बिजनेस स्टैंडर्ड - विद्युत उत्पादकों के बकाये में कमी की हकीकत
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विद्युत उत्पादकों के बकाये में कमी की हकीकत

ए के भट्टाचार्य /  June 07, 2021

भारत में बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों के लंबित बकाये में मार्च 2021 के अंत में गिरावट देखी गई जो पुराने ढर्रे में एक बड़े बदलाव को दर्शाती है। उत्पादक कंपनियों द्वारा बिजली वितरण कंपनियों को बिजली दिए जाने के 45-60 दिनों की मोहलत के बाद बकाया राशि करीब 67,300 करोड़ रुपये थी जो एक महीना पहले की तुलना में करीब 20 फीसदी कम है। यह आंकड़ा केंद्र के स्वामित्व या नियंत्रण वाली और निजी स्वामित्व वाली स्वतंत्र बिजली उत्पादक कंपनियों के परिचालन से ही संबंधित है जो देश की तीन-चौथाई बिजली पैदा करती हैं।

मार्च 2020 में इन कंपनियों का बकाया 68,525 करोड़ रुपये था जो फरवरी 2020 की तुलना में सिर्फ चार फीसदी ही कम था। मार्च 2019 में भी बिजली उत्पादक कंपनियों का बकाया एक महीने पहले की तुलना में महज 10 फीसदी ही कम था। साफ है कि यह वित्त वर्ष के आखिर में निपटाया जाने वाला बकाया नहीं था और वित्त वर्ष 2020-21 के आखिरी दो महीनों में कुछ और ही हुआ था जिसकी वजह से मार्च 2021 में बिजली कंपनियों के लंबित बकाये में बड़ी गिरावट देखी गई।

बकाया स्थिति में तीव्र सुधार की एक व्याख्या यह हो सकती है कि सरकार ने तनावग्रस्त बिजली वितरण कंपनियों (डिसकॉम) को तरलता देने के लिए एक विशेष पैकेज घोषित किया था। मई 2020 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नकदी की कमी से जूझ रहीं डिसकॉम कंपनियों में 90,000 करोड़ रुपये डालने की घोषणा की थी। बाद में इस योजना राशि को बढ़ाकर 1.2 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था।

नवंबर 2020 तक इस योजना के तहत 1.18 लाख करोड़ रुपये मूल्य के कर्ज स्वीकृत किए गए। सरकारी नियंत्रण वाली कंपनी पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन (पीएफसी) और आरईसी लिमिटेड ने इन कंपनियों के लिए ये कर्ज अनुमोदित किए थे। लेकिन वास्तव में कर्ज के तौर पर 31,100 करोड़ रुपये ही जारी किए गए। मार्च 2021 तक बांटे गए कर्ज के बारे में कोई भी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। बहरहाल, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऐसे फंडों ने वितरण कंपनियों को अपना बकाया कम करने में मदद की होगी।

इस तरह तार्किक रूप से वर्ष 2021-22 के महीनों में भी बिजली कंपनियों के बकाये में और कटौती की उम्मीद की जा सकती है। इसका कारण यह है कि कर्ज के समूचे पैकेज का पूर्ण प्रभाव लंबित बकाया स्थिति में झलकना अभी बाकी है। इसके पीछे संकल्पना यह है कि तनावग्रस्त वितरण कंपनियां कोविड महामारी की दूसरी लहर के बाद अतिरिक्त बकाया नहीं दे पाएंगी।

हालांकि जिस ढंग से बकाया राशि कम हुई है, उससे भारत के बिजली क्षेत्र में मौजूद कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियां पता चलती हैं। पहला, लंबित बकाया कम होने पर भी वितरण कंपनियों द्वारा विवाद खड़ा किए गए बकाये में खासी तेजी देखी गई है। मार्च 2020 में विवादित बकाया राशि 10,194 करोड़ रुपये थी जो कुल लंबित बकाये (विवादित राशि को छोड़कर) का करीब 15 फीसदी थी। एक साल बाद मार्च 2021 में कुल लंबित बकाये में विवादित बकाये (22,565 करोड़ रुपये) का हिस्सा बढ़कर 33 फीसदी हो गया। यानी लंबित बकाया कम होने पर भी विवादित बकाये की राशि दोगुने से भी अधिक हो गई। इसका यह भी मतलब है कि बिजली उत्पादक कंपनियों का कुल लंबित बकाया (विवादित बकाया समेत) मार्च 2021 के अंत में असलियत में मार्च 2020 की तुलना में घटा नहीं, बढ़ा ही है। लिहाजा लंबित बकाये में कमी को लेकर खुशियां मनाना क्या थोड़ा अपरिपक्व नहीं है?

थोड़ा अधिक गंभीर सवाल यह है कि ये विवाद बढ़े ही क्यों? क्या कोविड-19 महामारी से पैदा हुए हालात इन विवादों के लिए जिम्मेदार हैं? या क्या किसी अधिक गंभीर चीज ने वितरण कंपनियों को अपनी चपेट में ले लिया है जिससे मजबूर होकर उन्हें उत्पादक कंपनियों के साथ अधिक विवाद खड़े करने पड़ रहे हैं? या फिर बिजली नियामकों के स्तर पर इन विवादों के निपटारे में देरी हो रही है? कारण जो भी हो, विवाद बढऩे की दर खतरनाक है और यह लंबित बकाये में गिरावट से बिजली क्षेत्र को हासिल लाभ गंवा सकता है।

दूसरा चिंताजनक रुख बिजली उत्पादक कंपनियों की असाधारण स्थिति में देखा गया सुधार पूरे ऊर्जा क्षेत्र में एकसमान नहीं रहा है। देश में करीब 47 फीसदी बिजली उत्पादन अब स्वतंत्र बिजली उत्पादक (आईपीपी) करते हैं जो कि निजी क्षेत्र में हैं। केंद्रीय सार्वजनिक बिजली उपक्रमों की हिस्सेदारी 25 फीसदी है और बाकी बिजली राज्य सरकारों की बिजली इकाइयां पैदा करती हैं।

लेकिन केंद्रीय उपक्रमों एवं स्वतंत्र उत्पादकों के लंबित बकाये के निपटारे की दर में बड़ा फासला है। केंद्रीय उपक्रमों का लंबित बकाया मार्च 2020 में 30,000 करोड़ रुपये था जो मार्च 2021 में घटकर 20,800 करोड़ रुपये रह गया जो कि 30 फीसदी की गिरावट दर्शाता है। दिलचस्प बात यह है कि उनका बकाया मार्च 2020 के बाद से लगातार बढ़ता रहा और सितंबर 2020 के अंत तक यह 44,200 करोड़ रुपये हो चुका था। लेकिन उसके बाद के महीनों में यह बहुत तेजी से कम हुआ जिसका श्रेय काफी हद तक वितरण कंपनियों को दिए गए पैकेज को जाता है।

इसके उलट स्वतंत्र बिजली उत्पादकों का लंबित बकाया इस दौरान लगातार बढ़ता गया। लगता है कि केंद्रीय बिजली उपक्रमों के लिए बेहतरीन साबित हुआ कदम निजी बिजली उत्पादकों पर कोई असर नहीं डाल पाया। निजी उत्पादकों का बकाया मार्च 2020 के 30,960 करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर 2020 में 33,980 करोड़ रुपये और दिसंबर 2020 में 34,830 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। मार्च 2021 के अंत में उनका बकाया 35,250 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा।

विवाद निपटान के मामले में भी निजी बिजली उत्पादक पीछे छूटते नजर आए। मार्च 2020 में उनका विवादित बकाया 9,000 करोड़ रुपये था जो कि मार्च 2021 में बढ़कर 21,100 करोड़ रुपये हो गया। लेकिन केंद्रीय उपक्रमों के विवादित बकाये में उतनी तेजी नहीं देखी गई। यह राशि 1,300 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,500 करोड़ रुपये ही पहुंची। मसलन, सबसे बड़े केंद्रीय बिजली उपक्रम एनटीपीसी का मार्च 2021 में लंबित बकाया 5,000 करोड़ रुपये का ही था और किसी भी लेनदेन को लेकर कोई विवाद नहीं था। वहीं निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बिजली उत्पादक अदाणी पावर का लंबित बकाया 18,400 करोड़ रुपये था और 20,500 करोड़ रुपये के बकाये पर विवाद भी थे। वहीं दूसरे निजी उत्पादकों के विवादित बकाये की रकम कुछ खास नहीं है।

ऐसे परिदृश्य का भारत के बिजली क्षेत्र की हालत पर गंभीर असर पड़ा है। ऐसा लगेगा कि निजी स्वामित्व वाली बिजली उत्पादक कंपनियों को वितरण कंपनियों के लिए घोषित राहत पैकेज से उतना फायदा नहीं हुआ है। विवादित बकाये के मामले में भी निजी उत्पादकों की वृद्धि दर केंद्रीय उपक्रमों से कहीं अधिक है। और ऐसा तब हुआ है जब कुल बिजली उत्पादन में निजी क्षेत्र का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है।

बिजली नियामकों और सरकार को फौरन इस प्रवृत्ति पर गौर करना चाहिए। तरलता प्रोत्साहन योजना में कोई खामी पाए जाने या लंबित बकाये के निपटान के तरीके में निजी कंपनियों के साथ कोई भेदभाव पाए जाने पर तत्काल सुधार के कदम उठाए जाने चाहिए। या निजी उत्पादकों का ज्यादा बकाया उनकी विरासत से जुड़ा मसला है? ज्यादातर निजी उत्पादकों ने पुरानी कंपनियों के अधिग्रहण से खुद को मजबूत बनाया है लेकिन उन पर पुराने बकाये का बोझ भी आ गया है। अगर स्थिति को और बिगडऩे दिया जाता है तो निजी क्षेत्र बिजली उत्पादन में नए निवेश को लेकर ज्यादा आशंकित हो सकता है। बुरी बात यह है कि इससे निवेश खाई की भरपाई के लिए सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ेगा।
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