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भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली सबके लिए करना व्यावहारिक नहीं

संजीव मुखर्जी /  May 09, 2021

बीएस बातचीत

सार्वजनिक वितरण प्रणाली लाभार्थियों में ज्यादा लोगों को शामिल करने या लाभार्थियों की संख्या घटाए जाने के बीच केंद्र ने कोविड राहत के तहत अतिरिक्त मुफ्त अनाज देने की घोषणा की है। संजीव मुखर्जी से बात करते हुए यूनाइटेड नेशंस वल्र्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफपी) के कंट्री डायरेक्टर बिशो पराजुली ने कहा कि तमाम समाजसेवी संगठनों ने पीडीएस को सार्वभौम किए जाने की मांग की है, यह संभवत: व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि हर नागरिक को सामाजिक सुरक्षा की जरूरत नहीं है। संपादित अंश..

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) सार्वभौमिक होना चाहिए या लक्षित? हाल में कवरेज में बदलाव को लेकर कई तरह की चर्चा होती रही है, आपके क्या विचार हैं?

देखिए, किसी भी सामाजिक संरक्षण व्यवस्था में जरूरतमंद को सहायता पहुंचाने का लक्ष्य होता है। पीडीएस को सबके लिए करने का मतलब है कि भारत के सभी नागरिकों को सब्सिडी वाला खाद्य मिलेगा। भारत में सभी को सामाजिक सुरक्षा की जरूरत नहीं है और ज्यादा कमजोर तबके के लिए सरकार इसका लक्षित इस्तेमाल करती है।  विश्व में कहीं भी, जहां इतनी बड़ी संख्या में मध्य वर्ग है, सरकारी समर्थन का सार्वभौमीकरण नहीं होता है। मौजूदा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भारत की करीब 67 प्रतिशत आबादी शामिल है। अगर क्रीमी लेयर को निकाल दें तो यह सार्वभौमिक ही है। जिन्हें इसकी जरूरत नहीं है, उस आबादी को बाहर कर सरकार इस धन का इस्तेमाल विकास की अन्य कवायदों के लिए कर सकती है।


नकदी बनाम अनाज वितरण के हिसाब से देखें तो भारत के संदर्भ में कौन सा मॉडल सही है?

नकदी या नकदी न देना चयन का मसला नहीं है। हस्तांतरण का विकल्प संदर्भ और औचित्य पर निर्भर है। भारत में अलग जनांकिकी, जलवायु की स्थिति और भौगोलिक स्थिति है। ऐसे में पूरे देश में नकदी संभवत: उचित व्यवस्था नहीं होगी। दूरस्थ इलाकों में जहां बाजार पूरी तरह काम नहीं करते, नकदी किसी काम का नहीं है। जब तक भारत को अतिरिक्त अनाज के इस्तेमाल का विकल्प नहीं मिल जाता, सरकार के दृष्टिकोण से नकदी न तो व्यावहारिक है और न उचित है।

क्या यह कहना उचित होगा कि  नकदी देना पोषण की समस्या का बेहतर समाधान करता है?

ऐगा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे भारत में इसे समर्थन मिलता हो। नकदी से लाभार्थी को इसके इस्तेमाल को लेकर विकल्प मिलता है, लेकिन इसके दुरुपयोग की भी संभावना रहती है। खाद्य और नकद हस्तांतरण कोविड के आर्थिक झटकों को कम करने के हिसाब से अहम हैं। आदर्श रूप में बेहतर यह होगा कि खाद्यान्न व नकदी का मिला जुला हस्तांतरण हो, जिससे भोजन में विविधता हो सकेगी और इसमें ताजी सब्जियों, फल, अंडे व अन्य खाद्य को शामिल किया जा सकेगा।


क्या कोविड-19 लॉकडाउन से भारत में पोषण का स्तर गिरा है?

मीडिया और अन्य जमीनी स्रोतों से लगता है कि कोविड लॉकडाउन से खाद्य व पोषण की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है क्योंकि दोनों लहर में खाद्य की उपलब्धता कम अवधि और दीर्घावधि के हिसाब से प्रभावित हुई है। आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है, जबकि उत्पादन की क्षमता प्रभावित हुई है, आजीविका गई है और लोगों की क्रय शक्ति कमजोर हुई है।


एक देश एक राशन कार्ड को लेकर आपकी क्या राय है?

एक देश एक राशन कार्ड बदलाव लाने वाली योजना है और भारत के लिए बेहतरीन कदम है। इससे भारत के नागरिकों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का दीर्घावधि असर होगा। इससे न सिर्फ विस्थापित होने वाली आबादी को लाभ होगा बल्कि किसी फी एनएफएसए लाभार्थी को देश के किसी भी सस्ते गल्ले की दुकान से खरीद की अनुमति मिल सकेगी। ऐसे में लाभार्थी अपनी सुविधा के मुताबिक जिले के भीतर या किसी दूसरे जिले से खरीद का विकल्प चुन सकेगा।

Keyword: सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अनाज, डब्ल्यूएफपी, बिशो पराजुली,
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