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मुद्रा भंडार का प्रयोग अब नहीं तो कब?

गुरबचन सिंह /  May 25, 2021

यह सही है कि बीते एक दो सप्ताह में देश के शहरी इलाकों में हालात कुछ सुधरे हैं लेकिन ज्यादातर हिस्सों में अभी भी चिकित्सा की दृष्टि से बहुत खराब स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं?

समस्या के हल का एक तरीका यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास मौजूद भारी भरकम मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किया जाए। इस भंडार की सहायता से न केवल सूक्ष्म-वित्त संकट से निपटा जा सकता है बल्कि चिकित्सकीय संकट समेट किसी भी संकट में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेकिन कैसे?

देश में अभी भी कोविड-19 से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति आवश्यक है। इन वस्तुओं में ऑक्सीजन, ऑक्सीजन सिलिंडर, ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर, कामचलाऊ अस्पताल और नर्सिंग होम तथा खासतौर पर गहन चिकित्सा इकाई, विभिन्न दवाएं, तरह-तरह के चिकित्सकीय उपकरण और टीकों की आवश्यकता है ताकि देश में इस महामारी के प्रसार और गंभीरता पर लगाम लगाई जा सके।

हमारी समस्या है तत्काल जरूरी चीजों की घरेलू उपलब्धता न हो पाना। एक देश के रूप में हमारी समस्या यह नहीं है कि हम जरूरी आयात के लिए भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आरबीआई के पास मुद्रा भंडार की कोई कमी नहीं है। और चूंकि आरबीआई का संबंध भारत सरकार से है इसलिए वह मामले को पूरी तरह राज्य सरकारों पर भी नहीं छोड़ सकती है।

केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट के संदर्भ में 'भंडार' शब्द का इस्तेमाल दो तरह से किया जा सकता है। पहला, इसके एक हिस्से को विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में बरता जा सकता है तो दूसरी ओर पूंजी भंडार होता है जो प्रभावी तौर पर बैलेंस शीट की देनदारियों की ओर इक्विटी पूंजी के अतिरिक्त होता है। ये भंडार बचे हुए मुनाफे को एकत्रित करने से बनते हैं।

आरबीआई प्राय: फॉरेक्स रिजर्व और घरेलू सरकारी बॉन्ड में इनका पुनर्निवेश करता है। मौजूदा हालात में दोनों तरह के भंडारों का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। यह कैसे हो? इसके मॉडल बहुत साधारण हैं।

इस वर्ष आरबीआई की ओर से भारत सरकार को असाधारण लाभांश चुकाने दीजिए। इससे आरबीआई का पूंजी भंडार कम होगा और उसके साथ सरकार का नकदी संतुलन बेहतर होगा। भारत सरकार इस फंड को आरबीआई से विदेशी मुद्रा हासिल करने में व्यय कर सकती है और इसे आयात पर खर्च कर सकती है ताकि घरेलू जरूरतों को तत्काल पूरा किया जा सके।

अंतत: इससे आरबीआई की बैलेंसशीट में दो बदलाव आएंगे। पहला तो यह कि परिसंपत्ति के मोर्चे पर विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा जबकि दूसरा यह कि देनदारी के मोर्चे पर पूंजी भंडार में कमी आएगी।

ध्यान रहे कि यहां दिए गए नीतिगत सुझाव के परिणामस्वरूप आरबीआई और भारत सरकार के नकदी संतुलन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। शुरुआत में इसमें इजाफा होगा लेकिन आगे चलकर गिरावट भी देखने को मिलेगी।

आरबीआई के साथ बैंकर्स जमा, मुद्रा, राजकोषीय घाटे या आरबीआई के पास मौजूद सरकारी बॉन्ड पर भी इसका कोई असर देखने को नहीं मिलेगा। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों पर भी शायद ही कोई असर हो। विनिमय दर भी इससे अप्रभावित रहेगी क्योंकि विदेशी विनिमय की आपूर्ति और मांग दोनों में इजाफा होगा।

आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार 7 मई, 2021 को 589.465 अरब डॉलर के विशाल स्तर पर था। इस संदर्भ में देखें तो विदेशी मुद्रा भंडार की तुलना में अल्पावधि के बाहरी ऋण का अनुपात दिसंबर 2020 में पहले ही घटकर 17.7 फीसदी हो चुका है।

विदेशी मुद्रा भंडार के भारी आकार में मौजूद होने के कारण भारत इसमेंं जब चाहे तब कमी कर सकता है। वैसे भी मौजूदा हालात में हमें संकट से निपटने के लिए बहुत अधिक विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत नहीं है। आरबीआई के भंडार केे एक हिस्से का उपयोग करके ऐसा किया जा सकता है।

अब बात करते हैं उस हिस्से की जिसे आरबीआई ने इस संदर्भ में 'अन्य देनदारियां एवं प्रावधान ' करार दिया है। नाम से ऐसा लगता है कि यह भंडार इसलिए सुरक्षित रखा गया है क्योंकि आरबीआई की परिसंपत्तियों की कीमत में उतार-चढ़ाव आ सकता है।

बहरहाल ऐसा अंकेक्षण पूरी तरह सही नहीं होता है क्योंकि आरबीआई के पास संरक्षित विदेशी मुद्रा और सोने का मूल्यांकन न केवल कीमतों में अल्पकालिक उछाल का परिचायक है बल्कि यह लंबी अवधि के दौरान धारित विदेशी मुद्रा और सोने के मूल्य मेंं कम स्थायी बढ़ोतरी का भी द्योतक है।

आरबीआई द्वारा उल्लिखित तथाकथित 'अन्य देनदारी और प्रावधान'  मेंं 30 जून 2020 को 15,61,621 करोड़ रुपये की राशि थी। यह राशि आरबीआई की कुल परिसंपत्तियों के 28.43 प्रतिशत के बराबर है। यह सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए आवंटित राशि का 78 गुना और एसीसी बैटरी स्टोरेज के विनिर्माण के लिए मंजूर पीएलआई योजना के लिए मंजूर राशि का 86 गुना है।

इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि आरबीआई की बैलेंस शीट में भारी भरकम प्रावधान को कम किया जाए। यदि हम किसी अन्य क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय में कमी नहीं कर सकते तो हमें इस मोर्चे पर कटौती करनी होगी।

(लेखक भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, नई दिल्ली के अतिथि प्राध्यापक हैं)

Keyword: मुद्रा भंडार, चिकित्सा क्षेत्र, रिजर्व बैंक, ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर, अस्पताल,
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