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कोविड-19 की दूसरी लहर और मोदी का भारत

कनिका दत्ता /  May 18, 2021

हिंदू मध्य वर्गीय भारत का एक बड़ा तबका जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुखर भक्त्त हुआ करता था, वह अचानक तीक्ष्ण आलोचकों में तब्दील हो गया है। इस मोह भंग का बतौर प्रधानमंत्री उनके अब तक के कार्यकाल से कोई संबंध नहीं है। जब आर्थिक वृद्धि बुरी स्थिति में पहुंची, बेरोजगारी ने नई ऊंचाइयां तय कीं, सन 2014 और 2019 के बीच जब समाज में धु्रवीकरण अप्रत्याशित रूप से बढ़ा तब भी उनका मोहभंग नहीं हुआ। सन 2020 में जब अत्यंत कठोर देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान लाखों प्रवासी श्रमिक पैदल अपने घरों को लौट रहे थे तब भी मोदी की लोकप्रियता प्रभावित नहीं हुई। जो कुछ हुआ उससे उनके समर्थक प्रभावित नहीं हुए। 

मौजूदा मोहभंग की वजह है मौजूदा झटका जो देश के तमाम अन्य लोगों के साथ जोशीले बहुसंख्यक शहरियों को भी झेलना पड़ रहा है। अब त्रासदी उनके घर भी आ रही है। कोविड-19 की दूसरी लहर में उन्हें भी अपने परिजन, मित्र और सहकर्मी गंवाने पड़ रहे हैं। उन्हें भी अस्पताल में बिस्तरों, ऑक्सीजन, दवाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है और विश्राम स्थलों में अंतिम संस्कार के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। 

कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में कमजोर पडऩे के साथ ही मोदी का रसूख भी गायब होता नजर आ रहा है। अब मुख्यधारा का मीडिया और सरकार द्वारा प्रताडि़त तबका दोनों जमकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं। ऐसा तब हो रहा है जबकि यह सरकार अपने आलोचकों को खामोश करने के लिए कुख्यात है। सरकार के सहयोगी रहे एक मीडिया चैनल के कुछ कर्मचारी जिन्होंने पहले कभी पूर्वग्रह से ग्रस्त कवरेज को लेकर सवाल नहीं किया, उन्होंने अब चैनल के एंकरों को एक पत्र लिखकर शिकायत की है कि लीपापोती की जा रही है। सेंट्रल विस्टा के निर्माण को आज ऐसे देखा जा रहा है जैसे मोदी नीरो के समान लोगों के कष्टï की अनदेखी कर रहे हों। 

हकीकत तो यह है कि स्वास्थ्य सेवा ढांचा जिस प्रकार चरमराया हुआ है वह तो घटित होना ही था फिर चाहे सत्ता में मोदी होते या कोई और होता। प्रति 10,000 आबादी पर पांच बिस्तरों का अनुपात दुनिया में सबसे खराब अनुपात में से एक है। यह मोदी द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को निजी क्षेत्र के लिए त्याग देने से काफी पहले से ऐसा ही है। अब तक इस निजीकरण को लेकर चिंताएं उदार मीडिया तक सीमित थीं लेकिन जो हालात बने हैं उनमें पूरी दुनिया की निगाह भारत में स्वास्थ्य की स्थिति पर है। 

कुंभ मेले का आयोजन रद्द करके लाखों जोशीले हिंदुओं की नाराजगी मोल लेने के लिए किसी भी वैचारिकी वाले सत्ता प्रतिष्ठान को असाधारण साहस की जरूरत पड़ती। लेकिन बात यह है कि अगर कोई यह जुआ खेल सकता था तो वह मोदी ही हैं। उनके तमाम गलत कदमों के बावजूद उनकी लोकप्रियता न केवल बरकरार रही बल्कि बढ़ी है। यही कारण है कि उनका कुंभ मेला रद्द करने में देरी करना समझ में नहीं आता। क्या उन्हें अपने समर्थकों पर संदेह है? या फिर उन्हें लगता है कि बहुत स्थायी और गहराई लिए नहीं है।

उदारवादी सोच वाला कोई व्यक्ति यह भी पूछ सकता है कि कथित रूप से इतना शानदार प्रशासक होने और सफाई को लेकर इतना चिंतित रहने के बावजूद गत वर्ष कोविड-19 के आगमन के तत्काल बाद स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे की समस्या का तत्काल निराकरण करने का प्रयास क्यों नहीं किया? इस क्षेत्र में अगर सार्वजनिक चिकित्सालय और स्वास्थ्य ढांचा बनाने का प्रयास किया जाता तो इसका वैसा ही असर होता जैसा कि हमें सड़क और राजमार्ग निर्माण में देखने को मिला है। परंतु तब तक तो मोदी कोरोना वायरस पर जीत की घोषणा भी कर चुके थे और लोगों ने उन पर यकीन किया। हरिद्वार में भारी भीड़ स्नान कर रही थी और चुनावी रैलियोंं में भी ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रहा था। दूसरी लहर जो पहली लहर की तुलना में कई गुना अधिक संक्रामक थी, उसके बारे में मिल रही शुरुआती चेतावनियों की अनदेखी कर स्टेडियम का नाम बदलने और चुनाव जीतने में ऊर्जा लगाई गई। 

मोदी की प्राथमिकताएं हमेशा से अप्रत्यक्ष रही हैं। किसी भी राजनेता के लिए अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ती बेरोजगारी प्राथमिकता होती। खासतौर पर तब जबकि ये दोनों नोटबंदी जैसे उसी नेता के प्रयोग से उत्पन्न हुई हों। परंतु इन पर ध्यान देने के बजाय मोदी ने जीएसटी पेश कर दिया जिसने छोटे और मझोले उपक्रमों को बहुत बड़ा झटका दिया। राज्यों को गोकुशी करने वाले कसाई खाने बंद करने के आदेश ने मुस्लिम पशुपालन कारोबार और मांस तथा चमड़ा उद्योग में काम करने वाले लोगों की आजीविका को संकट में डाल दिया। गरीब परिवारों को गैस सिलिंडर का वितरण और जन धन खाते जैसी योजनाएं चुनावी लाभ से प्रेरित थीं और ये मोटे तौर पर अमेरिका के सब प्राइम संकट जैसी साबित हुईं जहां अमेरिकी बैंकों ने गरीब और मध्य वर्गीय अमेरिकियों को ऋण दिया जो वे चुका नहीं सके।

मोदी की सत्ता में वापसी के बाद भी वही सिलसिला जारी रहा। अर्थव्यवस्था डूब रही थी लेकिन वह मंदिर बनाने, अपने लिए नया आवास बनाने, बिना जनता को बताये जम्मू कश्मीर का दर्जा बदलने और अत्यंत कठोर लॉकडाउन लगाने में व्यस्त रहे। उन्होंने नागरिकता कानून में संशोधन किया ताकि अधिक से अधिक मुस्लिमों को बाहर रखा जा सके। उनकी सरकार ने किसानों से विमर्श किए बिना कृषि कानून पारित किए। जब महामारी ने हमला किया तो उन्होंने देश से थाली बजाने, बिजली बंद करने और दीये जलाने को कहा। अब वह किसी तरह बचे रहने के लिए पिछली सरकार की उस ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का सहारा ले रहे हैं जिसकी वे आलोचना करते थे। यह ऐसे नेता की तस्वीर नहीं है जो देश की बेहतरी के लिए चिंतित हो। उनका शासन व्यक्तिगत और राजनीतिक एजेंडा पूरा करने वाला है।

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