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अहम मानकों पर हम अफ्रीकी देशों से पीछे

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 06, 2021

नाम में क्या रखा है? कोविड-19 को किसी भी नाम से पुकारें, हम बीमार पड़ेंगे, अस्पताल जाएंगे और हमारी जान भी जा सकती है। ऐसे में अगर दुनिया उसके सबसे नए और घातक स्वरूप बी.1.617 को 'भारतीय' स्वरूप कह रही है तो हमारी त्योरियां क्यों चढ़ रही हैं?

हालांकि यह ऐसा समय है जब चीन ने वायरस को चीन या वुहान से जोडऩे की कोशिश करने वालों पर हमला करके नए मानक तय किए हैं। व्यापक तौर पर पूरा विश्व और खासतौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वही किया जो चीन ने आदेश दिया। हम भारतीय तो केवल अपने तुनकमिजाज पड़ोसी के अनुकरण में अपने संवेदनशील राष्ट्रवाद से प्रेरित हो रहे हैं।

इस बीच डब्ल्यूएचओ विवाद निस्तारण का प्रयास कर रहा है। अब वह वायरस के स्वरूपों के लिए ग्रीक वर्णमाला का प्रयोग कर रहा है। यह कहना मुश्किल है कि इससे भारत या अन्य देशों की भावनाएं शांत होंगी या नहीं। डब्ल्यूएचओ की अपनी दिक्कतेंं भी हैं। लूइजियाना के डेमोक्रेट से रिपब्लिकन सीनेटर बने जॉन नीली केनेडी अपने हास्यबोध और शानदार अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने सीनेट की सुनवाई के दौरान डॉ. एंटनी फॉउची से जो सवाल किया वह डब्ल्यूएचओ के मौजूदा कद और प्रतिष्ठा को परिभाषित करता है। उन्होंने पूछा, 'अगर आप शी चिनफिंग को उठाकर उलट दें और जोर से हिलाएं तो आपको नहीं लगता कि उनकी जेब से डब्ल्यूएचओ निकल कर गिरेगा।' आने वाले सप्ताहों में डब्ल्यूएचओ को भारत जैसे शोर मचाने वाले राष्ट्रवादियों को संतुष्ट करने के बजाय कहीं अधिक गंभीर चिंताओं को हल करना पड़ सकता है।

हमारे सामने भी कई कठिन प्रश्न हैं। मैं केवल हम सबको आईना दिखाने का प्रयास कर रहा हूं। यह गाड़ी के पीछे देखने वाले आईने की तरह है जिस पर चेतावनी लिखी होती है: 'आईने में नजर आ रही चीजें जितनी दूर नजर आ रही हैं उतनी दूर नहीं हैं।' अमेरिका के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ और सामरिक विद्वान स्टीफन कोहेन के साथ बातचीत कर चुके लोगों को एक बात याद होगी जो वह बार-बार कहते हैं: कभी भी तीसरी दुनिया या महाशक्ति जैसे जुमलों का इस्तेमाल न करें। उनका तर्क है कि ये कुछ ज्यादा ही बढ़ाचढ़ाकर कही जाने वाली व्यापक बातें हैं। ये हमारे दिमाग की विश्लेषण क्षमता, बारीकियों और जटिलताओं को समझने की क्षमता को सीमित कर देते हैं। परंतु ये जुमले चलते रहे। हम देखते रहे कि कैसे दुनिया के देश तीसरी दुनिया से बाहर निकलने का जश्न मनाते हैं और महाशक्ति बनने की आकांक्षा पालते हैं। हम भी ऐसे देशों में शामिल हैं। सन 1990 से 2020 के बीच तीन दशक में 30 करोड़ से अधिक लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकले। हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेज विकसित होती बड़ी अर्थव्यवस्था बनी।  अनेक देशों का काम भारत से होने लगा, भारी भरकम विदेशी मुद्रा भंडार बने। इसकी कीमत तब समझ में आएगी जब हम यह देखेंगे कि किस घटना ने आर्थिक सुधारों को जन्म दिया: सन 1991 में भुगतान संतुलन का संकट इतना गंभीर हो गया था कि हमें अपना स्वर्ण भंडार बाहर भेजना पड़ा ताकि हम देनदारी न चूकें।

भारतीय मूल के लोग शानदार वैश्विक संस्थान चला रहे हैं और अहम पदों पर हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति से लेकर ब्रिटेन के वित्त और गृह मंत्री तथा पुर्तगाल के प्रधानमंत्री तक सभी भारतीय मूल के हैं। दुनिया में भारत का कद बढ़ा है। सामरिक दृष्टि से देखें तो क्वाड की सदस्यता, जी-7 में हमारा विशेष आमंत्रित होना आदि बढ़ते कद के उदाहरण हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी विश्व स्तर पर समकालीन नेताओं में काफी महत्त्व दिया जाता है। महाशक्तियों और तीसरे विश्व के अलावा एक अन्य भौगोलिक क्षेत्र है जिसका राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक महत्त्व है और वह है उप सहारा अफ्रीका। इसका इस्तेमाल दुनिया की हर बुरी चीज का उदाहरण देने के लिए किया जाता है। मसलन किसी देश के बारे में कहा जाता है कि ओह उस देश के संकेतक तो उप सहारा अफ्रीका से भी बुरे हैं। यह बात कई बार भारत के अहम सामाजिक संकेतकों के बारे में भी कही जाती है। लेकिन हमारे पास सफलता की वैश्विक कहानियां भी हैं, चर्चा के लिए विश्वस्तरीय संस्थान भी हैं। भारत दुनिया के कुछ महानतम धर्मों का जन्मस्थान है। मसलन हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन आदि। हमारे पास पुराने ग्रंथ हैं,इतिहास है, नैतिक प्राधिकार है। यदि हम कुछ संकेतकों पर पिछड़ भी गए तो हमारी तुलना उप-सहारा अफ्रीका के देशों से हो भी कैसे सकती है? हम यह भी जानते हैं कि ये रेटिंग एजेंसियां कहां से आती हैं। केन्या ने पिछले दिनों 12 टन कॉफी, चाय और मूंगफली के रूप में जो छोटी सी सहायता दी थी उसे लेकर सोशल मीडिया पर मचे हो-हल्ले ने मुझे यह याद दिलाया। एक पक्ष आहत था कि एक देश लगभग महाशक्ति बन चुके हमारे देश को इतनी मामूली मदद भेज रहा है। जबकि दूसरा पक्ष जो ज्यादा मुखर था उसका कहना था कि मोदी ने भारत को इस हाल में पहुंचा दिया कि उसे चाय, कॉफी और मूंगफली जैसी मदद स्वीकार करनी पड़ रही है। परंतु दोनों पक्षों की भावनाओं में एक समानता थी: केन्या एक अफ्रीकी देश है। वह भी उप-सहारा क्षेत्र का। अफ्रीका मदद लेने वाला महाद्वीप रहा है, वह देने की स्थिति में नहीं है।

इसके बाद मैंने दुनिया के उस हिस्से के सामाजिक-आर्थिक हालात का जायजा लेने पर विवश किया जिसे तीसरी दुनिया के भी अंतिम पायदान पर या उससे माना जाता है। विश्लेषण के निष्कर्ष ने मुझे झटका दिया। भले ही अफ्रीका के देशों को भूखा-नंगा माना जाता हो लेकिन प्रति व्यक्ति जीडीपी के अनुसार 20 अफ्रीकी देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं। इनमें ज्यादातर उप सहारा के देश हैं। यहां यह बचाव काम नहीं आएगा कि हमारी तुलना कम आबादी वाले इन देशों से न की जाए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़े दिखाते हैं कि हमसे अमीर 20 अफ्रीकी देशों की आबादी 68 करोड़ है। पूरे अफ्रीका की आबादी 128 करोड़ है और उसका जीडीपी 2.6 लाख करोड़ डॉलर है। भारत का जीडीपी 3 लाख करोड़ डॉलर है लेकिन यहां आबादी भी कुछ करोड़ अधिक है। आईएमएफ ने 195 देशों के लिए प्रति व्यक्ति जीडीपी के जो आंकड़े पेश किए हैं उमें भारत इस वर्ष 144वें स्थान पर है। घाना, कॉन्गो, आइवरी कोस्ट और मोरक्को हमसे बेहतर स्थिति में हैं। बोत्सवाना (84) और गैबॉन (80) हमसे काफी बेहतर स्थिति में हैं। दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, और मॉरीशस तथा सेशेल्स द्वीप भी हमसे अच्छी स्थिति में हैं।

यदि बिहार एक देश होता तो वह 195 देशों में 184वें क्रम पर होता। उसके नीचे नाइजर, इरिट्रिया, अफगानिस्तान, सियरा लिओन, सोमालिया और कुछ अन्य देश होते। क्या अब भी आप आबादी को बचाव के रूप में इस्तेमाल करना चाहेंगे? बिहार की आबादी सूची में 185 से 195 स्थान तक शामिल सभी देशों से अधिक है। यदि उत्तर प्रदेश एक देश होता तो वह 172वें स्थान पर होता और उसके समकक्ष माली होता। तंजानिया और टोगो उससे ऊपर होते। उत्तर प्रदेश की आबादी भी सूची में 172 से 195 स्थान के बीच के सभी देशों से अधिक होती। यही दो राज्य तय करते हैं कि देश पर कौन शासन करेगा जबकि इनकी गरीबी उप सहारा अफ्रीका के देशों से अधिक है। अधिकांश सामाजिक संकेतकों पर भी यह काफी गरीब और कुशासित है।

इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं। 'उप-सहारा अफ्रीका से भी खराब' यह एक अत्यंत नस्ली और गलत विचार है। दूसरा, दुनिया आज भारत को जिस प्रतिकूल दृष्टि से देख रही है उसमें देश का एक हिस्सा इस जोखिम में है कि उसे भी ऐसे ही विशेषण मिल सकते हैं। नदियों में तैरते और किनारों पर दफन शवों की तस्वीरें ध्वस्त महान भारतीय हृदय प्रदेश की स्थायी छवि बन सकते हैं। यदि कोई ऐसी तुलना करने लगे कि उसके मानव सूचकांक गंगा के मैदानी इलाकों से भी बुरे हैं तो? यह तो बी.1.617 को भारतीय स्वरूप बुलाने से भी बुरा है।

यह तस्वीर जितनी दिख रही है उससे अधिक करीब है। हमारा कुशासन, जाति या धार्मिक पहचान की क्षुद्र राजनीति, भ्रष्टाचार, झूठा समाजवाद, आत्म प्रशंसा, थोथी जीत की भावना आदि हमारी छवि को कल्पना से अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। बाहर की दुनिया बहुत बेरहम है।

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