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मुद्दों की समझ, प्रभावी संप्रेषण और सही अभिव्यक्ति की कमी

सम सामयिक / टीसीए श्रीनिवास-राघवन May 31, 2021

प्रसार भारती ने भारत का नजरिया वैश्विक स्तर पर पेश करने के लिए एक नई संस्था बनाने के सिलसिले में एक अंतरराष्ट्रीय निविदा जारी की है। अच्छी बात है, हमें इसके लिए शुभकामनाएं देनी चाहिए।

लेकिन सरकार को पहले उस समस्या के बारे में सोचने की जरूरत है जिसने वर्ष 2014 में सत्तासीन होने के बाद से ही उसे परेशान किया हुआ है। समस्या यह है कि इस सरकार का घरेलू स्तर पर भी संवाद अक्सर किसी काम का नहीं होता है। जब यह सरकार कुछ अच्छा काम भी करती है और ऐसे कामों की सूची लंबी है, तब भी वह सही संदेश नहीं दे पाती है।

यह पिछली संयुक्तप्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के ठीक उलट है जो बहुत कम काम करने या फिर कुछ गलत काम भी होने पर हर किसी को यह यकीन दिला देती थी कि उसने कुछ अच्छा नतीजा हासिल किया है।

इस विरोधाभास पर गौर करने के बाद मेरी नजर में असल समस्या यह है कि सरकार का पक्ष बताने के लिए जिम्मेदार लोगों में मुख्य रूप से तीन चीजों की कमी है- समझ-बूझ, संप्रेषण कौशल एवं बेहतर ढंग से अपनी बात कहने के लिए जरूरी चालाकी।

सवाल यह है कि जिस चीज को आप खुद नहीं समझ पाते हैं, भला उसे किस तरह प्रचारित-प्रसारित कर सकते हैं? यह बात मीडिया के बारे में भी पूरी तरह सच है। पिछले 41 वर्षों से अर्थशास्त्र की जटिल अवधारणाएं सरल शब्दों में पेश करने की कोशिश करते आ रहे एक पत्रकार के तौर पर मैं कह सकता हूं कि सरकार में बैठे लोगों की ही तरह समकालीन दौर के अधिकतर पत्रकारों में भी इस समझ की कमी है।

लिहाजा सरकार के लिए यह दोहरी मार वाली स्थिति है। इसके अपने लोगों के साथ-साथ मीडिया का भी बड़ा हिस्सा समझ के मामले में कमजोर दिखता है। लेकिन इन सबसे बेअसर सरकार मीडिया को दोषी ठहराती है और मीडिया भी सरकार को जिम्मेदार ठहराती है। इनमें से किसी को भी यह अहसास नहीं है कि खामी उसके भीतर ही है और वह है खराब समझ।

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का उदाहरण ले सकते हैं। यह कर व्यवस्था हर किसी को प्रभावित करती है लेकिन बहुत कम लोग ही इसे वास्तव में समझ पाते हैं। बदकिस्मती यह है कि ये थोड़े लोग न तो सरकार के भीतर हैं और न ही हमारे पत्रकारों के बीच।

सोचने वाली बात यह है कि बेहतर समझ होने पर भी उसके बारे में सही संदेश देने के मामले में यह सरकार पूरी तरह नाकाम नजर आती है। लगता है कि इस सरकार के पास संप्रेषण का कौशल ही नहीं है।

असल में इसकी जड़ें एक बेहद गंभीर संरचनात्मक  समस्या से जुड़ी हैं- आप किसी भी भाषा में असरदार संवाद नहीं कर सकते हैं जिसमें आप सोच नहीं पाते हैं। यहां पर मेरा आशय अंग्रेजी भाषा से है। वैसे संप्रग सरकार ने दिखाया था कि इसका उलटा भी सही है। अगर आप समाज के आला लोगों की तरह अंग्रेजी में सोचते हैं तो आप उसे बेहतर ढंग से संप्रेषित भी कर सकते हैं।

आखिर में अभिव्यक्ति की बात आती है। आधुनिक मीडिया संभाषण में अच्छी अभिव्यक्ति क्षमता को घुमाने की कला (स्पिन) कहकर उसका उपहास बना दिया जाता है। लेकिन बातों को घुमा देना उसी समय बुरा होता है जब किसी बुरी चीज को अच्छे रूप में दिखाने की कोशिश की जा रही हो। अगर किसी अच्छी चीज को ही बखूबी बयां किया जा रहा हो तो उसे स्पिन नहीं कहा जाएगा। और संप्रग ने इस काम में महारत हासिल कर ली थी।

मौजूदा सरकार में विभिन्न मंत्रालयों के बीच भी आपसी समझ, संप्रेषण एवं अभिव्यक्ति की कमी दिखाई देती है। अब उर्वरक कीमतों एवं सब्सिडी पर लिए गए फैसले को ही लीजिए। सरकार ने उर्वरकों के दाम बढ़ाने के साथ ही अगर पूरी सब्सिडी देने का ऐलान भी कर दिया होता तो उसे एक बड़े किसान-समर्थक कदम के तौर पर देखा जाता। लेकिन जिस तरह से इस मामले से निपटा गया, वह दर्शाता है कि सरकार ने उर्वरक की कीमतें बढऩे पर सब्सिडी देने की घोषणा विपक्षी दलों की आलोचना के बाद की है।

मेरे दोस्त एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी बृजेश्वर सिंह ने एक और बात की तरफ ध्यान दिलाया। वह कहते हैं, 'ऐंकरिंग पूर्वग्रह भी बहुत अहम भूमिका निभाता है।' इसका मतलब है कि आप किसी मुद्दे के बारे में जो समझ बनाते हैं उस पर आपके संदर्भ बिंदु (ऐंकर) का बहुत गहरा असर होता है।

सरल ढंग से कहें तो जब आपके मन में कोई धारणा काफी मजबूत हो चुकी हो तो आपके लिए अपनी सोच बदल पाना बहुत मुश्किल होता है। उस समय तथ्य भी अप्रासंगिक हो जाते हैं।

इसका परिणाम यह है कि यह सरकार सच बात कहते समय भी अपने नजरिये को सही ढंग से पेश नहीं कर पाती है। लेकिन कभी-कभी जब इस पर झूठ बोलने का इल्जाम लगता है तो वह बहुत खराब ढंग से अपना पक्ष रख रही होती है।

इस सरकार में तमाम ऐसे लोग हैं जो इसे बखूबी समझते हैं लेकिन वे अपने आकाओं से यह बात कह नहीं पाते हैं। आकाओं का मानना है कि संप्रेषण एवं अभिव्यक्ति जैसी बातों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि आखिर में आपको वोट काम के ही दम पर मिलते हैं। लेकिन यह रवैया हमेशा नहीं चलता है।

इस सरकार को भले ही नापसंद हो लेकिन उसके लिए आगे का रास्ता संप्रग का अनुसरण करना है। अफसरों तक पहुंच बढ़ाइए, मंत्रियों को अपने मंत्रालयों के बारे में खुलकर बोलने दीजिए, नियमित प्रेस ब्रीफिंग करने दीजिए और सबसे बढ़कर, मीडिया के कुछ चेहरों को पसंद न करने के कारण पूरी मीडिया को ही अपना दुश्मन मानना बंद कीजिए।

समस्या संदेशवाहक में शायद ही है। असल समस्या संदेश एवं उसे भेजने के तरीके में है। इस सरकार के लिए ये दोनों ही भारी समस्या रही हैं। सही संदेश देने का तरीका दयनीय रहा है जबकि सारे गलत संदेशों को बहुत ही अच्छी तरह प्रेषित किया गया है।

Keyword: संप्रेषण, अभिव्यक्ति, प्रसार भारती, अंतरराष्ट्रीय निविदा, मीडिया, सब्सिडी,
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