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नेपाल में ओली बनाम प्रचंड मामले का भारत को फायदा

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  March 02, 2021

इन दिनों यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि नेपाल का नया प्रधानमंत्री कौन होगा? काठमांडू का घटनाक्रम भारतीय टेलीविजन कार्यक्रम 'कौन बनेगा करोड़पति' जैसा लगता है क्योंकि इस हिमालयी देश में पार्टियों को तोडऩे, प्रतिद्वंद्वियों को अपने पक्ष में करने और राजनीतिक पटल पर दुश्मनों का सफाया करने का खेल शुरू हो चुका है। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का पिछले साल दिसंबर में अचानक संसद को भंग करना असंवैधानिक था। उसने 8 मार्च से पहले संसद का अधिवेशन बुलाने का आदेश दिया है। इससे नेपाल में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। ओली ने घोषणा की है कि वह इस्तीफा नहीं देंगे और संसद का सामना करेंगे। उन्होंने हालात की समीक्षा के लिए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में सहयोगियों से मिलना शुरू कर दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल (प्रचंड) की अगुआई वाले एनसीपी के एक अन्य धड़े ने भी नेपाली कांग्रेस जैसे अन्य गठबंधन साझेदारों और संसद के अन्य दलों से मिलना शुरू कर दिया है क्योंकि अब यह साफ हो चुका है कि देश में आम चुनाव नहीं होगा और नया प्रधानमंत्री संसद में ताकतों/दलों के फिर से गठजोड़ से निकलेगा।

अब से पहले

मौजूदा स्थिति सत्तारूढ़ दल में दरार, विभाजित राजनीति और राजनीतिक नेतृत्व के लिए लड़ाई का नतीजा है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में दरार तय थी क्योंकि यह माक्र्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के दो प्रकारों का कृत्रिम गठबंधन था। दोनों अडिग नेताओं के बीच कड़ी प्रतिद्वंद्विता थी। प्रचंड ने गृह युद्ध में माओवादियों की अगुआई की थी और नेपाल में बदलाव की जमीन तैयार की थी। वहीं केपी ओली (यूनाइटेड माक्र्ससिस्ट लेनिनिस्ट) ने मुख्य रूप से भारत विरोधी भावनाओं के आधार पर चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रवाद की सुनामी पैदा की। ओली और प्रचंड के बीच 'ढाई-ढाई साल का समझौता' दोनों दलों के विलय और जीते गए वोटों के आधार पर सत्ता साझेदारी का आधार था, लेकिन अब इसे निभाना मुश्किल हो रहा है। अहम बाहरी किरदारों में निवासी बी डी भंडारी और नेपाल में चीन की राजदूत होउ यांकी शामिल थे। चीन के लिए एनसीपी में एकजुटता बनाए रखना जरूरी था, जिससे उसे नेपाल में भारत पर अपनी प्रमुखता स्थापित करने में मदद मिली है।

आंकड़े

दोनों नेता जिन रैलियों को संबोधित कर रहे हैं, उनका आकार बराबर है। लेकिन संसद के दोनों सदनों में नेताओं का समर्थन आधार ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा प्रांतीय सरकारों में एनसीपी की मौजूदगी की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इस बिखराव ने सात प्रांतीय सरकारों में से छह को अस्थिर कर दिया है। ये प्रांतीय सरकारें इस बात को लेकर चिंतित हैं कि संसद में कैसे गठजोड़ बनेगा क्योंकि इसका उनके भविष्य पर भी असर पड़ सकता है। दिसंबर में जब हाउस ऑफ रीप्रजेंटेटिव यानी प्रतिनिधि सभा को भंग किया गया था तो स्थितियां प्रचंड के पक्ष में थीं। उनके पास न केवल पार्टी का नाम और सूर्य प्रतीक को बनाए रखने का बेहतर मौका था बल्कि उन्हें 441 केंद्रीय समिति के सदस्यों में से 300 और 176 नीति-निर्माताओं में से 100 का समर्थन प्राप्त था। लेकिन ओली का धड़ा बड़ी चतुरता से उबर गया। तकनीकी रूप से पार्टी में कोई विभाजन नहीं है। हालांकि ओली को एनसीपी के सह-प्रमुख और संसदीय दल के नेता के पद से इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया गया। अब वह सामान्य सदस्य हैं। मगर फिर भी वह अपनी जादुई क्षमता से प्रधानमंत्री बने हुए हैं। असल में किंगमेकर नेपाली कांग्रेस पार्टी है, जो 63 सीटों के साथ निचले सदन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई जनता समाजवादी पार्टी में शामिल हो चुके हैं, जो तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। यह विभिन्न असंतुष्ट समूहों एवं लोगों का गठजोड़ है, जो एक उदार वैचारिक समूह में शामिल हुए हैं। अगर प्रचंड और भट्टाराई हाथ मिला लेते हैं तो ओली के लिए उनसे मुकाबला करना मुश्किल होगा। लेकिन ओली के पास भी अपने मददगार हैं। इनमें से एक शेर बहादुर देऊबा की अगुआई वाली नेपाली कांग्रेस है। निष्ठा तेजी से बदल रही हैं, इसलिए वास्तविक आंकड़ों का आकलन करना मुश्किल है।

भारत पर असर

आधिकारिक रूप से भारत की लोकतांत्रिक नेपाल में स्थिर सरकार की नीति है। लेकिन हम पूर्ण ईमानदारी से कहें तो वहां अत्यधिक स्थिर सरकार भारत के लिए मुफीद नहीं होती है। इसका एक उदाहरण ओली सरकार (दिसंबर में संसद को भंग करने से पहले) है। तब भारत को दो-तिहाई बहुमत और चीन के पूर्ण समर्थन वाले प्रधानमंत्री के पांच साल सत्ता में बने रहने के आसार नजर आ रहे थे। मगर अब यह क्रम टूट गया है। एक अविभाजित वामपंथी सरकार से नेपाल में एक विभाजित वामपंथी सरकार आने के आसार हैं, जिसे मुख्य रूप से लोकतांत्रिक ताकतों (यानी एक तरफ नेपाली कांग्रेस और दूसरी तरफ जनता समाजवादी पार्टी) का समर्थन प्राप्त होगा। सत्ता की धुरी थोड़ी भारत के पक्ष में आ रही है, इसलिए भारत के सतर्कता के साथ आशावादी होने की वजह है। वहां प्रधानमंत्री कौन होगा, इसका पता 8 मार्च को चलेगा।

Keyword: नेपाल, प्रधानमंत्री, केपी शर्मा ओली, एनसीपी, पुष्पकमल दहल, गठबंधन,
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