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लोजपा में आंतरिक शक्ति संघर्षऔर बिहार की जातीय राजनीति

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 18, 2021

चिराग पासवान के सिवा हर कोई देख सकता था कि ऐसा होने वाला है। लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के छह में से पांच सांसदों ने 13 जून को चिराग (38 वर्ष) को पार्टी अध्यक्ष के पद से अपदस्थ कर दिया और लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात करके कहा कि चिराग के चाचा और लोजपा के संस्थापक राम विलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस (68 वर्ष) को निम्र सदन में उनका नया नेता घोषित किया जाए। दोपहर तक लोकसभा सचिवालय ने पारस को लोजपा का नया नेता भी घोषित कर दिया। पारस ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की एक बैठक बुलाई और अपने भतीजे को तमाम अधिकारों को जिम्मेदारियों  से मुक्त कर दिया। इनमें वित्तीय दायित्व भी शामिल थे।

पारस ने यह घोषणा भी कर दी कि लोजपा अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में रहते हुए जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व का भी समर्थन करेगी। यह कदम एकदम उलट था क्योंकि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव अभियान में चिराग पासवान ने अपनी पार्टी का रुख जदयू विरोधी रखा था और भले ही उनकी पार्टी 140 सीटों पर लड़कर भी केवल एक सीट जीत सकी थी लेकिन उसने जदयू और भाजपा को कम से कम दो दर्जन विधानसभा क्षेत्रों में नुकसान पहुंचाया था। यह चिराग की निजी रणनीति थी जो बुरी तरह नाकाम रही और अब नीतीश कुमार फायदे में नजर आ रहे हैं।

पारस भले ही अपने भतीजे को बाहर करने में कामयाब रहे हों लेकिन वह इस राजनीतिक विरासत के उचित हकदार नहीं हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के एक प्रोफेसर, जो बिहार की दलित राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं, उनका कहना है, 'पशुपतिजी मोटे तौर पर बस परिवार के सदस्य हैं। उन्हें केवल राम विलासजी की वजह से मान्यता मिली। परंतु बिहार के दलित समाज और राजनीति में पशुपतिजी कुछ खास सक्रिय नहीं हैं।'

पारस सन 1977 में अपने भाई के साथ ही राजनीति में आए। उन्हें अपने भाई के राजनीतिक कदमों से फायदा मिला और वह सन 1996 में लालू प्रसाद की सरकार में मंत्री बने। परंतु जब जनता दल ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद लालू प्रसाद का इस्तीफा मांगना शुरू किया तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। नीतीश कुमार के साथ उनकी मित्रता स्थिर रही है। दोनों नेता अविभाजित समाजवादी परिवार से जो आते हैं।

एक स्थानीय कांग्रेस नेता कहते हैं, 'पशुपतिजी मोटे तौर पर अपने बड़े भाई की छाया में रहे हैं। वह बिहार में पार्टी का प्रबंधन करते रहे हैं लेकिन उन्होंने स्वयं को कभी दलितों के किसी ज्वलंत मुद्दे से नहीं जोड़ा। उन्होंने कभी कोई प्रयास नहीं किया। उन्हें पता था कि जब तक राम विलास हैं उनका राशन-पानी सुरक्षित है।' परंतु चिराग की पदोन्नति और पार्टी में उनका कद बढ़ाए जाने से पशुपति पारस कहीं छिप से गए थे। अपनी पार्टियों पर नियंत्रण गंवाने वाले कई अन्य नेताओं की तरह चिराग ने भी अपने प्रतिद्वंद्वी को कम करके आंका।

अतीत में पारस और नीतीश कुमार के अच्छे रिश्तों की बदौलत नीतीश के प्रबंधकों ने पारस से संपर्क किया। उन्हें मनाना मुश्किल नहीं था। जेएनयू के प्रोफेसर कहते हैं, 'वीणा देवी तथा अन्य सांसद, जो पारस के साथ हैं, उन्हें बिहार में बाहुबली के नाम से जाना जाता है। उनकी दलितों के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है।'

तो क्या यह माना जाए कि एक सामाजिक प्रयोग के रूप में लोजपा का अंत हो गया है? सन 2000 में जब राम विलास पासवान ने पार्टी शुरू की थी तो इसे दलितों और खासकर  दुसाधों की पार्टी माना गया था। बिहार की आबादी में इनकी हिस्सेदारी बमुश्किल दो फीसदी है। सेंटर फॉर डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के एक अध्ययन के अनुसार सन 2005 में जब पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ी थी तब 65 फीसदी दुसाधों ने लोजपा को वोट दिया था। उसके बाद से इस जाति के एक बड़े हिस्से ने उस गठबंधन को वोट दिया जिसमें लोजपा चुनाव के पहले शामिल हुई। सन 2015 के विधानसभा चुनाव में 51 फीसदी दुसाधों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को वोट दिया। ये वोट थे जो अन्यथा इस गठबंधन को नहीं मिलते। यानी लोजपा के पास एक मजबूत जनाधार है। अपनी जाति के प्रतिबद्ध वोटों के साथ पार्टी उच्च जातियों के साथ भी गठबंधन करने की स्थिति में रही। बिहार से भाजपा सांसद राकेश सिन्हा कहते हैं, 'राम विलास ने वंचितों और गरीबों के प्रतिनिधि के रूप में जगह बनाई। हालांकि वह दलित थे लेकिन उन्होंने कभी उच्च जातियों के विरोध की राजनीति नहीं की। यही कारण है कि उनके उच्च जातियों के साथ भी अच्छे रिश्ते रहे।'

राम विलास ऐसा कर सके क्योंकि उनका लोगों, खासकर अपने लोगों के साथ गहरा जुड़ाव था। पशुपति पारस और चिराग दोनों में वह बात नदारद है। एक दलित समाज विज्ञानी कहते हैं, 'चिराग स्मार्ट और खूबसूरत नजर आते हैं। बिहार के एक प्रमुख फिल्म निर्माता ने राम विलास पासवान से कहा था कि वह उनके बेटे को मुंबई में फिल्मों में लॉन्च करेंगे और उनसे राज्य सभा की सीट मांगी थी। चिराग ने कुछ फिल्मों में काम भी किया लेकिन समर्थकों और अपने परिवार के साथ उनका व्यवहार ऐसा है जैसे कि वह कोई बहुत बड़े स्टार हों, मानो उनकी बराबरी का कोई हो ही नहीं। अरे, आप अपने दम पर सांसद नहीं बने हैं, यह सब आपके पिता की बदौलत है। लेकिन चिराग इस बात को स्वीकार नहीं करते।' इसका अर्थ यह है कि अगर चिराग अपना सबकुछ नहीं झोंक देते तो बतौर पार्टी लोजपा कमजोर पड़ेगी। बिहार के दलितों में भाजपा का बहुत कम आधार है। नीतीश कुमार भाजपा से दबाव महसूस कर रहे हैं लेकिन उनके पास उसके साथ रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में वह अपनी अति पिछड़ा अपील का इस्तेमाल पासवानों को लुभाने में करेंगे। इससे वह मजबूत होंगे लेकिन भाजपा कमजोर होगी। बिहार की जाति आधारित राजनीति दिलचस्प मोड़ ले रही है।

Keyword: लोजपा, बिहार, जातीय राजनीति, चिराग पासवान, पशुपति कुमार पारस,
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