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कारोबारी संचालन में कानून बनाम नैतिकता की बहस

कुशल नेतृत्व
आर गोपालकृष्णन /  April 18, 2021

हाल के दिनों में वैधानिकता बनाम नैतिकता को लेकर कुछ टिप्पणियां देखने को मिलीं। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष अजय त्यागी ने दुख प्रकट करते हुए कहा कि नियामक और स्वतंत्र निदेशक विभिन्न कंपनियों में प्रवर्तकों का प्रभाव कम करने में विफल रहे हैं। प्राय: देखने में आया है कि कानून और नैतिकता प्राय: सुसंगत और एकरैखीय नहीं होते। नियमों के अलावा हमें चरित्र बनाम नैतिकता के कठिन पहलू पर भी विचार करना होगा। इसके लिए कारोबारी प्रशासन के व्यवहार का अध्ययन करना आवश्यक है।

हाल ही में  नॉर्वे के पुलिस प्रमुख ने वहां की प्रधानमंत्री पर 20,000 नॉर्वेजियन क्राउन का जुर्माना लगाया क्योंकि उन्होंने लोगों के इकठ्ठा होने को लेकर सरकार के कोविड प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। जबकि कानून ऐसे जुर्माने की इजाजत नहीं देता। क्या आप भारत में ऐसा कुछ होने की कल्पना कर सकते हैं?

बोर्ड निदेशकों के पास न केवल न्यायिक सोच होती है बल्कि उन्हें इस बात का भी अंदाजा होता है कि क्या सही है और क्या गलत। विनम्रता सिखाई नहीं जा सकती। घटनाएं हमें यह सिखाती हैं। कानून बनाम नैतिकता की दुविधा कारोबारी संचालन को महज नियमों का पालन करने से अलग बनाती है। समाज नैतिकता को कई चश्मों से देखता है मसलन, संस्कृति, नेता का व्यवहार और न्याय व्यवस्था (पुलिस, न्याय प्रक्रियाएं और न्यायालय)। उदाहरण के लिए शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व भीड़ भरी चुनावी रैलियों में हिस्सा लेता है जहां उन नियमों का उल्लंघन किया जाता है जिनका पालन करने की वे सलाह देते हैं। गांधीजी ने विधि के अलावा नैतिकता को बहुत ऊंचा दर्जा प्रदान किया। देश में कुछ मंजूरियों के बाद सन 1975 से 1977 तक आपातकाल लागू था। बहरहाल, लोगों को लंबे समय से लगता रहा है कि आपातकाल सामान्य नहीं है। 45 वर्ष बाद दिसंबर 2020 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आपातकाल की संवैधानिक वैधता के परीक्षण पर सहमति जताई।

किसान विधेयक बिना संसदीय बहस के पारित कर दिए गए और इस दौरान प्रक्रियाओं का भी उल्लंघन किया गया। उन्हें अन्य विधेयकों के पारित होने में लगने वाले समय की तुलना में बहुत जल्दी पारित कर दिया गया। जब भी लंबित विवादों की सुनवाई होगी सर्वोच्च न्यायालय उनकी वैधानिकता बरकरार रख सकता है। परंतु इस दौरान लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं, इसे लेकर जनता का संदेह बरकरार रहेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिक और पद्म भूषण एस नंबी नारायणन को एक फर्जी जासूसी मामले में उस समय बेइज्जत किया गया जब वह अपने करियर में शिखर पर थे। उन्हें कितनी पीड़ा हुई होगी? आज से 25 वर्ष पहले मेरे खुलासे के बाद सेबी ने भेदिया कारोबार के मामले को छह वर्ष तक लंबित रखा और उसके बाद मुझे 13 पन्नों की एक रिपोर्ट मिली जिसमें लिखा था कि भेदिया कारोबार का कोई सबूत नहीं मिला। स्वाभाविक बात है कि मैं इस बात से काफी नाखुश और नाराज था।

अपनी पुस्तक फ्रैक्चर्ड फ्रीडम में कोबड घांडी बताते हैं कि वह 10 वर्ष तक जिन जेलों में रहे वहां की हालत कितनी दयनीय थी। देश के नागरिकों को आश्चर्य होता है कि क्या आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश के कैदियों को उन हालात से गुजरना पड़ता है जिनका सामना वीर सावरकर को औपनिवेशिक काल में करना पड़ा।

कानून और नैतिकता के बीच का संतुलन हमेशा ध्यान आकृष्ट करता है। नागरिक चाहते हैं कि न्याय कानून और नैतिकता दोनों का साथ दे। कई बार न्यायालय विधिक मसलों तक सीमित रहकर फैसले देते हैं तो वहीं दूसरे अवसरों पर वे कानून और नैतिकता के हवाले से ऐसा करते हैं। ऐसे में आम नागरिक से किस प्रकार की प्रतिक्रिया की आशा करनी चाहिए? लोग मानते हैं कि मौजूदा न्याय प्रणाली निष्पक्ष नहीं है या कहें तो वह अमानवीय है। इसे कौन ठीक करेगा? 'ब्राउन विंडोज' एक अपराधशास्त्रीय सिद्धांत है जहां आम नागरिक यह मानते हैं कोई न कोई उनकी टूटी हुई खिड़की ठीक कर देगा लेकिन वे यह नहीं जानते कि ऐसा कौन करेगा। यह हास्यास्पद है कि हमारे कानून मंत्री गंभीरतापूर्वक यह सुझाव दे सकते हैं कि भारत मध्यस्थता का वैश्विक केंद्र बन सकता है जबकि यहां के नागरिकों को लगता है कि हमारी व्यवस्था घरेलू स्तर पर भी न्याय देने में नाकाम हैं। ब्रोकेन विंडोज सिंड्रोम न्याय को प्रभावित करता है।

न्याय के सिद्धांत में इन बातों को भी शामिल किया जाना चाहिए। आखिर अन्याय को कम कैसे किया जाए और न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया में सुधार कैसे हो? चाल्र्स डिकेंस की पुस्तक ग्रेट एक्सपेक्टेशंस को उद्धृत करें तो, 'छोटी सी दुनिया में जहां आम आदमी का अपना अस्तित्व होता है, वहां अन्याय से ज्यादा गहराई से कुछ महसूस नहीं होता...हो सकता है नागरिक बहुत मामूली अन्याय के शिकार हों लेकिन वे खुद भी तो बहुत मामूली हस्ती वाले होते हैं, और उनकी दुनिया भी बहुत छोटी होती है...'

कारोबारी संचालन की बात करें तो सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी कंपनी के महत्त्वपूर्ण अल्पंाश हिस्सेदार भी बिना बहुलांश अंशधारक की सहमति के बोर्ड में जगह नहीं मांग सकते। यदि अल्पांश हिस्सेदार शेयरों का विरासती हिस्सेदार हो लेकिन प्रवर्तक समूह से उसे एकतरफा तरीके से बाहर किया गया हो तो क्या हो? येस बैंक और मुरुगप्पा समूह के मामलों पर नजर डालिए। यूनाइटेड ब्रुअरीज मामले पर विचार कीजिए जहां विजय माल्या बहुलांश हिस्सेदार के साथ एक अघोषित विधिक समझौते के कारण अभी भी गैर कार्यकारी अध्यक्ष बने हुए हैं जबकि भारतीय कानून की दृष्टि में वह भगोड़े घोषित हैं।

बोर्ड निदेशक सार्वजनिक कद के व्यक्ति होते हैं। वे समझदारी और बुद्धिमता का प्रदर्शन कर सकते हैं। वे समाज के लिए उदाहरण बन सकते हैं। स्वतंत्र निदेशकों को भी कोशिश करनी चाहिए कि कम से कम नैतिकता और कानून के बीच संतुलन कायम करने का प्रयास करें।

(लेखक कॉर्पोरेट सलाहकार  हैं। वह टाटा संस के निदेशक और हिंदुस्तान यूनिलीवर के वाइस चेयरमैन रह चुके हैं)

Keyword: कारोबारी संचालन, कानून, नैतिकता, सेबी, जुर्माना, प्रतिबंध,
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