बिजनेस स्टैंडर्ड - कैसे लगेगा सौ करोड़ से ज्यादा लोगों को टीका?
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कैसे लगेगा सौ करोड़ से ज्यादा लोगों को टीका?

के पी कृष्णन /  June 04, 2021

वर्तमान में भारत के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी बात और सबसे अहम आर्थिक प्रोत्साहन क्या है? निस्संदेह यह है कोविड टीकाकरण। हमें यह याद रखना होगा कि यह पूरा मामला कोविड-19 के मौजूदा स्वरूपों के साथ समाप्त नहीं होने वाला। शायद हमें हर वर्ष इन टीकों की बूस्टर खुराक लेनी होगी। ऐसे में हमें एक तात्कालिक लक्ष्य के साथ दीर्घावधि के नीतिगत रास्ते के बारे में विचार करना होगा और वह है जल्द से जल्द सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना।

आधुनिक सार्वजनिक अर्थशास्त्र का एक बड़ा लेकिन सामान्य विचार यह है कि आजादी भलीभांति काम करती है और राज्य को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब बाजार विफल हो जाए। बाजार की विफलता की चार श्रेणियां हैं: बाजार शक्ति की उपस्थिति, बाह्य कारक, सूचनाओं की विसंगति और सार्वजनिक बेहतरी के प्रावधान। सरकार के हस्तक्षेप की स्थिति में दो बातों की जांच बहुत जरूरी होती है: बाजार की विफलता की मौजूदगी और राज्य के प्रस्तावित हस्तक्षेप का विश्वसनीय क्रियान्वयन। ये बातें हमें वे अवधारणाएं और सिद्धांत मुहैया कराती हैं जिनकी मदद से हम टीकाकरण पर विचार कर सकते हैं।

देश में केवल दो बड़ी टीका विक्रेता कंपनियां हैं। ऐसे में बाजार की शक्ति को लेकर भी चिंता है। बहरहाल, एक बार बाजार विश्व बाजार के सामने आने के बाद महत्त्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा सामने होगी। बाजार की शक्ति के संदर्भ में यह बात बार-बार सामने आती है: देश में किसी एकाधिकार वाले क्षेत्र में जटिल शासकीय हस्तक्षेप में पडऩे के बजाय बेहतर यही होगा कि व्यापार में खुलापन लाया जाए और देश में प्रतिस्पर्धी नीति के क्षेत्र में राज्य की क्षमता की समस्या से निजात पाई जाए।

टीकाकरण उन व्यक्तियों को बचाव मुहैया कराएगा जो टीका लगवाएंगे। उनके यहां वहां जाने की संभावना बनने और महामारी फैलाने की आशंका कम होने से बाह्य मोर्चे पर सकारात्मक स्थिति निर्मित होगी। परंतु आमतौर पर इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि लोग टीकाकरण के लिए आखिर कितनी कीमत चुकाने को इच्छुक होंगे? अगर उसकी कीमत अच्छी खासी हुई तो? चाहे जो भी कीमत चुकाई जाए वह व्यक्ति और समाज को होने वाले लाभ की तुलना में कम ही होगी। सामाजिक लाभ और व्यक्तिगत लाभ का यह अंतर टीकों के बाजार में सरकार के हस्तक्षेप की अच्छी वजह है।

कोरोना में एक अहम समस्या मूल सामाजिक चर्चा के स्तर पर सूचनाओं की विसंगति की भी है। चूंकि एक्स के पास यह जानने का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं है कि वाई कोविड का प्रसार करने वाला हो सकता है, ऐसे में चर्चा केवल उन लोगों के बीच सिमट कर रह जाती है जो एक दूसरे में कोविड की स्थिति के बारे में जानते हों।  तीसरे पक्ष से निकलने वाले विश्वसनीय संकेतक मसलन टीकाकरण पासपोर्ट या किसी व्यक्ति में संक्रमण के बारे में जानकारी आदि कोविड के कारण सूचना के स्तर पर उत्पन्न विसंगति को दूर करने वाले संभावित हल हो सकते हैं।

अर्थशास्त्र में उपचारात्मक स्वास्थ्य और टीकाकरण को सार्वजनिक बेहतरी में श्रेणीबद्ध नहीं किया जाता। यदि क दंत चिकित्सक की कुर्सी पर बैठा है तो ख उसी समय उसका इस्तेमाल करने से वंचित है। इसी तरह दंत चिकित्सक किसी को भी सेवा देने से इनकार कर सकता है। यानी उपचारात्मक स्वास्थ्य सेवाएं राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह सार्वजनिक बेहतरी में नहीं गिनी जा सकतीं। उपचारात्मक स्वास्थ्य की बेहतरी को न गिनने से राज्य का हस्तक्षेप गलत हो सकता है और नुकसानदेह भी। ऐसे ही पोलियो की खुराक या फ्लू के खिलाफ टीकाकरण भी सार्वजनिक बेहतरी में नहीं आता। हालांकि राज्य सरकार लोगों और समाज की बेहतरी को ध्यान में रखकर इसे नि:शुल्क या रियायती दरों पर दे सकती है।

कोविड टीकाकरण में बाजार विफलता जैसी कोई कठिनाई नहीं है लेकिन क्या हमारे पास इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण की सरकारी क्षमता है? महामारी के बिना शांतिपूर्ण ढंग से भारत ने अधिकतम पांच करोड़ लोगों (माताओं और शिशुओं) का सालाना टीकाकरण किया है। कोविड के लिए 18 वर्ष से अधिक आयु के 95 करोड़ भारतीयों को टीके की दो खुराक देनी होंगी। इसके लिए 190 करोड़ खुराक चाहिए। सरकारी आपूर्ति इसके तीन फीसदी हिस्से की भरपाई कर सकती है। इसके अलावा वयस्कों का टीकाकरण सरकार के अब तक किए गए टीकाकरण से एकदम अलग है।

आगे की राह?

फिलहाल विश्व बाजार मेंं टीका 10 डॉलर प्रति खुराक कीमत पर उपलब्ध है। कुछ तार्किक अनुमानों के आधार पर कह सकते हैं कि एक व्यक्ति के टीकाकरण पर 25 डॉलर का खर्च है। आयुष्मान भारत में 50 करोड़ लोगों को चिह्नित किया गया है जो सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ ले सकते हैं। इनमें से करीब 20 करोड़ 18 वर्ष से कम उम्र के हैं, यानी शेष 30 करोड़ लोगों को नि:शुल्क टीके लगाने होंगे। मौजूदा दर पर देखें तो इसमें 56,250 करोड़ रुपये की राशि व्यय होगी। यदि सरकार वैश्विक निविदा के जरिये 60 करोड़ टीके खरीदती है तो कीमत कुछ कम होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि कीमत 20 फीसदी कम हो सकती है और भविष्य में इसमें और कमी आ सकती है। यानी तब 45,250 करोड़ रुपये व्यय करने पड़ सकते हैं। टीकाकरण पर होने वाले व्यय की तुलना उस व्यय से होनी चाहिए जो अन्यथा लोगों के अस्पताल में दाखिल होने पर होता।

कोई गरीब आदमी टीकाकरण से वंचित न रह जाए यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार विशेष अभियान चला सकती है। आयुष्मान भारत में 24,000 अस्पतालों को पैनल में शामिल किया गया है ताकि वे उपचार मुहैया करा सकें। अगले तीन महीनों में जब व्यापक टीकाकरण शुरू होने तक इन अस्पतालों से आपूर्ति शुरू की जा सकती है। हमारी अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की तरह जो गरीब नहीं हैं वे यहां भी टीकाकरण का मूल्य चुका सकते हैं या फिर उन्हें कर्मचारी राज्य बीमा, केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं या अन्य कर्मचारी बीमा योजनाओं के तहत टीका लगाया जा सकता है। बाजार और राज्य की संभावित विफलता को ध्यान में रखते हुए टीकाकरण को तेज करने का यह तरीका कई विशेषज्ञ अगस्त 2020 में ही सुझा चुके हैं। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। विभिन्न राज्यों की ओर से टीकों को लेकर अलग-अलग (असफल) निविदा जारी करने के बजाय केंद्र सरकार की ओर से एक समेकित निविदा जारी करनी चाहिए ताकि एक साथ बड़े पैमाने पर खरीद हो सके और कीमतों को शुरुआत में ही प्रतिस्पर्धी रखा जा सके। इसकी सफलता के आधार पर ही दूसरे दौर में अधिक विकेंद्रीकृत खरीद प्रक्रिया अपनाई जाए। राज्य और बाजार मिलकर स्वतंत्र भारत की इस सबसे बड़ी चुनौती को हल कर सकते हैं।

(लेखक भारत सरकार के सेवानिवृत्त सचिव हैं। वर्तमान में वह एनसीएईआर में प्राध्यापक और श्रीराम कैपिटल के गैर-कार्यकारी चेयरमैन हैं)

Keyword: टीकाकरण, स्वास्थ्य, आर्थिक प्रोत्साहन, प्रतिस्पर्धी नीति, पोलियो, फ्लू,
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