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खुलासा करने को लेकर रिजर्व बैंक की दुविधा

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  May 26, 2021

वर्ष 2014 में मैं देश की सबसे बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) पर अपनी दूसरी किताब लिख रहा था। इस कार्य के लिए मुझे बैंकिंग नियामक  भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से कुछ जानकारियों की आवश्यकता थी। हमारे एक सहयोगी ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत रिजर्व बैंक को एक आवेदन भेजा था। लेकिन उसने कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। मुझे कोई हैरानी नहीं हुई थी क्योंकि उस समय आरबीआई के पास ऐसा करने का पूर्ण अधिकार था।  

अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अगर मैं उससे उसके नियमन एवं अधिकार क्षेत्र में आने वाली किसी इकाई की समीक्षा रिपोर्ट मांगू तो मुझे यह जरूर मिल जाएगी। केवल राष्ट्रीय सुरक्षा या अर्थव्यवस्था को गंभीर खतरा होने की आशंका का हवाला देकर ही जानकारियां साझा नहीं की जाएंगी। सर्वोच्च न्यायालय ने 28 अप्रैल को कुछ बैंकों की वह याचिका खारिज कर दी जिसमें 2015 में पारित एक आदेश वापस लेने का आग्रह किया गया था। उस आदेश में न्यायालय ने आरबीआई को बैंक की समीक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक करने की अनुमति दी थी। कुछ अपवादों को छोड़कर आरबीआई के लिए आरटीआई के तहत समीक्षा रिपोर्ट सहित सभी बैंकों की वित्तीय जानकारियां साझा करना अनिवार्य है। अदालती आदेश के बाद यह असमंजस समाप्त हो गया है कि आरबीआई किन बातों का खुलासा कर सकता है और किन बातों का नहीं।

अक्टूबर 2005 में आरटीआई कानून अस्तित्व में आने से पहले तक सरकार और अदालतों  को छोड़कर आरबीआई से कोई भी उन सूचनाओं की मांग नहीं कर सकता था, जो सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं थीं। सितंबर 2006 में केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) ने आरबीआई को रुपी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की समीक्षा रिपोर्ट उस व्यक्ति को देने के लिए कहा था जिसने इसकी मांग की थी। हालांकि आरबीआई ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8 (1)(ई) का हवाला देते हुए रिपोर्ट साझा करने से मना कर दिया। इस धारा के तहत न्यासीय संबंध होने की स्थिति में किसी इकाई को सूचना साझा करने से छूट मिली हुई है। डॉक्टर और मरीज या वकील और उसके मुवक्किल का संबंध न्यासीय संबंध के दायरे में ही आता है। कुछ मौकों पर बैंक और ग्राहकों के बीच भी यह संबंध लागू होता है। आरबीआई बैंकिंग नियमन कानून की धारा 35 के तहत सभी बैंकों की वैधानिक समीक्षा करता है। दो महीने बाद दिसंबर 2006 में सीआईसी के पूर्ण पीठ ने आरबीआई का निर्णय पलट दिया। पीठ ने धारा 8 (1)(ई) के तहत आरबीआई को छूट नहीं दी लेकिन कहा कि अगर कोई जानकारी साझा करने से देश के आर्थिक हितों पर प्रतिकूल असर पडऩे की आशंका रहती है तो उस स्थिति में आरबीआई आरटीआई की धारा 8 (1)(ए) के तहत सूचनाएं साझा करने से इनकार कर सकता है। अक्टूबर 2011 तक आरबीआई इस धारा का हवाला देते हुए सूचनाएं सार्वजनिक करने से मना करता रहा। 2011 के उत्तराद्र्ध में सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कई आदेशों के माध्यमों से कहा कि सूचना का अधिकार देश का नागरिकों का मौलिक अधिकार है। गांधी आरबीआई की इस दलील से सहमत नहीं हुए कि देश की अक्षुण्णता और आर्थिक हितों का हवाला देकर वह कोई जानकारी साझा करने से इनकार कर सकता है।

इस आदेश के खिलाफ आरबीआई ने विभिन्न न्यायालयों में अपील दायर की। ये सभी मामले शीर्ष न्यायालय में पहुंचे। हालांकि उसने गांधी के आदेश पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया। दिसंबर 2015 में न्यायालय ने यह जरूर कहा कि सूचनाएं सार्वजनिक होनी चाहिए लेकिन मौलिक अधिकार और सूचना का अधिकार पूर्ण नहीं हैं बल्कि इन्हें सापेक्ष में देखा जाना चाहिए।

न्यायालय ने यह आरबीआई पर छोड़ दिया कि सूचनाएं कब साझा करनी है। हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि आरबीआई ने कुछ मामलों में सूचनाएं साझा की और कुछ में नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कथित उल्लंघन के मामले में आरबीआई के खिलाफ अवमानना याचिका भी दायर हो गई। अप्रैल 2019 में शीर्ष न्यायालय ने आरबीआई को निर्देश की अवमानना करने का दोषी पाया। न्यायालय ने कोई गंभीर कदम तो नहीं उठाया लेकिन आरबीआई को आखिरी मौका देते हुए खुलासा नीति वापस लेने के लिए कहा। न्यायालय ने उसको वे सभी समीक्षा रिपोर्ट साझा करने का आदेश दिया जिनसे देश की संप्रभुता को खतरा नहीं था। न्यायालय ने 28 अप्रैल को समीक्षा रिपोर्ट, कारण बताओ नोटिस और जुर्माना सहित अन्य विषयों से जुड़ी सूचनाएं साझा करना अनिवार्य कर दिया। अब आरबीआई के पास कोई विकल्प नहीं है। यानी मोटे तौर पर वित्तीय प्रणाली के बारे में कोई जानकारी अब गोपनीय नहीं रह गई है।

अमेरिका में सूचना की स्वतंत्रता अधिकार के तहत नियमन एवं निगरानी के लिए उत्तरदायी वित्तीय संस्थान को उसके द्वारा या उसकी पहल पर समीक्षा, परिचालन या यथास्थिति से जुड़ी या उसके इस्तेमाल के लिए तैयार रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने की छूट दी गई है। कुछ खास सूचनाएं सार्वजनिक करने में अत्यधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बिना सतर्कता बरते सूचनाएं सार्वजनिक करने से लोगों का विश्वास कमजोर हो सकता है, जिसका असर बैंकिंग कारोबार पर होगा। पूरा बैंकिंग कारोबार ग्राहकों के भरोसे पर ही कायम है। किसी बैंक या वित्तीय संस्थान पर भरोसा डगमगाने की स्थिति में उसके ग्राहक घबराहट में अपनी सारी जमा रकम निकाल सकते हैं। बैंकर भी आरबीआई के निरीक्षकों के साथ जो बातें साझा करते हैं वे सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध होनी चाहिए। आरबीआई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान जरूर करना चाहिए, लेकिन एक लक्ष्मण रेखा तो खींचनी होगी और आरटीआई कानून भी संवेदनशील विषयों की गोपनीयता भंग करने का हथियार नहीं बनना चाहिए। इसका एक तरीका बैंकिंग नियमन अधिनियम या आरटीआई कानून में संशोधन हो सकता है।

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