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औद्योगिक क्रांतियों में पिछड़ा क्यों है भारत?

अजित बालकृष्णन /  05 10, 2021

यदि आप भारत में पैदा हुए, पले-बढ़े और शिक्षित हुए हैं तो इस बात की काफी संभावना है कि 'मैनचेस्टर' शब्द आपके मन में ब्रिटिश उपनिवेशवाद और भारत के शोषण की तस्वीरें खींच दे। आखिर मैनचेस्टर ही वह शहर था जो भारत से कपास आयातित कर बुनाई और कताई मशीनों की मदद से उसे कपड़े में तब्दील करता और फिर वही कपड़ा भारतीयों को बेच दिया जाता। इस पूरी प्रक्रिया में भारत के बुनकर बेरोजगार हुए और भुखमरी के शिकार भी। महात्मा गांधी ने इन्हीं मशीनों के खिलाफ तो ब्रिटिश राज विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी जो अंतत: भारत की आजादी का सबब बना। इन मशीनों और इनके फलने फूलने का केंद्र बने मैनचेस्टर शहर में आखिर ऐसी कौन सी खूबी थी जिसकी सराहना की जाए?

शायद अब वक्त है कि हम अपने चश्मे बदलें और 18वीं सदी के आखिर में इंगलैंड में और खासकर मैनचेस्टर में होने वाली गहन गतिविधियों को एक नई दृष्टि से देखें। यही वो गतिविधियां हैं जिन्हें इतिहासकारों ने बाद में 'पहली औद्योगिक क्रांति' का नाम दिया और इससे जुड़े सर्वथा नए प्रश्न पेश किए। उदाहरण के लिए कताई और बुनाई की इन मशीनों का अविष्कार मैनचेस्टर में ही क्यों हुआ और किसी भारतीय शहर में क्यों नहीं? जबकि उस समय भारत कपास का सबसे बड़ा उत्पादक देश हुआ करता था। इसके साथ ही क्या यह सवाल पूछना उचित नहीं होगा कि आखिर क्यों अमेरिका की सिलिकन वैली मौजूदा चौथी औद्योगिक क्रांति के सारे लाभ और समस्त प्रतिष्ठा हासिल कर रही है। समाज में यह क्रांति कंप्यूटरों, इंटरनेट, कृत्रिम मेधा आदि की वजह से आई है। अब ऐसा वक्त नहीं है कि पुरातनकाल में गणितीय सोच का गढ़ रहा भारत इस नई विश्व व्यवस्था में भी इस क्षेत्र में अगुआ बना रहेगा।

पहले बात करते हैं प्रथम औद्योगिक क्रांति की। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1650 के दशक के आसपास इंग्लैंड को भारत के सूती वस्त्र से परिचित कराया। यानी पहली औद्योगिक क्रांति से आधी सदी पहले। सूती का यह वस्त्र वहां तेजी से लोकप्रिय हो गया क्योंकि यह पहनने और धोने में अत्यंत सुविधा जनक था। इससे पहले वहां ऊनी कपड़े प्रयोग में लाए जाते थे। सूती वस्त्र की लोकप्रियता इतनी ज्यादा बढ़ी कि ईस्ट इंडिया कंपनी के कुल कारोबार में तीन चौथाई हिस्सा सूती वस्त्र निर्यात का हो गया। इस बात से चिंतित स्थानीय ब्रिटिश उत्पादकों ने सरकार के साथ लॉबीइंग की और सन 1721 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय सूती वस्त्र पर प्रतिबंध लगा दिया। सूती कपड़े की मांग ही पहली औद्योगिक क्रांति के दौरान हुए अविष्कारों की सबसे बड़ी उत्प्रेरक बनी।

ब्रिटिश अर्थव्यवस्था की दूसरी अहम विशेषता भी ध्यान देने लायक थी और वह थी प्रथम औद्योगिक क्रांति की प्रमुख मशीनों के मूल अविष्कारक। जेम्स हारग्रीव्स ने स्पिनिंग जेनी का अविष्कार किया था जो सूती कपड़े की कताई करने वाली मशीन का इंजन था। सन 1770 में इस मशीन के लिए पेटेंट हासिल किया गया। जी हां ध्यान से पढि़ए: सन 1770 में इसका पेटेंट हासिल किया गया। पूरा किस्सा इस प्रकार है: सूती कपड़े का एक अन्य देश से आयात करके इसकी मांग तैयार की जाती है। इसके पश्चात आयात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। स्थानीय उद्यमी इस अवसर से आकर्षित हुए और उन्होंने सूती कपड़े की कताई और बुनाई करने वाली मशीनें तैयार कीं ताकि बढ़ती हुई मांग को पूरा किया जा सके। उनमें इसकी होड़ मच गई क्योंकि उनके अविष्कार को सरकार की ओर से पेटेंट संरक्षण मिलता। उस समय भारत के किसी हिस्से में पेटेंट संरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। हमें देश का पहला पेटेंट अधिनियम सन 1911 में औप्निवेशिक ब्रिटिश शासन में मिला। एक बार जब आप ये तथ्य जान जाते हैं तो शायद आप इस बात को लेकर चकित नहीं हों कि आखिर पहली औद्योगिक क्रांति के अविष्कार इंगलैंड में क्यों हुए भारत में क्यों नहीं। किसी मशीन या उपकरण को बनाने का क्या मतलब है अगर दूसरा व्यक्ति आसानी से उसकी नकल कर सकता हो?

अब इस कहानी का अगला हिस्सा। भारत बहुत पुराने समय से वैश्विक गणितीय नवाचारों का केंद्र रह चुका है। आप शायद जानते ही होंगे कि कंप्यूटर विज्ञान की प्रत्येक गणना के आधार यानी शून्य का अविष्कार भारतीय ब्रह्मगुप्त ने 638 ईस्वी में किया था। उन्होंने ही इसके इस्तेमाल के नियम बनाए। फिर ऐसा कैसे हुआ कि अमेरिका जैसे अपेक्षाकृत नए देश ने कंप्यूटर और इंटरनेट क्रांति को जन्म दिया? इंटरनेट के उदय का मूल सन 1960 के दशक में अमेरिकी सेना द्वारा चलाई गई 61 अरब डॉलर मूल्य एक परियोजना में निहित है। अमेरिकी सेना एक ऐसी प्रणाली विकसित करना चाहती थी ताकि तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा परमाणु क्षमता संपन्न विमानों से अचानक होने वाले हमले से बचाव सुनिश्चित कर सके। सन 1960 के दशक तक एसएजीई (सेमी ऑटोमेटिक ग्राउंड एन्वॉयरनमेंट) नामक एक प्रणाली बन चुकी थी और वह कंप्यूटरों की सहायता से शत्रु के आने वाले विमानों का पता लगाकर उचित सैन्य प्रतिक्रिया सुनिश्चित कर सकते थे। इस प्रणाली में 23 निर्देशन केंद्र थे जिनमें से प्रत्येक एक बड़े कंप्यूटर से जुड़ा था जो 400 विमानों पर नजर रख सकता था और मित्र विमानों तथा शत्रु के बमवर्षकों में भेद कर सकता था। इसका नाम था एआरपीएनेट। अनुमान है कि उस युग में अमेरिकी कंप्यूटर विज्ञान संबंधी शोध का 70 फीसदी अमेरिकी सैन्य स्वामित्व वाले एआरपीए द्वारा फंड किया जाता था।

अमेरिकी सेना और औद्योगिक जगत का रिश्ता और फंडिंग आज तक जारी है। गूगल के संस्थापक सर्जेई ब्रिन और लॉरेंस पेज द्वारा स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय में किया गया मूल शोध जिसका शीर्षक था 'द एनाटॉमी ऑफ अ लार्ज स्केल हाइपरटेक्स्टुअल वेब सर्च इंजन'अमेरिकी डिफेंस एडवांस्ड प्रोजेक्ट्स रिसर्च एजेंसी की फंडिंग से किया गया। रक्षा विभाग की ओर से ऐसी बड़ी फंडिंग अब तक जारी है। उदाहरण के लिए 21वीं सदी में क्लाडड कंप्यूटिंग तथा अन्य प्रौद्योगिकी का विकास।

भारत को वर्तमान सूचना क्रांति में नेतृत्वकारी स्थिति हासिल हो वह उपरोक्त अवसरों की तरह मूक दर्शक बनकर न रह जाए इसके लिए उसे क्या करना चाहिए?

(लेखक इंटरनेट उद्यमी है)

Keyword: औद्योगिक क्रांति, नवाचार, अविष्कार, मशीन, पेटेंट, कंप्यूटर,
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