक्षेपण की नाकामी की जवाबदेही ली थी। अगले प्रक्षेपण की सफलता पर वह पृष्ठभूमि में ही रहे और दूसरों को इसका श्रेय दिया। सन 2016 में अमेरिकाज कप वल्र्ड सिरीज का आयोजन ओमान मेंं किया गया था। ओलिंपिक इतिहास के सबसे सफल नाविक सर बेन एंस्ली ने संभावित विजेता टीम का नेतृत्व किया। टीम की प्रायोजक थी टाटा के स्वामित्व वाली लैंड रोवर। तीन में से दो अवसरों पर एंस्ली ने हवा के रुख का गलत अनुमान लगाया इसलिए अन्य नौकाएं उनसे आगे निकल गईं। उन्होंने विनम्रतापूर्वक गलती स्वीकार की और अपनी टीम से गुजारिश की कि तीसरी बार जीतना है और टीम जीती भी।

रॉबर्ट रुबिन को सन 1990 के दशक में अमेरिका का सर्वाधिक सफल वित्त मंत्री माना जाता था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने वित्तीय उद्योग पर नियंत्रण ढीला किया। इसके बाद हालात बिगड़े और नियंत्रण शिथिल करने की आलोचना की गई। सन 2008 में सिटी ग्रुप के एक वरिष्ठ सलाहकार के रूप में उन्होंने द वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, 'उसके लिए कोई तैयार नहीं था...चूंकि उस वक्त तक बोर्ड को जानकारी हो गई थी इसलिए शायद हमें अलग तरह से काम करना चाहिए था...सीखने के लिए काफी कुछ है।'

एक बार मैंने सुना कि एक परेशानहाल सीईओ को अपनी संचार टीम से कहते सुना, 'केवल नकारात्मक खबरें सामने आ रही हैं। कृपया हमारी सफलता के बारे में सकारात्मक खबरें सामने लाइए।' टीम के ऐसे प्रयास ने एक और परेशानी खड़ी कर दी। हालांकि बॉस ने जो 10 कदम उठाए थे उनमें से सात सही थे लेकिन आम लोगों की रुचि केवल इस बात में थी कि तीन गलतियों को कैसे दूर किया जाएगा।

महानता की कीमत है जिम्मेदारी। इतिहास हमें जिम्मेदारी लेने के बारे में चार सबक देता है:

(1) सावधान रहें कि चीजें हमेशा वैसी नहीं रहतीं जैसी वे दिखती हैं

(2) यह स्वीकार करें कि नाकामी को स्वीकार करना कमजोरी नहीं है

(3) ऐसे कदम उठाएं जो वास्तव में अंतर पैदा करें

(4) सक्रियता से आगे बढ़कर भरोसा कायम करें


इसके विपरीत विफलताओं के प्रबंधन के बीच निम्न चार गलतियां होती हैं:

(1) समस्याओं की तुलना कहीं अधिक बड़ी समस्याओं से करके उन्हें छोटा बताना

(2) अपने समर्थकों को दोष दूसरे पर डालने की अनुमति देना

(3) भ्रामक अद्र्ध सत्य या उससे भी बुरी बात झूठ बोलना

(4) दोष दूसरों पर डालना


उम्र के सात दशक पूरे करने के बावजूद मैं आशा करता हूं कि राष्ट्रीय नेता और मीडिया मौजूदा संकट से निपटने के लिए सहयोगात्मक रुख के विचार को बढ़ावा देंगे।
(लेखक टाटा संस के निदेशक एवं हिंदुस्तान यूनिलीवर के वाइस- चेयरमैन रह चुके हैं)

Keyword: नेतृत्व, नेता, राजनीतिक मतभेद, मतदाता, नाकामी, इसरो, रॉकेट प्रक्षेपण,
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