बिजनेस स्टैंडर्ड - यूनिकॉर्न में इजाफा और अंशधारकों का अहम मुद्दा
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यूनिकॉर्न में इजाफा और अंशधारकों का अहम मुद्दा

आकाश प्रकाश /  May 31, 2021

ऐसा कोई दिन नहीं बीत रहा जब एक यूनिकॉर्न न बनती हो। यूनिकॉर्न ऐसी स्टार्टअप कंपनी को कहते हैं जिसका मूल्यांकन कम से कम 100 करोड़ डॉलर हो। क्रेडिट सुइस के नीलकंठ मिश्रा ने स्टार्टअप को लेकर अपनी दिलचस्प रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया कि आखिर क्यों भारत में 100 से अधिक यूनिकॉर्न हैं और कैसे यह परिपक्व हो रहा है। वह इनके वित्त पोषण और नई कंपनी के निर्माण के बारे में बताते हैं और यह भी कि इसे क्यों सकारात्मक माना जाए?

अब यह स्पष्ट है कि बड़ी तादाद में यूनिकॉर्न आगामी 12 से 18 महीनों में प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) लाना चाहती हैं। जोमैटो पहली ऐसी कंपनी होगी। कंपनी भारत में सूचीबद्ध होकर एक अरब डॉलर जुटाना चाहती है और उसका लक्ष्य अपना मूल्यांकन 6-7 अरब डॉलर करने का है। इन यूनिकॉर्न के लिए एक अहम निर्णय यह भी है कि वे कहां सूचीबद्ध हों। अमेरिका में या भारत में? अंतरराष्ट्रीय बैंक चाहेंगे कि वैश्विक सूचीबद्धता हो क्योंकि उनका शुल्क अधिक होगा और वे भारतीय प्रतिस्पर्धा से बच सकेंगे। स्थानीय बैंकर भारत में सूचीबद्धता चाहेंगे क्योंकि यह उनके लिए बेहतर है। इसमें सही कदम क्या होगा?

मुझे लगता है कि हर कंपनी को अपने कारोबारी मॉडल और लक्षित निवेशकों पर नजर डालनी चाहिए। एक बात स्पष्ट है कि अमेरिका में सूचीबद्घ होने पर आप भारतीय निवेशकों से पूरी तरह दूर हो जाएंगे। मैं इस बात पर यकीन करता हूं कि आने वाले कुछ वर्षों में वैश्विक निवेशक नहीं बल्कि घरेलू निवेशक ही बाजार को संचालित करेंगे। पूंजी प्रबंधन के अर्थों में भी वे वैश्विक निवेशकों से बड़े होंगे। घरेलू निवेशकों का रास्ता रोकना किसी भी कंपनी के लिए बड़ा नुकसान हो सकता है। वे स्वाभाविक रूप से भारतीय परिसंपत्तियों के दीर्घकालिक खरीदार होते हैं। यदि वैश्विक उभरते बाजार आपका लक्षित निवेशक आधार है तो आपको विदेशों में सूचीबद्घता से कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि इन सभी निवेशकों में भारतीय सूचीबद्घ प्रतिभूतियों में निवेश की क्षमता होती है। वैश्विक स्तर पर सूचीबद्घ तभी होना चाहिए जब आपको लगे आपका स्वाभाविक निवेशक आधार विदेशी टेक निवेशक हैं जो भारतीय सूचीबद्घ प्रतिभूति नहीं खरीदेंगे या नहीं खरीद सकते।

लक्षित निवेशक आधार आपके कारोबारी मॉडल पर निर्भर है। यदि आपका कारोबारी मॉडल तकनीक आधारित है और घरेलू बाजार पर केंद्रित है तो स्थानीय और उभरते बाजार के निवेशक सबसे बेहतर हैं। कारोबार और उसकी संभावनाओं को समझने के लिए भारत की गहरी समझ आवश्यक है। ऐसे में घरेलू और उभरते बाजार के निवेशक बेहतर हैं और भारत में सूचीबद्घता भी। यदि ऐसी कंपनी वैश्विक सूचीबद्घता चाहती है तो नाकामी का जोखिम है। वैश्विक निवेशक केवल एक कंपनी के लिए भारत के बारे में समझ नहीं बढ़ाएंगे। कारोबारी वॉल्यूम पिछड़ता है, वैश्विक मानकों से बाजार पूंजीकरण में कमी आएगी और कंपनी की अनदेखी हो सकती है। अतीत में इंटरनेट पर भारतीय सूचीबद्घता में यही हुआ है।

यदि आपका कारोबार वैश्विक लेकिन भारतीय है क्योंकि कंपनी की स्थापना बेंगलूरु में हुई है और उत्पाद विकास भी यहीं होता है, या फिर संस्थापक भारतीय हैं, तब वैश्विक तकनीकी निवेशक स्वाभाविक लक्ष्य होते हैं। एसएएएस (सेवा के रूप में सॉफ्टवेयर) कारोबार इसका स्वाभाविक उदाहरण है। कारोबार के आकार या अर्थशास्त्र का भारत से कोई वास्तविक संबंध नहीं होता। इन कारोबारों को भारत के बारे में पूर्व जानकारी और स्थानीय परिस्थितियों के विश्लेषण की आवश्यकता नहीं होती। ऐसी कंपनियों को अमेरिका में सूचीबद्घ होना चाहिए। वैश्विक विश्लेषक उन्हें आसानी से समझ सकेंगे।

कई उद्यमियों के मन में यह आशंका भी है कि पता नहीं विदेशों में सूचीबद्घ होने से उन्हें उच्च मूल्यांकन मिल सकेगा या नहीं। मेरा तर्क इसके उलट है। भारतीय बाजार बेहतर संचालन और उच्च प्रतिफल वाली वाली कंपनियों के लिए उच्च मूल्य चुकाने को तैयार हैं। वित्तीय, एफएमसीजी, पेंट, रसायन, वाहन और वर्गीकृत क्षेत्रों में सबसे महंगी सूचीबद्घ कंपनियां भारत की हैं। नैसडैक की तरह हमारे यहां सैकड़ों तकनीक संपन्न कारोबारी मॉडल पहले से सूचीबद्घ नहीं हैं इसलिए उन्हें भारत में जरूरी बढ़त नहीं मिलेगी। यकीनन देश में निवेशकों के आधार को यह सीखना होगा कि ऐसे कारोबारों का मूल्यांकन कैसे किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय बाजार घाटे वाली कंपनियों के मूल्यांकन में प्रभावी नहीं रहे हैं। हालांकि दीर्घावधि की वृद्घि के आकलन में बाजार का प्रदर्शन बेहतर रहा है। देश का स्थानीय निवेशक आधार काफी सहज है और वह वैश्विक सबक लेने को तैयार है।

उद्यमियों को यह भी ध्यान में रखना होगा कि वे सही अंशधारक जुटाएं। एमेजॉन या नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियों की सबसे बड़ी बढ़त उनका अंशधारक आधार था जिसने उन्हें कारोबार तैयार करने का जरूरी लचीलापन दिया और यह सुनिश्चित किया कि वे अल्पावधि के मुनाफे की चिंता न करें। जब तक वे सकारात्मक आर्थिक और नकदी प्रवाह दिखा रहे थे तब तक अंशधारकों को उनके पूरे मुनाफे का निवेश करने देने में आपत्ति नहीं थी। इसके विपरीत अमेरिका में एटीटी को वार्नर मीडिया को अलग करना पड़ा ताकि वह नेटफ्लिक्स और डिज्नी से मुकाबला कर सके। ऐसा इसलिए क्योंकि उसके अंशधारक तात्कालिक मुनाफे और लाभांश पर केंद्रित थे। अगर आपके अंशधारकों और बोर्ड ने लाभांश या मार्जिन या मुनाफे में कमी की इजाजत नहीं दी है तो आप स्ट्रीमिंग में नेटफ्लिक्स का मुकाबला कैसे करेंगे? इसके लिए मुनाफा त्यागना पड़ेगा। जबकि ऐसे निवेशक केवल अपने वर्तमान मुनाफे पर नजर डालते हैं संभावित मुनाफे पर नहीं।

कीमत निर्धारित करते समय उद्यमियों को यह प्रयास करना चाहिए कि वे सर्वाधिक मुनाफे पर ध्यान केंद्रित न करें। सही अंशधारक आधार चुनना जरूरी है ताकि वृद्घि को बल मिले और कारोबार की इकाई के अर्थशास्त्र को समझा जा सके। अंशधारकों के पास भी उद्यमियों के बराबर समय होना चाहिए। आपके निवेशकों को यह समझ होनी चाहिए कि बतौर उद्यमी आप मौजूदा मुनाफे और राजस्व को लेकर किस तरह के संतुलन पर काम कर रहे हैं। कारोबार बढ़ाने पर मुनाफे में क्या कमी आती है और आप दोबारा कितना निवेश करते हैं ऐसे कारोबारी निर्णयों में निवेशकों का आपके साथ होना आवश्यक है। अधिकांश मामलों में बिकवाली करने वाले अंशधारक वेंचर कैपिटलिस्ट और निजी पूंजी निवेशक होते हैं जो किसी भी कीमत पर अधिकतम मूल्य हासिल करना चाहते हैं। उद्यमी आमतौर पर बिक्री नहीं करते और वे सूचीबद्घता के बाद कंपनी चलाते हैं। उन्हें न केवल मूल्य पर ध्यान देना चाहिए बल्कि अंशधारक आधार की गुणवत्ता और अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के साथ उनकी सुसंगतता पर भी ध्यान देना चाहिए। फिलहाल भारत में स्टार्टअप का क्षेत्र एक चमकदार क्षेत्र नजर आ रहा है। इस क्षेत्र में काफी पूंजी निवेश होगा। उद्यमियों को चाहिए कि सूचीबद्घता की जगह, अंशधारक आधार और मूल्यांकन को लेकर सावधानी से चयन करें।

(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं)

Keyword: यूनिकॉर्न, अंशधारक, सूचीबद्घता, आधार, मूल्यांकन, आईपीओ,
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