बिजनेस स्टैंडर्ड - 'तकनीकी कंपनियों का नियमन जरूरी लेकिन अधिकारों की हो रक्षा'
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'तकनीकी कंपनियों का नियमन जरूरी लेकिन अधिकारों की हो रक्षा'

नेहा अलावधी /  06 06, 2021

बीएस बातचीत

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 25 फरवरी को सूचना-प्रौद्योगिकी कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों के नियमन से संबंधित अधिसूचना जारी की थी। उसमें जिन नियमों का उल्लेख है उनके कुछ प्रावधान विवादास्पद हैं। उदाहरण के लिए अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए तीन भारतीयों की नियुक्ति और एक शिकायत निवारण अधिकारी का प्रावधान सोशल मीडिया कंपनियों को रास नहीं आ रहा है। इन नियमों का अनुपालन शुरू करने की अंतिम समय सीमा 25 मई थी लेकिन कंपनियों का कहना है कि इतने कम समय में उनके लिए ऐसा करना संभव नहीं है। स्थिति स्पष्टï नहीं होने और समय सीमा नहीं बढ़ाई जाने से सोशल मीडिया कंपनियों और सरकार में ठन गई है। न्यूयॉर्क और नर्ई दिल्ली में वकालत करने वाली तकनीकी मामलों की विधि विशेषज्ञ मिशी चौधरी का कहना है कि सरकार एवं कंपनियों को इस मामले में अधिक पारदर्शी रवैया रखना चाहिए। नेहा अलावधी ने इन तमाम विषयों पर उनसे बात की। प्रस्तुत हैं संपादित अंश:


नियमों का अनुपालन शुरू करने की समयसीमा खत्म होने के बाद क्या कंपनियों के पास न्यायालय जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं रह गया है?

ये प्रावधान सरकार ने जोड़े हैं और इनके अधिसूचित होने के बाद से संसद का सत्र शुरू नहीं हुआ है। ज्यादातर मामलों में संसद सामान्य सिद्धांतों एवं नीतियों के साथ कानून पारित कर देती है और वृहद स्तर पर कानून तैयार करने का उत्तदायित्व सरकार पर छोड़ दिया जाता है। सरकार को संसद द्वारा तय नीति के तहत नियम तैयार करने होते हैं। ऐसे नियम अधीनस्थ विधान (सब-ऑर्डिनेट लेजिस्लेशन) कहे जाते हैं और बोलचाल में ये नियमन, उप-कानून, आदेश या अधिसूचना के नाम से भी जाने जाते हैं। मूल अधिनियम में प्रावधान है कि ऐसे नियम संसद में 30 कार्य दिवसों के लिए रखे जाएंगे और सांसद आने वाले सत्र के अंतिम दिन तक नियमों में संशोधन कर सकते हैं या इन्हें खारिज कर सकते हैं। इस मामले में ऐसा नहीं हुआ है। जब तक नियम खारिज करने या संशोधन प्रस्ताव नहीं आते हैं तब तक न्यायालय जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है।


नए नियमों में संदेश के मूल स्रोत का पता लगाए जाने के प्रावधान से क्या उपयोगकर्ताओं की निजता से जुड़ी चिंताएं जायज हैं?

बिल्कुल। ऑनलाइन माध्यम में आपत्तिजनक सामग्री पर अंकुश लगाने के लिए संदेश के मूल स्रोत का पता लगाना उसी तरह होगा जैसे अनगिनत समस्याएं खड़ी एक समाधान खोजना होगा। वास्तव में असुरक्षित संवाद से उपयोगकर्ताओं के लिए जाने अनजाने कई जोखिम पैदा हो जाते हैं। व्हाट्सऐप/फेसबुक का कहना है कि संदेश का स्रोत पता करना और उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता दोनों एक साथ बनाए रखना असंभव है और उन्होंने उच्चतम न्यायालय में याचिका भी दायर की थी। न्यायालय फिलहाल इस पर सुनवाई कर रहा है। अब शीर्ष न्यायालय को इस प्रश्न पर विचार करना है कि क्या व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में क्या ऐसा कोई प्रावधान जोड़ा जा सकता है कि  जिससे संदेश भेजने वाले मूल स्रोत का पता चल सके। सरकार ने कहा था कि 'मध्यस्थ नियम' जनवरी 2020 में अधिसूचित किए जाएंगे। इस मामले पर आखिरी सुनवाई जनवरी 2020 में हई थी और तब अधिसूचना जारी भी नहीं हुई थी।


क्या उपयोगकर्ताओं के लिए सिग्नल या टेलीग्राम बेहतर विकल्प हो सकता हैं?

अगर उपयोगकर्ता गोपनीयता नीतियों में अक्सर होने वाले बदलाव के झमेले में नहीं पडऩा चाहते हैं तो उनके लिए सिग्नल जैसे विकल्पों की तरफ जाना बेहतर होगा क्योंकि वे सूचनाएं (डेटा) संग्रह नहीं करते हैं। इस तरह, सरकार के साथ साझा करने के लिए उनके पास कुछ नहीं होगा।


मौजूदा हालात में सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच सुलह का सबसे आसान उपाय क्या होगा?

सरकार और सोशल मीडिया कंपनियां दोनों ही उपयोगकर्ताओं के अधिकारों की परवाह किए बिना अपनी-अपनी दलील दे रही हैं। मौजूदा दौर में हमें राष्टï्रीय सुरक्षा बनाम निजता को लेकर बिना सोचे-समझे भ्रामक बातें नहीं करनी चाहिए। निजता के अधिकार की रक्षा जरूर की जानी चाहिए। ऑनलाइन माध्यम से होने वाले अपराध पर अंकुश लगाने या अपराधी तक पहुंचने के लिए दूसरी सूचनाओं या स्रोतों की मदद भी ली जा सकती है। सरकार जिस आक्रामकता के साथ ऑनलाइन माध्यम में आपत्तिजनक सामग्री पर अंकुश लगाना चाहती है इससे उसके नेक प्रयास पर भी लोग संदेह करने लगे हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया कंपनियां भारतीय लोगों की सूचनाएं बेचकर राजस्व कमाने को उचित ठहराती हैं लेकिन जब कानूनी स्तर पर सलाह-मशविरा की बात आती है तो इसमें समन्वय करने के बजाय वे इससे बचने के लिए सभी बहाने बनाती हैं।


सरकार को एक अच्छी सोशल मीडिया नीति तैयार करने में किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए?  

सरकार को यह याद रखना चाहिए कि बड़ी तकनीकी कंपनियों का नियमन महत्त्वपूर्ण है लेकिन इसके लिए उपयोगकर्ताओं के हितों को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए। सरकार के कदमों और कंपनियों की निष्क्रियता से सभी संबंधित पक्षों के बीच आपसी विश्वास का सख्त अभाव हो गया है। नागरिक समाज के सभी सक्रिय भागीदारों के साथ हमें इस पर काम करना चाहिए। सरकार को भी सामग्री नियंत्रण, भ्रामक सूचनाएं, निजता आदि बातों का एक साथ घालमेल करने से बचना चाहिए। मीडिया और पत्रों के माध्यम से अपनी आक्रामकता दिखाने के बजाय सरकार को एक सक्षम नीति तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। इंजीनियरों, नीति विशेषज्ञों और नागरिक समाज के साथ मिलकर ऐसा किया जा सकता है।

Keyword: सोशल मीडिया, वकालत, विधि विशेषज्ञ, मिशी चौधरी, सूचना-प्रौद्योगिकी,
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