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टीके के मामले में पश्चिमी देशों से सबक लेना बेहतर

प्रसेनजित दत्ता /  June 10, 2021

कोविड-19 महामारी से आए भूचाल के बाद दुनिया के लगभग सभी बड़े देश इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि टीकों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उन्हें वृहद स्तर पर निवेश करना होगा। वे यह भी मान चुके कि अपने देशों में टीकों का उत्पादन बढ़ाने के लिए टीका कंपनियों के साथ उन्हें मिलकर आगे बढऩा होगा। इन बड़े देशों, खासकर यूरोपीय संघ और अमेरिका ने तय किया कि उन्हें टीका आपूर्ति व्यवस्था पर नजर रखनी होगी और स्थिति बिगडऩे की आहट मिलते ही जरूरी हस्तक्षेप के लिए तैयार रहना होगा। ये सभी देश इस बात से सहमत हैं कि टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक चुनौती है, जिसे बाजार के भरोसे तो बिल्कुल नहीं छोड़ा जा सकता। सरकारों को टीका कंपनियों के एक सक्रिय साझेदार की भूमिका निभानी होगी और आवश्यकता महसूस होने पर टीका उत्पादन भी करना होगा।

भारत में कहानी कुछ और ही है। यहां सार्वजनिक उपक्रमों की उपस्थिति का इतिहास बहुत पुराना रहा है, बावजूद इसके केंद्र सरकार अपनी भूमिका केवल ग्राहक तक ही सीमित रखना चाहती है। इससे भी अधिक अफसोस की बात यह है कि एक समझदार ग्राहक की भूमिका भी सरकार ठीक से नहीं निभा पाई और टीकाकरण के लिए जरूरी खुराक की आपूर्ति का ऑर्डर भी नहीं दे पाई। सरकार ने केवल तीन टीका आपूर्तिकर्ताओं को अनुमति दी और उन्हें अलग-अलग कीमत तय करने की छूट दी। राज्यों और निजी अस्पतालों को स्वयं टीकों का बंदोबस्त करने के लिए कहा गया। हालात इससे और बिगड़ गए और चारों तरफ अफरातफरी फैल गई।

सरकार ने एक सुनियोजित पहल के तहत या संयोग से एक ऐसा बाजार तैयार किया जहां खरीदारों की तो भरमार है लेकिन आपूर्तिकर्ताओं की संख्या गिनती भर है। यह निजी क्षेत्र के अस्पतालों के हक में गया। उनके पास अधिक खुराक उपलब्ध हो गई और वे इन्हे ऊंची कीमतों पर बेचने लगे। दूसरी तरफ राज्य सरकारें टीका विनिर्माताओं से टीकों की आपूर्ति सुनिश्चित करने में संघर्ष करती रहीं। टीके बनाने वाली कंपनियां राज्य सरकारों को टीके बेचने में आनाकानी करती रहीं।  

स्थिति की गंभीरता से बेखबर सरकार के एक के बाद एक मंत्री इस वर्ष के अंत तक सभी लोगों के टीकाकरण का दावा कर रहे हैं लेकिन टीका खरीद को लेकर जो आधे-अधूरे आंकड़े उपलब्ध हैं, वे बहुत उत्साह जगाने वाले नहीं हैं। सरकार टीके उपलब्ध कराने के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक पर कुछ ज्यादा ही निर्भर है। करीब आधा दर्जन कंपनियों के टीकों का परीक्षण अभी चल ही रहा है। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को टीके तैयार करने के लिए कुछ अनुदान भी दिए हैं लेकिन यह आवश्यकता से कम हैं।

सरकार को एमआरएनए टीके बनाने वाली कंपनियों जैसे फाइजर और मॉडर्ना के साथ अधिक सक्रियता से संवाद करना होगा। इन कंपनियों के टीके कोविड-19 संक्रमण से बचाव में अधिक असरदार रहे हैं। वैश्विक स्तर पर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने पिछले वर्ष जून-जुलाई 2020 में ही इन टीकों के लिए अग्रिम ऑर्डर दे दिए थे। तब तक तो इन टीकों को नियामकीय मंजूरी तक नहीं मिली थी। दरअसल इन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का तर्क था कि अगर एक या दो टीकों को मंजूरी नहीं मिलती है तो भी दूसरे टीकों को मंजूरी मिल ही जाएगी और इससे टीकाकरण कार्यक्रम पर कोई असर नहीं होगा।

ज्यादातर पश्चिमी देश 2020 में ही कोविड-19 की भीषण चपेट में आ गए थे। वे समझ चुके थे कि कारोबार सामान्य बनाने के लिए अपने नागरिकों के टीकाकरण पर खर्च करना ही बेहतर विकल्प होगा। उन्होंने धीरे-धीरे और अल्प मात्रा में टीके खरीदने की नीति पर विश्वास नहीं किया। इन देशों को लगा कि अगर वे अपने नागरिकों को टीके लगाने की दिशा में गंभीरता से प्रयास नहीं करेंगे तो टीके लगवाने पर जितना खर्च नहीं आएगा उससे कहीं अधिक नुकसान अर्थव्यवस्था को हो जाएगा।

टीकों की खरीदारी और इनकी आपूर्ति के अग्रिम ऑर्डर देने के पीछे दो बातें खास रही थीं। कनाडा, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य देशों ने अधिक से अधिक टीकों की आपूर्ति के ऑर्डर दे दिए और इनके लिए अग्रिम भुगतान भी कर दिए। वे उत्पादन योजना या उत्पादन बढ़ाने के झमेलों से दूर रहे। उन्हें दुनिया के निजी क्षेत्र की वैश्विक कंपनियों पर पूरा भरोसा था। अमेरिका ने न केवल अग्रिम ऑर्डर दे दिए बल्कि परिचालन में साझेदार भी बन गया। अमेरिका समय रहते टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहता था ताकि इनकी किल्लत न पैदा हो पाए। उसने टीकों में इस्तेमाल होने वाले तत्त्वों से लेकर अनुबंध आधारित विनिर्माण क्षमताओं पर भी पैनी नजर रखी।

भारत सरकार ने इन उपायों पर ध्यान नहीं दिया। सामान्य परिस्थितियों में विश्व का सबसे बड़ा टीका उत्पादक देश होने के बावजूद भारत सरकार ने यह गणना करने की जरूरत भी नहीं समझी कि जितने लोगों को टीके लगाए जाएंगे उसके लिए पर्याप्त उत्पादन क्षमता भी है या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि देश में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों के पास टीके बनाने की पर्याप्त विशेषज्ञता हासिल है।

कनाडा, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया आदि देशों ने जब महसूस किया कि उन्होंने जितने टीकों की आपूर्ति के ऑर्डर दिए थे उससे कम उपलब्ध हो पाएंगे तो उन्होंने त्वरित कदम उठाए। ये देश टीका विनिर्माताओं के साथ मिलकर अपने यहां पर्याप्त उत्पादन क्षमताएं विकसित करने में जुट गए। ऑस्ट्रेलिया अपना एमआरएनए संयंत्र तैयार करने में भारी निवेश कर रहा है। उसने फाइजर और अन्य कंपनियों को भी उत्पादन संयंत्र संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन देने की बात कही है। कनाडा रेजिलिअंस बायोटेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर एमआरएनए उत्पादन संयंत्र तैयार करने के लिए 209 करोड़ डॉलर निवेश कर रहा है। वह सनोफी को भी 41.5 करोड़ डॉलर की मदद दे रहा है। यूरोपीय संघ भी अपने सदस्य देशों में क्षमताएं बढ़ा रहा है और अफ्रीका में टीका संयंत्र तैयार करने पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।

भारत टीकों की समय रहते आपूर्ति सुनिश्चित करने के बदले निजी कंपनियों को अनुदान देने में सुस्त रहा है और सार्वजनिक क्षेत्र में टीका विनिर्माण संयंत्र भी पीछे रहा है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को कुछ अनुदान जरूर दिया गया लेकिन यह रकम छोटी है। भारत सरकार का व्यवहार अब भी ऐसा है मानो वह बाजार में केवल व्यावसायिक खरीदार है। जब टीके की खरीद का पहला दौर चल रहा था भारत पश्चिमी देशों से सबक नहीं ले पाया।

(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेस वल्र्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय सलाहकार इकाई प्रोजेकव्यू के संस्थापक हैं)

Keyword: पश्चिमी देश, टीकाकरण, यूरोपीय संघ, टीका आपूर्ति, ऑर्डर,
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