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जल शक्ति अभियान बरसों तक जारी रखने से ही स्थायी समाधान

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  04 20, 2021

सरकार ने पहली बार वर्षा जल संचयन अभियान-जल शक्ति अभियान के दूसरे चरण का सही समय पर प्रबंधन किया है। मॉनसून आने से काफी पहले अंतरराष्ट्रीय जल दिवस 22 मार्च को इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी और नवंबर के आखिर तक इसे जारी रखा जाना है। आम तौर पर मॉनसून के मौसम के दौरान मिट्टी और जल संरक्षण के उपाय किए जाते हैं, जो ऐसा करने के लिए अनुचित समय होता है। मॉनसून की शुरुआत से पहले जल धाराओं और जल धारण करने वाले तालाबों, झीलों तथा जलाशयों की साफ-सफाई, तलों की सफाई और उनके विस्तार जैसे कार्यों को पूरा करने की आवश्यकता होती है। मॉनसून से पहले का शुष्क मौसम वर्षा जल संग्रहण अवसंरचना के निर्माण या पुरानी अवसंरचना की मरम्मत और विस्तार के लिए भी उपयुक्त अवधि होती है। मॉनसून आने के बाद बारिश के कारण इन परियोजनाओं के काम को अक्सर रुकावटों का सामना करना पड़ता है। इस अभियान का उद्घाटन करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को बहुत ही उपयुक्त सलाह दी थी। उन्होंने कहा था, 'अपने वास्ते कोई योजना तैयार कराने के लिए इंजीनियरों का इंतजार मत करो। ग्रामीण अच्छी तरह से जानते हैं किजल संरक्षण और उपयोग की रणनीतियों को कैसे लागू किया जाए।' अगर इस विवेकपूर्ण सलाह को व्यवहार में लाया जाता है, तो यह आधिकारिक रूप से लागू की गई जिम्मेदारी के बजाय, लोगों द्वारा संचालित वर्षा जल संरक्षण कार्यक्रम बन जाएगा। प्रधानमंत्री का यह सुझाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में परंपरागत रूप से अपनाई जाने वाली जल-एकत्रीकरण और संरक्षण की प्रथाएं सबसे सक्षम होती हैं। ये राजस्थान और गुजरात के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सदियों से जिंदगी को बरकरार रखने तथा चेन्नई और बेंगलूरु जैसे पुराने शहरी केंद्रों की पानी की जरूरतों को पूरा करने में कामयाब रहे हैं। उनके प्रमुख घटक टंकी (घरों में), टंका (गांवों में) और समुदायों के लिए बावलियां तथा शहरी केंद्रों में प्राकृतिक रूप से विकसित झील और तालाब जैसे जल भंडारण ढांचे थे।

किस्मत से मौजूदा जल शक्ति अभियान का मूल उद्देश्य युगों-पुरानी अवधारणा-यथास्थान ग्रहण करना और वर्षा जल संरक्षित करने के अनुरूप है। यह इस अभियान के आदर्श वाक्य 'जहां और जब बारिश पड़े, उसे लपक लो।' में परिलक्षित होता है। यह पिछले नारे- 'खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में' को सही ढंग से तैयार किया गया संस्करण है। मृदा और जल विशेषज्ञों ने इसे खेतों और गांवों में गैर-मौसम की आकस्मिक जरूरत पूरा करने के लिए अधिशेष वर्षा जल भंडारण के सर्वोत्तम साधन के रूप में देखा था। वैज्ञानिकों ने कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए इस दृष्टिकोण की क्षमता का प्रदर्शन तक भी किया था। तथापि खेदजनक रूप से केवल कुछ राज्य ही वास्तव में इस अवधारणा को व्यवहार में लाए और वह भी केवल खेतों में। किसानों द्वारा वित्तीय सहायता का उपयोग अपने खेतों में छोटे तालाबों का निर्माण करने के लिए किया गया था ताकि अधिशेष वर्षा जल का संग्रहण किया जा सके और इसका इस्तेमाल फसलों की जीवन-रक्षक सिंचाई के लिए किया जा सके। फसल उत्पादकता में वृद्धि के लिहाज से इस कदम का उल्लेखनीय लाभ था। लेकिन ग्रामीण स्तर पर इसे बड़े पैमाने पर नहीं दोहराया जा सका था। समुदायों द्वारा संचालित और उनके स्वामित्व वाली परियोजनाओं की तुलना में व्यक्तिगत रूप से संचालित और नियंत्रित परियोजनाओं में इस तरह की विपरीत प्रतिक्रियाएं असामान्य बात नहीं होती। जल संरक्षण की आवश्यकता को सरकार के थिंक टैंक - नैशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (नीति) आयोग द्वारा लगाए गए मांग-आपूर्ति के भयावह अनुमानों से परखा जा सकता है। इसका मानना है कि करीब 60 करोड़ भारतीय पहले से ही पानी का 'अधिक से अत्यधिक' दबाव झेल रहे हैं। यह स्थिति और भी अधिक खराब होने वाली है, क्योंकि वर्ष 2030 तक पानी की मांग दोगुनी होने की संभावना है। लगभग 22 प्रतिशत भूजल या तो सूख चुका है या फिर गंभीर श्रेणी में है। सामान्य दृष्टिकोण के रूप में कारोबार के लिहाज से पानी से संबंधित कारकों के कारण देश वर्ष 2050 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग छह प्रतिशत भाग गंवा सकता है।

हालांकि जल की इस निराशाजनक दिखने वाली रूपरेखा में उम्मीद की किरण यह है कि यह अनुमानित कमी काफी हद तक उपलब्ध पानी के कुप्रबंधन का परिणाम है और इस वजह से इसके बेहतर प्रबंधन के जरिये इसे कम किया जा सकता है। कई मौसम विज्ञानी और जल विज्ञानी मानते हैं कि भारत स्वाभाविक रूप से पानी की कमी वाला देश नहीं है। पानी को अव्यवस्थित रूप से बहाने से ऐसा हुआ है। वास्तव में भारत दुनिया के दो सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्र-भूमध्यरेखीय पट्टी और मॉनसून क्षेत्र में स्थित है। देश की औसत वार्षिक वर्षा 117 से 120 सेमी है, जबकि वैश्विक औसत 100 से 110 सेमी है। लेकिन वर्षा जल का करीब 88 सेमी का बड़ा भाग केवल चार महीनों (जून से सितंबर) के मुख्य मॉनसून सीजन में ही पड़ता है। केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही सर्दियों की बारिश और बाकी साल में बर्फबारी के रूप में पड़ता है। अगर विवेकपूर्ण तरीके से प्रबंध किया जाए, तो पानी की यह मात्रा देश की वास्तविक जल आवश्यकताओं को पूरी करने में सक्षम होगी।

वर्तमान में गैर-मौसम में इस्तेमाल के लिए इस पानी के 10 से 20 प्रतिशत से अधिक भाग का सतह या भूमिगत जलीय चट्टानी पर्त में संचय और संग्रह नहीं किया जाता है। बाकी भाग बाढ़ का कारण बनकर, मृदा अपरदन करते हुए महासागरों में बेकार चला जाता है और अपने पीछे जलाशयों में तलछट जमा कर देता है। उपलब्ध वर्षा जल का दक्षतापूर्ण तरीके से उपयोग करने, उपयुक्त रूप से संरक्षण करने और जल जमा करने का स्तर बढ़ाने के लिए बड़े कदम उठाने की जरूरत है। मौजूदा जल शक्ति अभियान जैसी कभी-कभार वाली जल संरक्षण मुहिम पर्याप्त नहीं रहेगी। स्थायी परिणाम प्राप्त करने के लिए इस अभियान को वर्षों तक जारी रखने की आवश्यकता होगी।

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