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अधोसंरचना क्षेत्र का कैसा होगा भविष्य?

विनायक चटर्जी /  06 15, 2021

देश में अधोसंरचना को लेकर होने वाली ज्यादातर चर्चा इस बात पर केंद्रित रहती है कि केंद्र और राज्य नवीकरणीय ऊर्जा, राजमार्ग निर्माण और बिजली वितरण कंपनियों आदि को लेकर कितना व्यय कर रहे हैं अथवा नहीं कर रहे हैं। समय-समय पर इस स्तंभ के माध्यम से मैंने भी ऐसे कई सुझाव दिए हैं जो बुनियादी विकास के माध्यम से देश को आगे ले जाने में मददगार हो सकते हैं। इनमें से 10 सुझाव ऐसे हैं जिन्हें प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। हम उन्हें नीचे सिलसिलेवार ढंग से पेश कर रहे हैं ताकि उन पर समुचित कदम उठाए जा सकें।

3पी इंडिया और केलकर समिति की रिपोर्ट: बुनियादी विकास के पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) मॉडल की समीक्षा और उसमें नई जान फूंकने के लिए मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने ही विजय केलकर की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट 19 नवंबर, 2015 को तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली को सौंपी थी। रिपोर्ट इस बात का खाका पेश करती है कि कैसे निजी पूंजी को पीपीपी के लिए दोबारा प्रेरित और उत्साहित किया जा सके। समिति ने कुछ हस्तक्षेपों की अनुशंसा की है जिसमें रियायत समझौते, विवाद निस्तारण प्रणाली, पुनर्वार्ता के लिए प्रावधान और अफसरशाहों को सदिच्छा से लिए गए निर्णय के मामलों में प्रताडऩा से बचाना शामिल हैं। समिति ने यह भी दोहराया है कि 3पी इंडिया नामक एक पीपीपी इन्क्यूबेशन कम प्रोपेगेशन इंस्टीट्यूट की स्थापना की जाए। जेटली ने इसके लिए जुलाई 2014 में प्रस्तुत अपने बजट में 500 करोड़ रुपये आवंटित किए।

लंबित भुगतान की पड़ताल के लिए पोर्टल: सरकारी तंत्र को आपूर्ति करने वाले निजी क्षेत्र के आपूर्तिकर्ताओं को समय पर भुगतान न मिलने की समस्या लंबे समय से बरकरार है। एक कारोबारी अखबार ने एक रिपोर्ट में अनुमान जताया कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास ऐसी 5 से 7 लाख करोड़ रुपये की राशि फंसी हुई है। ऐसे में एक पोर्टल की आवश्यकता है जो पारदर्शी तरीके से प्राप्त इनवॉइस, किए गए भुगतान और अनचुकता बिल आदि को टै्रक करे। यह एक साधारण सॉफ्टवेयर और क्रियान्वयन समस्या है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार में हर व्यक्ति इस बात पर सहमत है कि ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है और यह संभव भी है। परंतु इसके क्रियान्वयन को लेकर कोई जोर नहीं दे रहा है।

जल केंद्रित लोक निर्माण कार्यक्रम: अर्थव्यवस्था को एक मजबूत प्रोत्साहन पैकेज की आवश्यकता होगी ताकि उसमें नई जान फूंकी जा सके और देश भर में रोजगार तथा मांग पैदा की जा सके। बड़ी, प्रभावी और पूंजी खपत वाली परियोजनाओं में से पानी क्षेत्र की परियोजनाएं अलग हैं। इन परियोजनाओं में नदी जोड़, बहुउद्देश्यीय सिंचाई-सह-जल विद्युत और शुष्क इलाकों में नहर आदि शामिल हैं। सुझाव यह भी है कि 10 लाख करोड़ रुपये का राष्ट्रीय नवीकरणीय फंड 50 वर्ष के लिए स्थापित किया जाए। इसकी फंडिंग कंसोल्स या परपेचुअल बॉन्ड्स के माध्यम से की जा सकती है जो बीते समय में डच, इंगलैंड के या जापानी लोग करते थे।

एक राष्ट्रीय बिजली वितरण कंपनी (एनपीडीसी): केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली ऐसी संस्था इस्तेमाल से बची हुई क्षमता को चुनकर एक मजबूत वैकल्पिक बाजार बना सकती है जो विश्वसनीय सॉवरिन समर्थित बिजली खरीद समझौतों की मदद से फंसे हुए कर्ज को कम करने में मददगार होगी। इसमें एक पूलिंग वाली मूल्य व्यवस्था की पेशकश की जा सकती है जिसमें ताप बिजली, नवीकरणीय, जल और परमाणु बिजली शामिल हों। इनके लिए एक विश्वसनीय मूल्य ढांचा बनाना होगा और शुल्क दरों को तार्किक बनाना होगा। केंद्रशासित प्रदेशों में वितरण का काम संभालने के लिए यह एक विश्वसनीय संस्थागत विकल्प हो सकता हैै। इसके अलावा राज्य सरकारों और थोक निजी उपयोगकर्ताओं के शहरी और गैर शहरी क्षेत्रों के वितरण क्षेत्र में भी स्वेच्छा से होने वाली पेशकश से ऐसा किया जा सकता है क्योंकि निजीकरण अभी भी मृग मरीचिका बना हुआ है। आखिर में यह 100 फीसदी स्मार्ट मीटरिंग के साथ वितरण को डिजिटल युग में ले जा सकता है।

एक नया राष्ट्रीय राज्यमार्ग सेवा प्राधिकरण: मूल विचार यह है कि एनएचएआई को विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करने की इजाजत दी जाए और इस नए प्राधिकार को तमाम अन्य पहलुओं मसलन सड़क सुरक्षा, वाहन चलाने में आराम, राजमार्गों पर सुविधाओं, टोलिंग तकनीक, आपदा प्रबंधन समेत पीपीपी साझेदारों और पीपीपी फॉर्मेट के विभिन्न पहलुओं का प्रभार सौंप दिया जाए।

तटवर्ती आर्थिक क्षेत्र: तटवर्ती आर्थिक क्षेत्र कुछ शुरुआती विचारों में से एक था और नीति आयोग का प्रभार संभालने के बाद अरविंद पानगडिय़ा ने भी इस विचार को आगे बढ़ाया था। यहां प्रयास यह है कि निर्यातोन्मुखी और श्रम आधारित कारखानों के लिए विश्वस्तरीय समस्यारहित परिक्षेत्र तैयार हो सके। उच्च गुणवत्ता वाला औद्योगिक बुनियादी ढांचा बनाया जाए, नौकरशाही संबंधी बाधाएं दूर की जा सकें और समकालीन उपयोगिताएं उपलब्ध कराई जाएं ताकि विश्वस्तर पर प्रतिस्पर्धा करने लायक देश तैयार हो सके।

डीएफआई का परिचालन शुरू करना: एक डीएफआई निर्मित करने का निर्णय निश्चित रूप से तेज गति से आगे बढ़ा है। वित्त वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही में इसकी व्यवहार्यता की जांच करने के बाद 1 फरवरी को इसके बजट की घोषणा कर दी गई और इसके पश्चात संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की सहमति तक इस दिशा में प्रगति सराहनीय रही है। अब जरूरत यह है कि इसका संचालन तेजी से शुरू किया जाए। इसके लिए बोर्ड और प्रबंधन तथा शुरूआती फंडिंग की आवश्यकता होगी। इसके लिए करीब 20,000 करोड़ रुपये की आधार पूंजी और 5,000 करोड़ रुपये के एकबारगी अनुदान के अलावा अन्य रियायतों की आवश्यकता होगी।

श्योरिटी बॉन्ड: विनिर्माण और अधोसंरचना क्षेत्र के लिए बैंक गारंटी काफी अहम रही है। भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के एक कार्य समूह ने हाल ही में एक कार्य पत्र वितरित किया है जो बीमा कंपनियों द्वारा जारी किए गए श्योरिटी बॉन्ड के विचार के अनुरूप है। ये बैंक गारंटी के स्थानापन्न हो सकते हैं। इससे यह सुनिश्चित होगा कि बीमा कंपनियां बुनियादी फाइनैंसिंग में अहम भूमिका निभाएंगी।

म्युनिसिपल बॉन्ड: दुनिया भर में म्युनिसिपल बॉन्ड शहरी अधोसंरचना की फंडिंग का अहम जरिया हैं। अमेरिका में इसका बाजार 3.8 लाख करोड़ डॉलर का है लेकिन भारत में यह काफी छोटा है। म्युनिसिपल अंकेक्षण, रेटिंग और संस्थानों की स्वायत्तता को गति देने की आवश्यकता है। 74वें संविधान संशोधन में इसके बारे में विचार प्रस्तुत किया गया है। केवल ऐसा करके ही इनसे उचित राशि जुटाई जा सकती है और हमें स्थायित्व भरी स्मार्ट सिटी मिल सकती हैं।

सन 2024 तक बुलेट ट्रेन परियोजना पूरी करना: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला 14 सितंबर, 2017 को रखी थी। यदि इसे समय पर पूरा किया गया तो रेल यात्रा की गति, सेवा, आराम और सुरक्षा सभी को लेकर अवधारणा तेजी से बदलेगी। इससे नई पीढ़ी में रेल यात्रा की मांग नए सिरे से जोर पकड़ेगी।
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेेयरमैन हैं)

Keyword: अधोसंरचना क्षेत्र, म्युनिसिपल बॉन्ड, बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, राजमार्ग,
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