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कर संग्रह: बीमारी की गलत पहचान के खतरे

ए के भट्टाचार्य /  June 18, 2021

केंद्र के वर्ष 2020-21 के सकल कर राजस्व (जीटीआर) संयोजन में आए एक फर्क ने कर विशेषज्ञों के बीच घबराहट पैदा कर दी है। पिछले वित्त वर्ष में जीटीआर में प्रत्यक्ष कर राजस्व की हिस्सेदारी सकल घरेलू उत्पाद का 4.7 फीसदी थी जो जीडीपी के 5.4 फीसदी हिस्सेदारी वाले अप्रत्यक्ष कर राजस्व से काफी कम है। पिछले 13 वर्षों में ऐसा सिर्फ दूसरी बार हुआ कि प्रत्यक्ष कर राजस्व अप्रत्यक्ष कर संग्रह से कम रह गया। इसके पहले नोटबंदी के साल 2016-17 में भी ऐसा हुआ था। तब प्रत्यक्ष कर राजस्व 5.52 फीसदी और अप्रत्यक्ष कर राजस्व जीडीपी का 5.63 फीसदी रहा था।

कर विशेषज्ञों के परेशान होने की वजह क्या है? असल में केंद्र के जीटीआर में अप्रत्यक्ष करों की प्रमुख स्थिति को प्रतिगामी एवं अनुचित माना जाता है। जहां प्रत्यक्ष करों का शुल्क करदाताओं के आय स्तर से जुड़ा हुआ है, वहीं अप्रत्यक्ष करों का बोझ सभी करदाताओं पर समान रूप से पड़ता है और उनकी आय का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। मसलन, एक अमीर आदमी भी साबुन खरीदते समय उतना ही जीएसटी कर देता है जितना एक गरीब आदमी।

लिहाजा कर विशेषज्ञ इस बात को लेकर चिंतित हैं कि केंद्रीय कर प्रणाली फिर से अन्यायपूर्ण हो सकती है और बीते दशक में हासिल लाभ गंवाने की नौबत आ सकती है। ऐसे में परोक्ष कर राजस्व की जीटीआर में हिस्सेदारी कम करने के लिए इसकी कर दरें कम करने की मांग तेज हो सकती है। लेकिन ऐसी मांग पर गौर करने के पहले हमें केंद्र के जीटीआर संयोजन के पिछले रुझान पर भी ध्यान देना होगा।

भारत में सुधार लागू होने के बाद केंद्र को वहां तक पहुंचने में 17 साल लग गए जहां प्रत्यक्ष कर राजस्व ने कुल जीटीआर संग्रह में अप्रत्यक्ष कर को पीछे छोड़ दिया। वर्ष 1990-91 में प्रत्यक्ष करों का जीडीपी में हिस्सा 1.94 फीसदी के चिंताजनक स्तर पर था जबकि अप्रत्यक्ष कर राजस्व जीडीपी का 8.17 फीसदी था। उस समय अप्रत्यक्ष करों की इतनी प्रमुखता हुआ करती थी।

आने वाले वर्षों में इस असंतुलन को धीरे-धीरे कम किया जाता रहा। वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह का कार्यकाल खत्म होने तक जीडीपी में परोक्ष करों का हिस्सा बढ़कर 3 फीसदी हो चुका था जबकि प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी घटकर 7 फीसदी पर आ गई थी। उनके बाद वित्त मंत्री बनने वाले पी चिदंबरम एवं यशवंत सिन्हा ने भी साहसिक एवं नवोन्मेषी सुधारों से इस अंसतुलन को दूर करने का काम जारी रखा। इसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2008-09 तक प्रत्यक्ष कर राजस्व जीडीपी के 5.8 फीसदी पर जा पहुंचा जो प्रत्यक्ष कर राजस्व (5.18 फीसदी) से ज्यादा था।

उसके बाद से जीटीआर में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा अमूमन उसी स्तर पर बना रहा है। अप्रत्यक्ष कर राजस्व अधिक होने का एक कारण तो यह है कि प्रत्यक्ष कर की दरों में कटौती से राजस्व कम हो गया था। हालांकि नोटबंदी का साल 2016-17 इसका अपवाद रहा जब प्रत्यक्ष कर का स्तर अप्रत्यक्ष कर से कम रहा लेकिन ऐसा होनेे का कारण प्रत्यक्ष कर की वृद्धि नहीं थी। प्रत्यक्ष कर राजस्व जीडीपी के 5.52 फीसदी के स्वस्थ स्तर पर बना हुआ था लेकिन अप्रत्यक्ष कर में तीव्र वृद्धि से यह जीडीपी के 5.63 फीसदी पर पहुंच गया। और इसकी वजह पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पाद शुल्क में की गई तीव्र वृद्धि थी जिसे मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल के दाम गिरने के बाद किया था।

कुछ ऐसा ही वर्ष 2020-21 में भी हुआ। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कमी का फायदा उठाते हुए केंद्र ने कोविड महामारी के चलते आर्थिक गतिविधियां ठप होने के बाद 2020 के मध्य में दो बार उत्पाद शुल्क बढ़ा दिए। इसके अलावा सरकार ने कई उत्पादों पर सीमा शुल्क भी बढ़ाए। ऐसी स्थिति में वर्ष 2020-21 में सीमा शुल्क संग्रह 23 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया और उत्पाद शुल्क संग्रह भी एक साल पहले की तुलना में 63 फीसदी उछल गया। जीडीपी में हिस्सेदारी के संदर्भ में सीमा शुल्क 0.54 फीसदी से बढ़कर 0.68 फीसदी हो गया और उत्पाद शुल्क भी 1.18 फीसदी से बढ़कर 1.97 फीसदी हो गया। इस अवधि में जीएसटी राजस्व संग्रह में कमी आई लेकिन वार्षिक गिरावट सिर्फ 8 फीसदी ही थी और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी भी 2019-20 के 2.94 फीसदी से मामूली रूप से कम होकर 2020-21 में 2.78 फीसदी रह गई।

अप्रत्यक्ष करों के प्रत्यक्ष करों से आगे निकलने के बावजूद यह ध्यान रखना होगा कि बीते सालों की तुलना में अप्रत्यक्ष करों की वृद्धि असामान्य नहीं है। जीडीपी में अप्रत्यक्ष करों का हिस्सा 2020-21 में बढ़ा है लेकिन अब भी यह जीडीपी के 6-8 फीसदी के स्तर के आसपास भी नहीं है जो 2001 तक बेहद आम बात होती थी। बीते दशक में अप्रत्यक्ष करों का जीडीपी में हिस्सा 4.5 फीसदी से लेकर 5.5 फीसदी के बीच ही रहा है। लिहाजा हाल में हुई वृद्धि उतनी खास नहीं है।

यह सच है कि अप्रत्यक्ष करों पर अधिक आश्रित रहने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। दरअसल लीकेज की गुंजाइश कम होने से अप्रत्यक्ष करों का संग्रह अधिक आसान होता है। अधिकांश दरें मूल्य-आधारित होने से उनकी अधिकता स्वत: ही मुद्रास्फीति के अनुरूप होती है। इसके साथ ही केंद्र के दो-तिहाई उपकर एवं अधिभार अप्रत्यक्ष करों के जरिये ही लगाए जाते हैं। इस तरह अप्रत्यक्ष करों का अधिक संग्रह होने से केंद्र को राज्यों के साथ कम कर बांटने की रियायत मिल जाती है। असल में उपकर एवं अधिभार राज्यों के साथ नहीं बांटे जाते हैं। बहरहाल असल समस्या अप्रत्यक्ष करों के साथ न होकर प्रत्यक्ष करों में है। वर्ष 2017-18 में जीडीपी का करीब 6 फीसदी हिस्सा रहने के बाद प्रत्यक्ष करों का हिस्सा क्रमिक रूप में गिरता चला गया है। इस हालत के लिए दो कारक जिम्मेदार हैं।

पहला, व्यक्तिगत आयकर छूट के नियम 2019 में बदले गए थे जिसके बाद 5 लाख रुपये तक की सालाना आय कर-मुक्त हो गई। इसके पहले 3.5 लाख रुपये तक की सालाना आय ही कर-मुक्त हुआ करती थी। वर्ष 2019 के पहले लगभग 2.2 करोड़ व्यक्तिगत आयकर रिटर्न में किसी तरह का कर भुगतान नहीं हुआ था। लेकिन छूट के स्तरों में बदलाव होने के बाद 1.3 करोड़ अन्य लोगों के रिटर्न में भी कोई भुगतान नहीं हुआ था। इस तरह 5.8 करोड़ रिटर्न में से कुल 3.5 करोड़ यानी 63 फीसदी रिटर्न प्रत्यक्ष कर संग्रह के दायरे से बाहर ही रहे।

दूसरा, कॉर्पोरेट कर दरों में भी 2019 से कमी की गई है जिसका असर कॉर्पोरेट कर राजस्व के संग्रह में आई कमी के तौर पर महसूस किया गया।

इस तरह अप्रत्यक्ष कर राजस्व में वृद्धि की शिकायत कर रहे और इन कर दरों में कटौती की मांग उठा रहे लोग गलत निशाना लगा रहे हैं। केंद्र प्रत्यक्ष कर की दरों को तर्कसंगत बनाने पर कहीं अधिक ध्यान दे सकता है। प्रत्यक्ष कर ढांचे में संशोधन का एजेंडा सिर्फ रियायतों को चरणबद्ध तरीके से हटाना न होकर कर-आधार का दायरा बढ़ाना भी होना चाहिए। अगर भारत का कर-जीडीपी अनुपात बढ़ाना है तो जवाब प्रत्यक्ष कर प्रणाली के पुनर्गठन में निहित है ताकि केंद्र को अधिक राजस्व मिल सके। भारत जैसे देश में जहां प्रति व्यक्ति आय 1.5 लाख रुपये से भी कम है वहां कई रियायतों के जरिये 5 लाख रुपये तक की आय को कर-मुक्त नहीं रखा जा सकता है। ऐसे में क्या फिर से 3.5 लाख रुपये तक की आय को कर-मुक्त करने के बारे में सोचना होगा?

Keyword: अप्रत्यक्ष कर संग्रह, प्रत्यक्ष कर, कर दर, कटौती, जीटीआर, राजस्व,
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