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मानव व्यवहार और सामाजिक संदर्भ

आर गोपालकृष्णन /  May 19, 2021


कॉर्पोरेट जगत हो या फिर सार्वजनिक जीवन, गलतियां तो होंगी। ऐसे में आपदा बन सकने वाली किसी गलती के बाद उठाया गया आपका कदम काफी अहम होता है। हो सकता है कि आपको यह अहसास ही न हो कि आपने कोई गलती की है लेकिन दूसरे लोग आपको सामाजिक संदर्भ के आईने में देखते हैं। न्यूरेमबर्ग के आरोपी ने अपनी गलती नहीं मानी लेकिन पूरी दुनिया ने दुखदायी हरकत के आधार पर ही उसे परखा।

कंपनियों में भी कुछ शर्मनाक नाकामियां घटती हैं। कई दशक पहले जब मैं पहली बार निदेशक बना था तो अपने मातहत की वित्तीय गड़बडिय़ां पता लगा पाने में नाकाम रहा था। इससे मेरे करियर को नुकसान पहुंचने के साथ मेरी कंपनी की प्रतिष्ठा भी धूमिल हो सकती थी। लेकिन मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैंने अपने मुख्य कार्याधिकारी एवं मुख्य वित्तीय अधिकारी से मदद मांग ली और उन्हें मेरी स्थिति का अंदाजा हो गया। अगले कुछ महीनों में हमने इस मामले को निपटा दिया लेकिन मैं अपने वरिष्ठ सहकर्मों के बीच खुद को अपमानित महसूस करता रहा। इतना जरूर है कि मैंने खुद को ज्यादा शर्मसार होने से बचा लिया।

जब 2001 के आसपास टाटा फाइनैंस में गड़बड़ी का पता चला तो खुद रतन टाटा ने ही इस मामले को उठाया। उन्होंने फौरन गलती मानी और मेरे सहकर्मी इशात हुसैन को बचाव कार्य में जुटने को कह दिया। इन अनुभवों ने मुझे इस बारे में सोचने को मजबूर किया है कि एक नेता को उस समय क्या करना चाहिए जब उसे अपने अधीन हो रही बड़ी गलती का पता चले।

स्विस मूल की अमेरिकी विद्वान डॉ इलिजाबेथ कब्लर रॉस ने जीवन के खतरे से जूझ रहे और मरणासन्न मरीजों के बरताव में पांच चरणों वाला एक पैटर्न होने की बात कही। पहला, बीमारी की चपेट में आने को नकारना। दूसरा, इस बात को लेकर गुस्सा होना कि आखिर मुझे ही यह बीमारी क्यों हुई? तीसरा, वार्तालाप में दूसरों पर दोष मढऩा और वैकल्पिक चिकित्सा उपायों के बारे में अंतहीन चर्चा करना। चौथा, सभी वैकल्पिक उपायों के नाकाम होने की आशंका देख अवसाद की स्थिति। पांचवां एवं अंतिम, बीमारी को मन से स्वीकार कर उसके इलाज की दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ाना। कूटबद्ध तरीके से इसे 'डंडा' का नाम दिया गया है। अफसोस की बात यह है कि गंभीर प्रयास करने के पहले ही शुरुआती चार चरणों में मरीज का काफी वक्त खराब हो जाता है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के हब्बल स्पेस टेलीस्कोप के साथ भी 1990 में हुआ हादसा कई सबक देता है। एक किताब आने के बाद आला दर्जे की तकनीकी टीम को यह पता चला कि हब्बल टेलीस्कोप को एक दोषपूर्ण आईने के साथ लॉन्च कर दिया गया है। करीब 1.7 अरब डॉलर की भारी लागत वाली इस परियोजना पर सबकी नजर टिकी थी लिहाजा मीडिया में भी खूब आलोचना हुई और मामले की जांच शुरू हो गई। पता चला कि गलती आईने का खाका बनाने में प्रयुक्त नल करेक्टर के समायोजन में थी। आश्चर्य की बात है कि आईने की यह गड़बड़ी पर्किन एमर संयंत्र में किए गए वेंडर परीक्षणों में भी नजर आई थी। समीक्षा बोर्ड ने इस पर अचरज जताया कि परियोजना की चतुर तकनीकी टीम ने इन खामियों पर पहले जोर क्यों नहीं दिया?

उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि अत्यधिक दबाव वाले कार्यक्रम एवं बजट दबावों के चलते हर किसी का ध्यान तेजी से आगे बढऩे पर ही लगा था। अपने ठेकेदारों पर नासा का शिकंजा काफी ज्यादा रहा है। अगर वेंडर नतीजों को तर्कसंगत नहीं बता पाते तो फिर वे गलती की भी रिपोर्ट नहीं दे सकते थे। ठेकेदार अक्सर लगने वाली लताड़ से आजिज आ चुके थे। यही कारण है कि टेलीस्कोप में आईने को समायोजित करने से जुड़ी एक छोटी गलती हजारों समर्पित लोगों की मेहनत एवं उपलब्धियों पर भारी पड़ी। लेकिन इस मामले में जो आगे हुआ, वह एक बड़ा सबक लेकर आया। समीक्षा बोर्ड ने इसे नेतृत्व की असफलता माना, न कि एक तकनीकी नाकामी।

एक नेता के तौर पर नासा के खगोल-भौतिकी निदेशक चाल्र्स पेलेरिन ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की और नासा से हट गए। फिर वह एक बिज़नेस स्कूल से जुड़ गए और इस सवाल पर शोध करने लगे कि प्रबंधन में सामाजिक संदर्भ किस तरह एक घटक होता है? पेलेरिन और कुछ अन्य विद्वानों ने एक टीम निर्माण प्रक्रिया विकसित की जो टीम के सदस्यों को एक-दूसरे को समझने एवं सामाजिक संदर्भ परखने में मदद करती है। लोगों के परिपक्व समूह संस्कृति एवं टीम परिवेश के प्रभाव को समझते हैं और इन नरम संकेतकों को मापने एवं इन पर नजर रखने के तरीके ईजाद करते हैं। ये संकेतक नवाचार समेत हर चीज को प्रभावित करते हैं।

हब्बल टेलीस्कोप जैसे हादसे सार्वजनिक जीवन में भी घटित होते हैं। हो सकता है कि उनके सामाजिक संदर्भ अलग हों लेकिन संदर्भ की भूमिका बहुत बड़ी होती है।

माइकल लुइस की किताब 'द प्रीमनिशन' कोविड महामारी से निपटने के ट्रंप प्रशासन के तौर-तरीकों का विवरण देती है। अमेरिका में संचारी रोग विभाग के निदेशक रॉबर्ट रेडफील्ड जैसे राष्ट्रपति-नामित शख्स को नए प्रशासन में हटा दिया जाना आसान है लेकिन संक्रामक रोग संस्थान के निदेशक एंटनी फाउची जैसे सक्षम लोक सेवक को हटा पाना मुश्किल है। वहीं भारत में इसका ठीक उलटा है। संवैधानिक रूप से  नियुक्त किसी शख्स (मसलन, मुख्य निर्वाचन आयुक्त या नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) को हटा पाना मुश्किल है लेकिन एक लोक सेवक के खिलाफ कदम उठाना आसान है। यही कारण है कि भारत के अफसरशाह एवं वैज्ञानिक भी छोटे पालतू कुत्ते (लैपडॉग) ही साबित होते हैं।

कई संकट तकनीकी होने के बजाय नेतृत्व की नाकामी की उपज होते हैं। नेता एक एजेंडा पर इतनी शिद्दत से काम करते हैं कि वे अपनी टीम के सामाजिक संदर्भों का हिस्सा ही नहीं बन पाते हैं। सहज विनम्रता एवं संवेदना की एक खुराक अपमान के भाव को दूर कर सकती है। फिर अनुचित कोविड बर्ताव का एक नेतृत्व प्रदर्शन भी देखने को मिला है। बेपरवाह एवं सोचे-समझे अद्र्ध-सत्य पेश किए गए। मीडिया, अदालतों, नेताओं, अफसरशाहों, वैज्ञानिकों एवं अर्थशास्त्रियों की त्वरित टिप्पणियों ने जनमत के घड़े को मथ दिया।

नेतृत्व की असफलता को तो सतही तौर पर भी नहीं स्वीकार किया गया है। उद्देश्यपूर्ण कार्रवाई की रफ्तार सुस्त एवं अव्यवस्थित रही है। कोविड महामारी की भयावहता का स्तर अप्रत्याशित रूप से बहुत ज्यादा रहा है लेकिन टीकाकरण कार्यक्रम को लगातार नजरअंदाज किया जाना 'टीका उत्सव' जैसे आयोजन से काफी अलग है। हालांकि बदनाम एवं उपेक्षित नागरिक समाज समूहों के तौर पर गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक-सामुदायिक-सांस्कृतिक संगठनों की प्रतिक्रिया काफी शानदार रही है।

तमाम राय इस पर आधारित है कि कोविड की दूसरी लहर में मची तबाही क्या प्रकृति की अनिश्चितता, नियोजन की नाकामी या सिर्फ हेकड़ी दिखाने की वजह से हुई है? हालांकि नेता अगर विनम्रता से अपनी गलती मान लें तो मौजूदा कदमों को भी कम सख्त माने जाने का मौका हो सकता है। वैसे मुझे मालूम है कि महामारी का दंश झेल रहे तमाम परिवार ऐसा नहीं कहेंगे।
(लेखक कॉर्पोरेट सलाहकार हैं। वह टाटा संस के निदेशक एवं हिंदुस्तान यूनिलीवर के वाइस- चेयरमैन रह चुके हैं)

Keyword: मानव व्यवहार, सामाजिक संदर्भ, करियर, रतन टाटा, मीडिया,
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