बिजनेस स्टैंडर्ड - 'इस त्रासदी में सभी को मिलकर करना होगा काम'
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'इस त्रासदी में सभी को मिलकर करना होगा काम'

निवेदिता मुखर्जी, श्रीमी चौधरी और दिलाशा सेठ /  06 04, 2021

बीएस बातचीत

कोविड-19 महामारी की पहली लहर से देश की अर्थव्यवस्था उबर भी नहीं पाई थी कि इसकी दूसरी लहर फिर कहर बनकर टूट पड़ी। इस भीषण महामारी की मार शहर से दूर देश के गांवों तक भी फैल गई है। अब सभी की नजरें एक बार फिर सरकार पर जा टिकी हैं। इन तमाम चुनौतियों के बीच वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि सरकार महामारी के कहर से पूरी तरह वाकिफ है और हालात पर नजर बनाए हुए हैं और सभी तथ्यों का सूक्ष्म अध्ययन कर रही है। वित्त मंत्री ने निवेदिता मुखर्जी, श्रीमी चौधरी और दिलाशा सेठ से साक्षात्कार में कोविड महामारी से देश के समक्ष पैदा हुईं चुनौतियों और इनसे निपटने के सरकार के प्रयासों का जिक्र किया। पेश हैं संपादित अंश:

पहली नजर में इस महामारी का कितना असर हुआ है?

मौजूदा अनिश्चितताओं को देखते हुए वित्त मंत्रालय महामारी के असर की समीक्षा करने में थोड़ा समय लेगा। आरबीआई का अनुमान सीमित क्षेत्रों तक सीमित है और मैं उसे स्वीकार करती हूं। हम काफी सूक्ष्मता से तथ्यों की समीक्षा करते हैं और इसलिए मुझे थोड़ा और समय चाहिए। इस दिशा में कार्य चल रहा है। कुछ क्षेत्रों के लिए हम राज्यों से भी जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।

कोविड-19 महामारी का इसर इस बार गंभीर रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों पर भी असर हुआ है। लोगों के रोजगार भी छिन गए हैं। सरकार लोगों की दिक्कतें कम करने के लिए क्या कदम उठा रही है?

इसके दो पहलू हैं। जिस तेजी के साथ वायरस शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहा है हम उससे वाकिफ हैं। हालांकि  ऐसी व्यवस्थाएं करना चुनौतीपूर्ण होगा, जिससे लोागें की समस्याएं तत्काल दूर हो जाएंगी। ग्रामीण क्षेत्र में बदलती परिस्थितियों पर नजर रखी जा रही है। हमने ग्रामीण आबादी के लिए मुफ्त खाद्यान्न देने की भी व्यवस्था की है। प्रधानमंत्री स्वयं स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। मैंने सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र दोनों की बीमा कंपिनयों को दावों का निपटान तेजी से करने के लिए कहा है। दावों के निपटान के लिए जरूरी दस्तावेज संबंधी शर्तों में भी ढील दी जा रही है।

क्या सरकार लोगों के खाते में सीधी रकम नहीं भेजने का निर्णय ले चुकी है?

मैंने इस विषय पर अभी नहीं सोचा है। केंद्रीय बजट महामारी के दौरान तैयार हुआ था। इस बार हमें अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाना था। इस वजह से बजट खास मकसद से तैयार किया गया था। बजट प्रस्तावों का क्रियान्वयन 1 अप्रैल से शुरू हुआ था और इस वित्त वर्ष का तीसरा महीना ही शुरू हुआ है। लिहाजा बजट में किए गए उपाय भी कुछ हद तक लोगों तक पहुंचे हैं। मैं उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और राज्यों से बात कर रही हूं। उनके साथ संवाद करने के बाद ही मैं कुछ निर्णय ले पाऊंगी।

फरवरी में हालात अलग थे। अगर आपको जरा भी इल्म होता कि दूसरी लहर आने वाली है तो क्या आप कुछ अलग करतीं?

जीडीपी में 23 प्रतिशत गिरावट आने के बाद बजट तैयार किया गया था। उस समय मेरे पास यह अनुमान उपलब्ध नहीं था कि पूरे वर्ष के लिए जीडीपी की चाल कैसी रहेगी। हमें कोविड-19 के असर के मद्देनजर इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि अर्थव्यवस्था किस तरह संभाली जा सकती है और शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे बेहतर बनाई जा सकती हैं। ऐसे में यह पूछना कि दूसरी लहर की आशंका और इसके असर को ध्यान में रखा गया था या नहीं, उचित नहीं होगा। मुझे लगता है कि अर्थव्यवस्था में 23 प्रतिशत गिरावट अपने आप में एक गंभीर बात थी।

विपक्ष ने सरकार पर 'संवेदनहीन' होने का आरोप लगाया है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?

मैं विपक्ष सहित सभी पक्षों की टिप्पणी सुनने के लिए तैयार हूं। सार्वजनिक स्तर पर जो भी बातें की जा रही हैं मैं उस पर जरूर ध्यान दूंगी। हमें विभिन्न लोगों जैसे अर्थशास्त्रियों, पूर्व अधिकारियों और अन्य संबंधित पक्षों की बातें सुननी हैं। प्रभावित लोगों की प्रतिक्रियाएं भी हम जानने की कोशिश करेंगे। हरेक त्रासदी एक संदेश लेकर आती है। हम सभी भीषण संकट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में हम सभी को एक साथ मिलकर काम करना होगा।  

बजट पेश होने में अभी बहुत समय शेष हैं फिर भी आप स्वास्थ्य सुविधाओं के अधिक रकम आवंटित करने के बारे में जरूर सोच रही होंगी?

बजट में स्वास्थ्य सुविधाएं दुरुस्त करने पर जोर दिया गया है। हालांकि ऐसे सुझाव आ रहे हैं कि इस मद में आवंटन बढ़ाकर जीडीपी का 6 या 10 प्रतिशत तक करना चाहिए। हालांकि हमें यह भी देखना होगा कि इस मद में आवंटित रकम में वास्तव में कि तनी रकम वाकई इस्तेमाल हो पाएगी। इस तरह, जिस योजना के हिसाब से यह रकम खर्च होनी है उसके अनुसार प्रखंड स्तर सभी स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद रहनी चाहिए। इसके अलावा वहां डॉक्टर और नर्स की संख्या बढ़ानी होगी और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिक से अधिक लोगों को प्रशिक्षित करना होगा। हम पहले एक आधार तैयार करेंगे और उसके बाद और अधिक रकम आवंटित की जाएगी।

सरकार पूरे देश में मुफ्त टीकाकरण अभियान क्यों नहीं चला रही है?

हमने 16 जनवरी से देश में टीकाकरण अभियान शुरू किया था। तब से सरकार ने दो टीका विनिर्माता कंपनियों से कोविड-19 से बचाव के टीके खरीदकर इनका वितरण शुरू कर दिया था। हमने राज्यों को मुफ्त में ये टीके दिए। हमने पहले महामारी से लड़ाई में आगे रहे लोगों जैसे डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस आदि को टीके लगाने शुरू किए। बाद में 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण की मुहिम चलाई। बाद में राज्यों ने कहना शुरू कर दिया कि स्वास्थ्य राज्य सूची में आता है इसलिए उन्हें भी टीकाकरण की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। इसके बाद हमने केंद्र, राज्य और निजी क्षेत्र तीनों को टीकाकरण प्रक्रिया में शामिल किया। यह अलग बात है कि कंपनियों ने राज्यों और अस्पतालों के लिए अलग-अलग कीमतें तय करनी शुरू कर दीं। राज्यों की कुछ गैर-जरूरी टिप्पणियों से लोगों में टीकाकरण को लेकर आशंका भी पैदा हो गई। वे 'मोदी वैक्सीन', 'भाजपा वैक्सीन' आदि कहते रहे हैं।

इस साल टीके के लिए बजट में आवंटित की गई 35,000 करोड़ रुपये की राशि क्या इस साल के लिए काफी है या फिर अतिरिक्त आवंटन की जरूरत पड़ेगी?

अगर इसकी जरूरत पड़ती है तो मैं अधिक राशि देने को तैयार हूं लेकिन कृपया इसके लिए मुझे गलत मत ठहराइए। मुझे बताया गया कि आपको 35,000 करोड़ रुपये मिले तो उसे खर्च क्यों नहीं किया? आप मुझसे 1 अप्रैल को ही समूची राशि किस तरह खर्च करा देना चाहते हैं? सरकार की व्यवस्था के तहत इस राशि को टीका निर्माताओं को दिया जाएगा, जब तक मुझे राशि के उपयोग का प्रमाण मिलता रहेगा। मेरा कहना है कि मैं यह रकम किसी तरह की गारंटी के बगैर भी टीका विनिर्माताओं को दूंगी ताकि वे अग्रिम भुगतान लेकर मुझे टीके मुहैया कराएं। जिस पल आप मुझे टीके की एक खेप देंगे, मैं आपको और पैसे दूंगी। मैं हालात की जरूरत को लेकर सजग हूं। मैंने कहा है कि 35,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं और जरूरत आने पर और भी दिए जाएंगे। टीका निर्माण में नए आपूर्तिकर्ताओं के आने पर हमें उनसे भी बात करनी होगी।

लेकिन क्या कोई अनुमान है कि टीके के लिए आवंटन किस हद तक जा सकता है?

नहीं, फिलहाल इस बारे में कुछ पाना मुश्किल है।

वर्ष 2021-22 के लिए उत्पाद शुल्क राजस्व का अनुमान पिछले साल की तुलना में कम है। वर्ष 2020-21 में उत्पाद शुल्क का संशोधित अनुमान 3.61 लाख करोड़ रुपये है जबकि इस साल का अनुमान 3.35 लाख करोड़ रुपये का है। इसके वास्तविक आंकड़े तो 3.89 लाख करोड़ रुपये रहे हैं। क्या यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि केंद्र चालू वित्त वर्ष में उत्पाद शुल्क कटौती के बारे में सोच रही है?

मैंने बजट के समय भी कहा था कि हमने उत्पाद शुल्क ही नहीं बल्कि अधिकांश राजस्व में परंपरागत रवैया अपनाया है। इसकी वजह यह है कि वर्ष 2020 के साल को देखते हुए यह अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी होगी? इसीलिए हम इस साल के राजस्व अनुमानों के बारे में नहीं कह सकते हैं। एक वक्त था जब ब्रेंट क्रूड 11 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर था। लेकिन अब यह 68 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच चुका है।

लेकिन अप्रत्यक्ष कर से जुड़े तमाम उपाय काफी हद तक पेट्रोलियम कीमतों पर ही निर्भर रहे हैं। क्या आपको इसे लेकर चिंता होती है?

पहली बात, मेरे वित्त मंत्री बनने के बाद से हर बार जीएसटी परिषद की बैठक में अप्रत्यक्ष करों के तर्कसंगत बनाने का मुद्दा चर्चा के लिए रखा जाता रहा है। क्या हम जीएसटी दरों पर गौर कर सकते हैं? केवल एक उत्पाद श्रेणी पर ही नहीं। यह कहना शायद ठीक है कि पिछले साल कर संग्रह में बड़ा हिस्सा तेल का ही था लेकिन जीएसटी को तर्कसंगत बनाने की जरूरत तो है। वर्ष 2019 में धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था में तरलता का संकट था और बाजार से मांग भी नदारद थी। तब जीएसटी परिषद ने कर प्रणाली को तर्कसंगत बनाने के लिए उसे मुफीद वक्त नहीं माना था। फिर फरवरी 2020 में हुई बैठक में भी मैंने हिचक के साथ यह मुद्दा रखा था लेकिन केवल मोबाइल फोन पर ही दर बढ़ाने पर सहमति बन पाई। उस बार भी परिषद ने यही कहा कि यह समय इस फैसले के माकूल नहीं है। हमारी राय यह थी कि जीएसटी प्रणाली लागू होने के तीन साल पूरे होने पर क्या हमें कर दरों पर गौर कर उन्हें थोड़ा स्थिर करने पर सोचना चाहिए? उस समय राजस्व तटस्थता 11 थी जो अब काफी बिगड़ चुकी है।

आपने पीएसयू के निजीकरण नीति की घोषणा की है। अब नीति आयोग ने भी कुछ नाम दिए हैं। दो बैंकों पर भी चर्चा चल रही है। क्या निजीकरण पर अमल किया जा रहा है?

मैंने बजट में जो कहा है उसे पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हूं इसीलिए मैं इसे पूरा करने की अपनी पूरी कोशिश जारी रखूंगी।

ऐसा कब हुआ कि बैड बैंक सामने आए हों और आपने कहा कि सरकार सिक्योरिटी रिसीट और परिसंपत्तियों पर गारंटी देगी। क्या सरकार गारंटी देगी? क्या यह भी निजी पक्षों के लिए होगा और इसकी समय-सीमा क्या है?

नहीं, इसकी रूपरेखा यह है कि यह कैसे काम कर रहा है। हमने निश्चित रूप से इसे बैड बैंक नहीं कहा है। अब हमने इसे अलग प्रारूप दिया है। हम फंसे हुए कर्ज (एनपीए) और खराब परिसंपत्तियों को अलग कर रहे हैं जो बैंक से कई सालों से जुड़े हुए हैं। उनको सबसे पहले अलग करने के लिए प्रोविजनिंग की गई है। इस स्तर पर ही उन्हें एक निश्चित राशि मिलती है जिसके लिए उन्होंने प्रोविजनिंग की। इसके बाद एआरसी इस पर काम करेगा और एआईआईएफ  बोली के माध्यम से इसमें दखल करेगा और इसे लेगा। यह फॉर्मूला अधिक पारदर्शी है और इसमें अधिक पक्ष बोली लगाने के लिए आ सकते हैं और हम देख रहे हैं कि इसमें काफी दिलचस्पी दिखाई जा रही है। इस पर योजना के अनुसार आगे बढ़ा जा रहा है।

दुनियाभर में ब्याज दरों में गिरावट आई है। क्या सरकार लघु बचत योजनाओं पर दरें घटाने पर विचार करेगी? क्या आपको लगता है कि लघु बचत पर ब्याज का निर्धारण बाजार के हिसाब से होना चाहिए क्योंकि ऐसा नहीं होगा तब सरकार को सब्सिडी देनी होगी?

आपने वैश्विक स्तर की बात की जहां ब्याज दरों को लेकर आमतौर पर यह माना जाता है कि लंबे समय के लिए दर कम होगी। ब्याज दरें बहुत लंबे समय तक के लिए कम भी रही हैं और अब भी संकेत है कि दरें नहीं बढऩे जा रही हैं। दुनिया भर में कुछ ऐसी ही तस्वीर है। इसकी वजह अधिक नकदी और पर्याप्त मांग की कमी है। भारत में ब्याज दरें कम होने के मुद्दे पर आरबीआई की डिप्टी गवर्नर श्यामला गोपीनाथ एक समिति का नेतृत्व कर रही थीं। इसमें स्पष्ट रूप से एक चार्ट निर्धारित किया गया कि कैसे हम ब्याज दरों को रीपो दरों के साथ सामंजस्य कर पाएं और यह कितना अधिक हो सकता है। ऐसी कई योजनाएं हैं जिनके माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों के ब्याज में बढ़ोतरी की जाती है और जहां सरकार कुछ पैसे डालती है क्योंकि दरें कम हो गई हैं जैसे कि 'वय वंदना योजना'। इसीलिए गोपीनाथ की रिपोर्ट इस फैसले के लिए यह अंदाजा देती है कि आप ब्याज को किस तरह देखें। साथ ही, समान रूप से सरकार भी इस मकसद से इन फंडों से उधार लेती है, चाहे वह सुकन्या समृद्धि योजना हो या राष्ट्रीय लघु बचत निधि आदि हो। जो भी दरें होंगी वे वहीं दरें होगीं जिसका भुगतान सरकार को फिर से करना होगा जब आप उनसे कर्ज ले रहे होते हैं। अगर आप श्यामला गोपीनाथ की सिफारिशों को देखें तो पूंजी की लागत, उधार लेने की लागत सब कुछ संदिग्ध हो जाती है, जब चीजों को एक सख्त दायरे में रखने की कोशिश होती है। इसीलिए ये लंबे समय से स्थिर हैं और धीरे-धीरे इस मकसद को हासिल किया जा रहा है। मुझे लगता है कि यह काफी हद तक पिछले साल और इससे पहले के साल में हुआ है।

Keyword: अर्थव्यवस्था, महामारी, निर्मला सीतारमण, अध्ययन, बीमा, स्वास्थ्य सुविधा,
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