बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक प्रबंधन की चुनौती
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आर्थिक प्रबंधन की चुनौती

संपादकीय /  March 10, 2021

अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन का प्रशासन आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए 1.9 लाख करोड़ डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है। कुछ माह पहले तक इतने व्यापक वित्तीय कार्यक्रम ने महामारी से त्रस्त अर्थव्यवस्था का भरोसा मजबूत किया होता। परंतु अब हालात तेजी से बदल चुके हैं: आर्थिक गतिविधियों में तेजी आ रही है और टीकाकरण के साथ ही मांग में वापसी के अनुमान ने मुद्रास्फीति बढऩे की आशंका को भी बल दिया है। 10 वर्ष अवधि वाले अमेरिकी सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल बढ़कर 1.5 फीसदी हो चुका है जबकि अगस्त 2020 में यह 0.5 फीसदी था। उच्च मुद्रास्फीति और बॉन्ड प्रतिफल में लगातार सुधार का व्यापक प्रभाव होगा। यह केवल अमेरिका को ही नहीं बल्कि भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को भी प्रभावित करेगा।

बहरहाल, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जीरोम पॉवेल और वित्त मंत्री जैनेट येलन ने मुद्रास्फीति की चिंता को नकारा है। येलन ने हाल ही में कहा कि ऐसी आशंका निर्मूल है। संभव है कि मुद्रास्फीति बहुत तेजी से न बढ़े लेकिन वित्तीय बाजारों का अनुमान इसके उलट है। हालांकि सन 2008 के वित्तीय संकट के बाद अधिकांश समय यह 2 फीसदी के तय लक्ष्य से कम रही है। कच्चे तेल समेत वैश्विक जिंस कीमतों में इजाफा हो रहा है। इसके अलावा नीतिगत अनिश्चितता भी बनी हुई है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक औसत मुद्रास्फीति लक्ष्य की ओर लौटा है यानी वह मुद्रास्फीति को कम से कम कुछ समय के लिए 2 फीसदी के तय लक्ष्य से ऊपर जाने देगा। वित्तीय बाजारों पर इसके असर के बारे में कोई स्पष्ट अनुमान नहीं है।

मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान को लेकर अनिश्चितता और अमेरिका में तुलनात्मक रूप से ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल का असर भारत में वित्तीय बाजारों और आर्थिक नीति प्रबंधन पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए यदि अमेरिका तथा अन्य बड़े बाजारों में मांग अनुमान से अधिक होती है तो निर्यात के अवसर बनेंगे। भारतीय नीतिगत प्रतिष्ठान इसका लाभ उठाए तो बेहतर होगा। अमेरिकी बाजार में उच्च प्रतिफल कमजोर पूंजी प्रवाह के रूप में भी सामने आएगा। इससे रुपये पर दबाव कम होगा और निर्यात में सुधार होगा। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने इस महीने एक अरब डॉलर मूल्य के बॉन्ड बेचे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक को 2020 में व्यापक हस्तक्षेप करना पड़ा ताकि अतिरिक्त विदेशी पूंजी की खपत की जा सके और मुद्रा पर दबाव कम किया जा सके। परंतु पूंजी का बहिर्गमन घरेलू बाजार में नकदी की तंगी पैदा करेगा। यह कमी ऐसे समय आएगी जब माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक भी 2020 के कुछ आपातकालीन उपाय वापस लेगा। ऐसे में केंद्रीय बैंक को यह सुनिश्चित करना होगा कि व्यवस्था में पर्याप्त नकदी रहे।

अधिक व्यापक तौर पर देखें तो विदेशी बचत की उपलब्धता में ज्यादा कमी से मुद्रा की लागत बढ़ेगी। मांग में सुधार से घरेलू वित्तीय बचत की उपलब्धता भी कम होगी। परिणामस्वरूप व्यापक राजकोषीय घाटे की भरपाई और निजी क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। इसके प्रतिफल के प्रबंधन के लिए रिजर्व बैंक द्वारा व्यापक मुक्त बाजार परिचालन मुद्रास्फीतिक दबाव बनाएगा। खासतौर पर ऐसे समय में जबकि जिंस कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे में मुद्रा की लागत में बढ़ोतरी न केवल आर्थिक सुधार के लिए जोखिम भरी होगी बल्कि ऋण भुगतान को भी मुश्किल बनाएगी। अनुमान है कि चालू वर्ष में कुल सार्वजनिक ऋण सकल घरेलू उत्पाद का 90 फीसदी हो जाएगा। उच्च ब्याज दर के साथ धीमी वृद्धि दर कर्ज के स्तर को लंबे समय तक बढ़ाए रखेगी। यह राजकोषीय नीति के लिए बड़ी बाधा साबित हो सकती है। ऐसे में जहां कोविड संकट का सबसे बुरा दौर बीत चुका है, निकट भविष्य में आर्थिक प्रबंधन चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।

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