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अत्यंत जरूरी वक्त में अनुपस्थित है विपक्ष

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  03 07, 2021

गत सप्ताह इस विषय पर काफी बहस हुई कि क्या पत्रकार ऐसी बात कहने का जोखिम उठा सकते हैं जो मोदी सरकार को पसंद आने वाली न हों। मौजूदा सरकार को मीडिया इतना बड़ा खतरा लगने लगा है कि जून के दूसरे पखवाड़े में नौ महत्त्वपूर्ण मंत्रियों की सदस्यता वाले एक मंत्री समूह ने इस विषय पर कई बैठकें कर डालीं कि मीडिया से कैसे निपटा जाए?

यह वही समय था जब गलवान घाटी में चीन के साथ जंग जैसे हालात पैदा हो चुके थे, लाखों की तादाद में प्रवासी श्रमिक अपने सैकड़ों-हजारों किलोमीटर का सफर तय करके वापस अपने घर लौट रहे थे और देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे थे।

यदि आप मंत्री समूह द्वारा कथित तौर पर प्रस्तुत रिपोर्ट के 'लीक' दस्तावेज को पढ़ेंगे तो उसमें किसी विशेष खतरे का जिक्र नहीं है। बस यही लगता है कि उन पर गलत रंगों वाली पर्चियां चिपकाई जा सकती हैं। अब ये पर्चियां सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय या किसी अन्य विभाग के छापे के लिए होंगी या नहीं, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि किसी दस्तावेज में ऐसा नहीं लिखा होता। यदि आप मेरे जैसे आशावादी हों तो कह सकते हैं कि वाह! हम पत्रकार सरकार के लिए इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि महामारी और जंग जैसे हालात में भी आधा मंत्रिमंडल हमारे बारे में ही सोच रहा है।

सरकार पर सवाल उठाना हमेशा नुकसानदेह होता है, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो। बस हाल के समय में खतरा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। कह सकते हैं कि अब यह हमारे जीवन का अंग है। एक विकल्प यह भी रहता है कि आप सत्ता के साथ मित्रवत हो जाएं। दिक्कत तो यह है कि सरकार की आलोचना और विपक्ष से सवाल पूछना, दोनों ही परिस्थितियों में निशाना पत्रकार ही बनते हैं। तब कहा जा सकता है कि क्या स्वतंत्र प्रेस की यही भूमिका है कि सरकार के बजाय विपक्ष पर हमला करे? महीनों से मैं कांग्रेस पार्टी या राहुल गांधी के बारे में आलोचनात्मक तो दूर, नकारात्मक लिखने से भी बचता रहा हूं।

अब मैं इस सवाल के साथ मानो बारूद के ढेर पर चलने का जोखिम उठा रहा हूं: हम संस्थानों को कमजोर किए जाने की शिकायत कर सकते हैं, एजेंसियों के दुरुपयोग, सामाजिक और धार्मिक भेदभाव वाले कानूनों, देशद्रोह की धारा के इस्तेमाल या संसद से कानूनों को जबरन पारित कराने के खिलाफ बोल सकते हैं और मीडिया को लेकर मंत्री समूह के कदमों पर भी बोल सकते हैं लेकिन यदि कांग्रेस के पास लोकसभा में 100 और संप्रग के पास 130 से 150 सीटें होतीं तो क्या यह इतना आसान होता? एक लोकतांत्रिक देश में संस्थानों की प्रतिष्ठा, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक गारंटी की प्राथमिक जिम्मेदारी सत्ताधारी दल पर होती है। परंतु यह विपक्ष का भी प्राथमिक दायित्व है कि वह इनके लिए लड़े। इसके लिए उसे ताकत बरकरार रखनी होगी और उसे गंवाना नहीं होगा। अतीत में लोहियावादियों से लेकर जनसंघ, भाजपा और वाम तक विपक्षी दलों ने कांग्रेस के दबदबे के बीच अपना अस्तित्व इसी प्रकार बचाया।

सन 1984 के लोकसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की और मजाकिया लहजे में कहा था कि 'हमने विपक्ष के लिए 10+2+3 व्यवस्था लागू कर दी है।' तब भी विपक्षी नेताओं ने वापसी कर ली थी। राजीव का इशारा जनता पार्टी, भाजपा और लोकदल को क्रमश: मिली 10, 2 और 3 सीटों ओर था। परंतु राजीव गांधी और कांग्रेस के लोकसभा में 415 सीट जीतने के एक साल के भीतर विपक्षी दल उन पर हावी हो गए। शाह बानो मामला और मंडल आयोग का मामला उभर चुका था। बाद में जब उन्होंने मीडिया पर लगाम कसने के लिए 'मानहानि विरोधी कानून' लाने का प्रयास किया तो विपक्षी दलों खासकर भाजपा को प्रेस की आजादी बचाने में फायदा नजर आया। राजीव सरकार के प्रतिशोध के सबसे बड़े पीडि़त द इंडियन एक्सप्रेस के इतिहास पर नजर डालिए। कांग्रेस के गुंडों ने उसके कर्मचारी संगठन पर कब्जा कर लिया था और हड़ताल करके अखबार बंद करने की धमकी देने लगे। भाजपा और आरएसएस ने न केवल विरोध किया बल्कि प्रेस चालू रखने के लिए अपने स्वयंसेवक भी भेजे। आज हालात ऐसे हैं कि सरकार आपको रंगों में चिह्नित कर रही है और विपक्ष, खासकर कांग्रेस आप पर थूक रही है।

सभी अहम मसलों यानी बेरोजगारी, बढ़ती ईंधन कीमतों, संस्थाओं को कमजोर करने, अल्पसंख्यकों और वाक स्वतंत्रता पर विपक्ष निष्क्रिय नजर आ रहा है। ऐसे ही हालात में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री वाले दौर की दो सांसदों वाली भाजपा हर दूसरे दिन जंतर मंतर को प्रदर्शनकारियों से पाट देती। आज का विपक्ष नाराज होकर ट्वीट करता है। विपक्ष से सवाल न करने का सिलसिला मैंने पिछले सप्ताह केरल से आई तस्वीरों के बाद तोड़ा। इनमें ही राहुल गांधी मछुआरों के साथ तैर रहे हैं तो कहीं पार्टी के वफादार उनके सिक्स पैक्स पर और उनके पुशअप पर फिदा हैं। ये सारे वीडियो वायरल हुए। लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछेगा कि क्या इससे वोट भी मिलेंगे?

सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के बारे में सोचिए जिसके पास लोकसभा में 51 सांसद हैं और तीन बड़े राज्यों पर उसका नियंत्रण है और जो चार अन्य राज्यों तथा एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव लडऩे जा रही है जिनमें से प्रत्येक में उसका कुछ न कुछ दांव पर है। वह नेता स्कूली बच्चों को अपनी फिटनेस दिखा रहा है!

यह सब तब जब खुद पार्टी में आग लगी है। तथाकथित जी-23 समूह जम्मू में बैठककर सवाल उठा रहा है, वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री तथा गांधी परिवार के वफादार आनंद शर्मा आगामी विधानसभा चुनावों में साझेदारों के चयन पर वैचारिक सवाल उठा रहे हैं।

उनके सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह उस दिशा में बढ़ रहे थे जब कोई सरकार भारी बहुमत के बावजूद किसी बड़े मुद्दे पर पिछडऩे लगती है। उनके मामले में यह मुद्दा किसान आंदोलन है। शायद चंद रोज में वह अपनी राजनीतिक पूंजी गंवा सकते हैं या फिर मुझे यह कहने का जोखिम उठाने दीजिए कि उन्हें अपने विकल्प तलाशने होंगे।

राहुल ने सन 2019 के लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेे हुए पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। तब से पार्टी बिना नियमित अध्यक्ष के है। निकट भविष्य में चुनाव की संभावना भी नहीं दिखती। इसके जवाब में यह प्रतिप्रश्न किया जा सकता है कि कोई भाजपा से यह पूछने की हिम्मत क्यों नहीं करता कि वहां चुनाव क्यों नहीं हो रहे? जवाब यह है कि वहां कम से कम राष्ट्रीय अध्यक्ष तो है।

गत 25 वर्ष में यानी पार्टी में गांधी परिवार की वापसी के बाद भाजपा में नौ अध्यक्ष हुए। उनमें से तीन, अमित शाह, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी मंत्रिमंडल में हैं। चौथे लालकृष्ण आडवाणी मार्गदर्शक मंडल में हैं।

मुझे पता है इन सवालों का क्या जवाब मिलेगा? जी-23 वाले किस गिनती में हैं? क्या वे कहीं एक सीट भी जीत सकते हैं? वे राज्य सभा में जाना चाहते हैं या कोई आरामदेह ओहदा भर चाहते हैं? भला और कौन पार्टी अध्यक्ष बनकर इसे एकजुट रख सकता है? भाजपा या आरएसएस का ऐसा विरोध और कौन कर सकता है जैसा राहुल गांधी करते हैं? सब बातें सही हैं लेकिन सवाल यह है कि फिर वह पार्टी अध्यक्ष क्यों नहीं बन रहे? क्या ऐसे कोई दल चल सकता है? आखिर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे और कितने नेताओं को हताश होकर जाने दिया जाएगा? पार्टी शरद पवार की राकांपा से लेकर अरविंद केजरीवाल की आप तक को अपने वोटों पर हाथ साफ करने से कैसे रोकेगी?

गत सप्ताह केरल से आई तस्वीरों ने मुझे 1974 की दिलीप कुमार-सायरा बानू अभिनीत फिल्म सगीना के गीत की याद दिला दी। मजरूह सुल्तानपुरी ने सोचा भी  नहीं होगा कि गीत की एक पंक्ति राहुल गांधी और कांग्रेस के हालात पर इतनी सटीक बैठेगी: 'आग लगी हमरी झोपडिय़ा में, हम गावैं मल्हार/देख भाई कितने तमाशे की, जिंदगानी हमार।' माफ कीजिए मजरूह साहिब मैंने इसे चुराया। लेकिन मैं राहुल गांधी से माफी नहीं मांगूंगा, यह उनके लिए ही लिखा गया है।

Keyword: विपक्ष, मोदी सरकार, बेरोजगारी, ईंधन कीमत, भाजपा, राहुल गांधी, अमित शाह,
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