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कोविड को देखते हुए कैसे आए खुलापन?

नीलकंठ मिश्रा /  June 09, 2021

देश में कोरोना के सक्रिय मामले कुछ सप्ताह पहले के उच्चतम स्तर से लगभग आधे रह गए हैं और रोज सामने आने वाले नए मामले एक तिहाई रह गए हैं। ऐसे में अब बहस प्रतिबंधों को शिथिल करने की ओर मुड़ गई है। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी चर्चा अपरिपक्व हो सकती है क्योंकि हालिया उच्चतम स्तर से गिरावट के बावजूद रोज के नए मामले और सक्रिय मामले दोनों पहली लहर से अधिक हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में रुझान भी अलग हैं। दिल्ली, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में सक्रिय मामले पहली लहर के उच्चतम स्तर से नीचे आ चुके हैं। कई अन्य राज्यों में सक्रिय मामले उसी तेजी से घट रहे हैं जिस तेजी से उनमें इजाफा हुआ था। इन राज्यों में जल्दी खुलापन आ सकता है।

यह बात स्पष्ट है कि वायरस को संक्रमणरोधी क्षेत्र बनाकर नहीं समाप्त किया जा सकता है। केवल यही आशा की जा सकती है कि संक्रमितों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा देकर ही जान का नुकसान कम किया जा सकता है और महामारी का व्यापक प्रसार रोका जा सकता है।

जब तक आबादी के कम से कम तीन चौथाई हिस्से को टीका नहीं लग जाता है तब तक गतिविधियों पर मौजूदा स्तर के प्रतिबंध लागू रखना भी अतार्किक होगा। मौजूदा स्तर के प्रतिबंध एक महीने में पूरे वर्ष की जीडीपी के एक प्रतिशत के बराबर क्षति पहुंचाते हैं। दुनिया के अन्य हिस्सों की तरह और देश में पहली लहर की तरह इस नुकसान का बोझ कम आय वाले परिवारों को ज्यादा उठाना पड़ रहा है। देश के पास नि:शुल्क अनाज या मनरेगा के रोजगार के अलावा ऐसे परिवारों की सहायता के लिए कोई उपाय नहीं हैं।

देश के पास लंबे समय तक लॉकडाउन लागू रखने की भी सीमित क्षमता है। एक बार महामारी से जुड़ी अफरातफरी समाप्त होने के बाद लोगों को घर पर रोके रखना मुश्किल होगा। बल्कि जिन जिलों में सक्रिय मामलों में कमी आई है वहां पहले ही गतिविधियों में 10 से 20 फीसदी सुधार हो चुका है। दिक्कत तब होगी जब आर्थिक रूप से उत्पादक लेकिन कम जोखिम वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाए जबकि ज्यादा जोखिम वाले सामान्य व्यवहार को जारी रहने दिया जाए।

इसके साथ ही बहुत जल्दी पूरा खुलापन लाने का मतलब होगा कि हम अपने आप को तीसरी लहर के जोखिम में डाल दें। ब्रिटेन जैसे देशों में जो आबादी टीकाकरण से बची हुई है उसमें इसका खतरा है। ताइवान और वियतनाम जैसे देश जो पहली लहर को थामने में कामयाब रहे थे, वे भी इस नए स्वरूप से जूझ रहे हैं। ऐसे में आंकड़ों को ध्यान में रखकर कदम उठाना उचित होगा ताकि लोगों की जान और उनकी आजीविका का बचाव किया जा सके।

कोई जिला या ब्लॉक गतिविधियों के लिए खोलने के लिए तैयार है अथवा नहीं यह पता लगाने में सीरो अध्ययन काम आ सकता है। कोविड-19 वायरस और उसके नए स्वरूपों से लक्षणविहीन संक्रमण भी हो रहा है। टीकाकार मानते हैं कि प्रत्येक संक्रमित के बरअक्स 10 से 20 संक्रमित सामने नहीं आते होंगे लेकिन यह तादाद अधिक भी हो सकती है। आईसीएमआर के राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार गत वर्ष दिसंबर तक पहली लहर में अनुपात 28 था: 21 फीसदी आबादी में एंटीबॉडी थीं। पहली लहर की तुलना में इस बार संक्रमण की दर काफी अधिक रही। ग्रामीण इलाकों में आमतौर पर यह सुनने को मिलता रहा कि 'बुखार आया, खांसी हुई लेकिन अब मैं ठीक हूं।' परंतु सच इतना ही नहीं था। गांवों से बड़े पैमाने पर बुखार और खांसी के बाद लोगों की मृत्यु होने की खबर भी आई। यदि इस वर्ष संक्रमण और संबद्ध मामलों का अनुपात 20 था तो करीब आधा भारत पहले ही संक्रमण के कारण एंटीबॉडी विकसित कर चुका है। इसके अलावा करीब 12 फीसदी आबादी ऐसी है जिसे कम से कम टीके की एक खुराक लग चुकी है। कह सकते हैं कि टीके से ज्यादा तो वायरस ने ही लोगों में प्रतिरोधी क्षमता विकसित की है। यदि संक्रमण और संबद्ध मामलों का अनुपात 30 मान लिया जाए तो देश की बड़ी आबादी सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर चुकी है।

ऐसे में सूक्ष्म स्तर पर प्रतिरोधक क्षमता का पता लगाकर ही खुलेपन की गति तय की जा सकती है। इसके साथ ही टीकों के इस्तेमाल की प्राथमिकता भी तय की जानी चाहिए क्योंकि उनकी कमी है। हाल में किए गए कुछ अध्ययनों ने दिखाया है कि पिछले वर्ष के संक्रमण से मिली प्रतिरोधक क्षमता अधिकांश लोगों में काफी समय तक बनी रही। केवल उन्हीं मामलों का अध्ययन किया गया जिनमें लक्षण थे। ऐसे में यह पता नहीं है कि लक्षणरहित संक्रमितों में प्रतिरोधक क्षमता कितने समय बरकरार रहेगी।

वायरस के बारे में पता चला है कि वह हवा में फैलता है। ऐसे में व्यवहार के नए मानक तैयार करने होंगे। शायद खुले माहौल में होने वाली गतिविधियों को खोला जा सकता है और जगहों को हवादार बनाया जाए, शादियों, त्योहारों और सामाजिक/राजनीतिक और खेल आयोजनों में भीड़ सीमित रखी जाए।

टीकों की आपूर्ति बढऩे पर हमें टीकों को लेकर हिचक दूर करने पर काम करना होगा। अगले दो महीनों में मांग में कमी के कारण टीकाकरण धीमा होने की आशंका है और ऐसे में प्रभावी हस्तक्षेप उचित होगा।

आने वाले महीनों में आर्थिक नीति संबंधी उपाय करना चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि प्रतिबंधों के बीच भी आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना होगा। लॉकडाउन के दौरान मांग में कमी ज्यादातर इसलिए थी क्योंकि एक बड़े तबके की आय बंद थी। ऐसे में नियमित आय वाले कुछ परिवारों के पास अतिरिक्त बचत रह गई जबकि अन्य को ऋण लेना पड़ा। संपत्ति और आय की यह असमानता आर्थिक और सामाजिक विसंगति पैदा करती है। जीडीपी की तुलना में सॉवरिन ऋण बढऩे के बावजूद सरकार को व्यय नहीं रोकना चाहिए बल्कि उसे कर लगाने के मोह पर नियंत्रण रखना चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि उच्च सॉवरिन ऋण भी करदाताओं के लिए एक देनदारी के समान है। ऐसे में अस्थायी अप्रत्यक्ष कर कटौती की सहायता से अधिशेष बचत के खर्च को प्रोत्साहित करना अधिक बेहतर कदम होगा। आने वाले महीनों में केंद्र और राज्य सरकारों को काफी चतुराई का प्रदर्शन करना होगा। प्रशासनिक दृष्टि से यह अहम है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों का प्रबंधन किया जाए।

Keyword: कोविड, खुलापन, प्रतिरोधक क्षमता, संक्रमणरोधी क्षेत्र, चिकित्सा सुविधा,
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