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दो मोर्चों पर संघर्षविराम से मिले अवसर का लाभ उठाना उत्तम

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  March 07, 2021

चीन और भारत ने गत 10 और 11 फरवरी को कहा कि लद्दाख में पैंगोंग झील के पास 10 माह तक आमने-सामने बने रहने के बाद उनके सैनिक पीछे हटेंगे। दो सप्ताह बाद 24 फरवरी को भारत और पाकिस्तान की सेनाओं ने संषर्षविराम की घोषणा की। एक पखवाड़े के भीतर ही दो मोर्चों का संघर्ष, दो मोर्चों पर संषर्षविराम में बदल गया।

इस बीच अटकलें लगाई गईं कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के नए प्रतिष्ठान ने चीन और पाकिस्तान पर भारत के साथ तनाव कम करने के लिए दबाव बनाया होगा या फिर क्या यह घटनाक्रम चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच चुपचाप हुई चर्चा का नतीजा है? अमेरिका किसी भूमिका से इनकार कर रहा है। उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सीमित कर्मचारियों के साथ काम कर रही है और उसके पास पहले ही कई अहम काम हैं। बाइडन प्रशासन अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान को अहम मानता है और वह चाहेगा कि पाकिस्तान भारत के साथ तनाव बढ़ाने के बजाय अफगान शांति प्रक्रिया पर ध्यान लगाए। ऐसे में यकीनन बाइडन प्रशासन ने भारत-पाकिस्तान की संघर्षविराम वार्ता को प्रोत्साहन दिया होगा। खासतौर पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ के साथ पुराने संपर्क के चलते।

संघर्षविराम या सैनिकों के पीछे हटने से तनाव में कमी राहत की बात है, लेकिन ऐसे समझौतों के कभी भी टूटने का खतरा भी है। पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिक अभी भी उन जगहों पर काबिज हैं जहां गत अप्रैल तक भारतीय सैनिक गश्त करते थे। वास्तविक नियंत्रण रेखा के अतिक्रमण के चलते भारत और चीन की सेनाओं के बीच आपसी विश्वास को भारी नुकसान पहुंचा है।

भारत-पाकिस्तान सीमा पर लंबे संघर्षविराम की बात पर भी कोई शायद ही यकीन करेगा। तकनीकी रूप से 2003 में दोनों सेनाओं के सैन्य परिचालन महानिदेशकों द्वारा किया गया संषर्षविराम लागू है। इसके अलावा 2018 के दो अन्य संषर्षविराम भी लागू हैं। इनके बावजूद भारत का आरोप है कि बीते वर्ष पाकिस्तानी सैनिकों ने 5,133 बार गोलीबारी की। यानी रोजाना 14 से अधिक उल्लंघन किए गए जिनमें 46 भारतीय मारे गए। पाकिस्तान भारत पर इससे भी गंभीर आरोप लगाता है।

फिर भी भारत-पाकिस्तान सीमा पर संषर्षविराम आशान्वित करता है। ऐसे समय में जबकि चीनी सेना की हरकतों ने भारतीय सेना को 75,000 सैनिकों वाली चार टुकडिय़ां पाकिस्तान सीमा से हटाकर भारत-चीन सीमा पर तैनात करने पर विवश किया, तब पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय ने भारत की स्थिति का लाभ लेने की कोशिश नहीं की। बल्कि उसने संषर्षविराम के जरिये भारत को सामरिक आश्वस्ति दी। यह ऐसे समय हुआ जब कई भारतीय रणनीतिकार कह रहे थे कि पाकिस्तानी सेनाएं चीन के साथ मिलकर सियाचिन और दौलत बेग ओल्डी सेक्टर को अलग-थलग करने की कोशिश में हैं।

भले ही भारत बार-बार यह कहता रहा हो कि चीन भारत का सबसे बड़ा शत्रु है लेकिन ऐसी तमाम वजह हैं जिनके चलते पाकिस्तान के साथ लगी सीमा पर संषर्षविराम हमारे लिए चीन की सेना के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर संषर्षविराम से अधिक महत्त्वपूर्ण है। एक वजह तो यह है कि भारतीय सेना द्वारा चार टुकडिय़ां चीन सीमा पर स्थानांतरित करने के बावजूद केवल 14 टुकडिय़ां चीन सीमा पर हैं जबकि 22 अभी भी पाकिस्तान सीमा पर हैं। पाकिस्तान सीमा पर खूनखराबा भी बहुत अधिक होता है। भारतीय सेना यहां होने वाली गोलीबारी को जम्मू कश्मीर में फैली अशांति से जोड़कर देखती है क्योंकि आतंकवादी इस गोलीबारी की आड़ में घुसपैठ करते हैं। पाकिस्तान से लगी सीमा के निकट नागरिक भी बड़ी तादाद में रहते हैं इसलिए इन गांवों में जानें भी अधिक जाती हैं।

भारत और पाकिस्तान की जनता एक दूसरे को सबसे बुरा मानती है। ऐसे में संषर्षविराम की घोषणा ने दोनों पक्षों की सीमा पर लोगों का चौंकाया। हालांकि दोनों देशों की बातों से संकेत मिल रहा था कि ऐसा कुछ होने वाला है। इस माह के आरंभ में पाकिस्तानी वायु सेना अकादमी में पाकिस्तानी थलसेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा था कि सभी दिशाओं में शांति का हाथ बढ़ाने का वक्त है ताकि कश्मीर मसले को शांतिपूर्ण और सम्मानजनक ढंग से हल किया जा सके। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी संषर्षविराम से एक दिन पहले कोलंबो में कहा कि हमारा इकलौता विवाद कश्मीर है और उसे केवल संवाद से हल किया जा सकता है।

पाकिस्तान के साथ सैन्य-असैन्य समीकरण को देखते हुए मौजूदा हालात में संषर्षविराम केवल जनरल बाजवा की वजह से संभव हो सका है। जनरल परवेज मुशर्रफ के बाद के कार्यकाल की तरह बाजवा भी मानते हैं कि पाकिस्तान हमेशा भारत के साथ लड़ता नहीं रह सकता। फरवरी 2019 में बालाकोट हवाई हमले, उसी वर्ष अगस्त में जम्मू कश्मीर का राजनीतिक दर्जा बदले जाने जैसी बातों ने भी उनकी धारणा को मजबूत किया। अप्रैल 2020 के बाद भारत चीन की हरकतों से जिस तरह निपटा उसका भी इसमें योगदान है।

पिछले संषर्षविरामों का अनुभव बताता है कि केवल उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद से ही ऐसा संभव है। भारत-चीन सीमा पर सन 1980 के दशक के अंत से खामोशी थी क्योंकि संयुक्त कार्य समूह और विशेष वार्ताकार नियमित बातचीत करते थे। भारत और पाकिस्तान के बीच 2003 का संषर्षविराम वर्षों तक लागू रहा क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन ङ्क्षसह और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के विशेष प्रतिनिधि बातचीत करते रहे। ऐसे में संषर्षविराम कायम रखने के लिए उच्चस्तरीय राजनीतिक सहयोग जारी रहना चाहिए। भारत के पास हिचकने की वजह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े रुख ने भारत को कई अवसर दिए हैं जिनका लाभ वह बातचीत में ले सकता है। दो मोर्चों पर शांति से बने अवसर को आगे ले जाना चाहिए।

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