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सोशल मीडिया पर बवाल

संपादकीय /  May 26, 2021

इंस्टैंट मेसेजिंग सर्विस, व्हाट्सऐप ने नए सोशल मीडिया मध्यवर्ती नियमों को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। व्हाट्सऐप का दावा है कि सेवा प्रदाताओं को किसी पोस्ट को सबसे पहले जारी करने वाले की पहचान करने पर मजबूर करने वाला प्रावधान असंवैधानिक है और निजता का उल्लंघन करता है। सरकार ने तुरंत स्पष्ट किया कि वह 'निजता के अधिकार' का सम्मान करती है और इसका उल्लंघन करने का उसका कोई इरादा नहीं है। सरकार ने नए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को उचित ठहराते हुए कहा कि 'निजता का अधिकार' समेत कोई मूलभूत अधिकार, अपने आप में संपूर्ण नहीं है और उस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी अतीत में ऐसा कह चुका है। दिक्कत यह है कि भारत में 50 लाख से अधिक उपयोगकर्ताओं वाले हर ऑनलाइन मंच पर लागू नए नियम बिना समुचित सार्वजनिक विमर्श के घोषित किए गए। दूरगामी प्रभाव वाले नियमों के अनुपालन में समय लगता है। इस मामले में केवल तीन महीने का समय दिया गया जबकि यूरोपीय संघ में डेटा संरक्षण नियम के लिए दो वर्ष का समय दिया गया था। सरकार ने सोशल मीडिया दिशानिर्देशों को लागू करने  के संबंध में प्राय: पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी नहीं पेश किए। नए नियमों की ज्यादा तादाद की भी आलोचना की गई है जबकि आमतौर पर ऐसा कानूनी रास्ते से ही किया जाता रहा है। मसलन सर्वोच्च न्यायालय ने विशिष्ट निजता कानून की अनुशंसा की थी, खासकर डिजिटल क्षेत्र में।

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बी एन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली समिति ने 2018 में निजता और डेटा संरक्षण कानून का मसौदा जारी किया था। मसौदे को व्यापक संशोधनों के बाद कैबिनेट के समक्ष पेश किया गया लेकिन वह कभी संसद में पारित होने नहीं भेजा गया। भारत में विशिष्ट निजता कानून नहीं है। सोशल मीडिया मंचों के अलावा नए नियम स्लैक, जूम, लिंक्डइन, यूट्यूब और मुख्यधारा की समाचार साइटों पर भी लागू होते हैं जहां पाठकों की टिप्पणियां दर्ज होती हैं। नए नियमों के अनुसार यदि किसी सामग्री पर सरकार को आपत्ति है तो उसे नोटिस के 36 घंटे के भीतर हटाना होगा। सभी मंचों को एक स्थानीय शिकायत अधिकारी, मुख्य अनुपालन अधिकारी और प्रमुख संपर्क व्यक्ति की भारत में तैनाती करनी होगी। अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि 25 मई तक अनुपालन नहीं करने वाली कंपनियों का वैधानिक संरक्षण समाप्त हो जाएगा। अब तक कोई कंपनी आपत्तिजनक सामग्री के लिए जवाबदेह नहीं होती थी। व्हाट्सऐप तथा अन्य इंस्टैंट मेसेजिंग सर्विस ऐंड टु ऐंड इनक्रिप्शन का इस्तेमाल करती हैं जहां भेजने वाला और पाने वाला ही संदेश पढ़ते हैं। सरकार के अनुरोध पर सबसे पहले संदेश भेजने वाले की पहचान करने के लिए यह इनक्रिप्शन खत्म करना होगा।

कई विधि विशेषज्ञों का कहना है कि इससे निजता का हनन होगा। यह भी कहा गया है कि आईटी रूल 2021 आईटी अधिनियम के दायरे के बाहर जाते हैं और अधीनस्थ कानून ऐसा नहीं कर सकते। उपयोगकर्ता की पहचान उजागर करने वाले प्रावधान केवल एकदलीय सत्ता वाले देशों में ही हैं। माना जा रहा है कि यह झूठी खबरों की रोकथाम में मददगार होगा लेकिन इसका दुरुपयोग राजनीति विरोधियों और सरकार के प्रतिकूल सामग्री को दबाने के लिए होने की आशंका है।

सरकार की आलोचना करने वाले ट्विटर और फेसबुक अकाउंट को प्रतिबंधित करने की हालिया कोशिशों के बाद यह संभव है। वाक् स्वतंत्रता के रक्षक के रूप में ऑनलाइन मंचों का संरक्षण अहम है। यानी नफरत फैलाने वाले भाषणों के नियमन और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच बारीक संतुलन कायम करना होगा ताकि यह पारदर्शी भी रहे और मूल अधिकारों का संरक्षण भी हो। नए नियम सरकारी अधिकारियों को सर्वोच्च अधिकार देते हैं। बेहतर होगा सरकार एक स्वतंत्र संस्थागत ढांचा तैयार कर विश्वास की कमी दूर करे।

Keyword: सोशल मीडिया, बवाल, व्हाट्सऐप, उच्च न्यायालय, चुनौती, पोस्ट,
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